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भानुप्रतापपुर उपचुनाव : जाने इस सीट का इतिहास और भूगौलिक स्थिति

भानुप्रतापपुर उपचुनाव : जाने इस सीट का इतिहास और भूगौलिक स्थिति

रायपुर, न्यूज़ वर्ल्ड डेस्क। कहने को तो छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में अभी कुछ महीनों का वक्त है, लेकिन कांकेर की भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट पर होने वाले चुनाव में कुछ अलग ही सियासी माहौल बनता नजर आ रहा है। जिस तरह की तस्वीर इस चुनाव में नजर आ रही है, उसे देखर कहा जा सकता है की मिशन 2023 से पहले इस उपचुनाव को दोनों ही दल सेमी फाइनल के तौर पर आंक रहे है। इस सीट को फतह करने दोनों ही पार्टी कांग्रेस और भाजपा एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रही हैं।


मनोज सिंह मंडावी के निधन से खाली हुई सीट

भानुप्रतापपुर से कांग्रेस विधायक और आदिवासी समाज के प्रभावशाली नेताओं में से एक मनोज सिंह मंडावी का 16 अक्टूबर को निधन होने से यह सीट खाली हुई। इस पर पांच दिसंबर को वोटिंग होनी है और 08 दिसंबर को गुजरात और हिमाचल प्रदेश के नतीजों के साथ इसके परिणाम घोषित किए जाएंगे। 


2018 में भाजपा को केवल 16 सीटें मिली

भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट का गणित समझने से पहले बात करते हैं, मनोज सिंह मंडावी की। छत्तीसगढ़ के गृह राज्यमंत्री और विधानसभा के उपाध्यक्ष सहित कई पदों पर मंडावी रहे। 1998 में अविभाजित मध्य प्रदेश विधानसभा, 2013 और 2018 में छत्तीसगढ़ विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। साल 2018 में बीजेपी पर सत्ता का नशा चरम पर था, लेकिन प्रदेश की जनता का बीजेपी सरकार से मोह भंग हो गया था। जिसका खामियाजा तीन बार की रमन सरकार को उठाना पड़ा और 2018 के विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में बीजेपी केवल 15 सीटों पर सिमट कर रह गई। वहीं कांग्रेस ने इतिहास रचते हुए 67 सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल कर सरकार बनाई।


इस चुनाव में भानुप्रतापपुर में कांग्रेस की जीत का अंतर 2013 के चुनाव से बढ़ गया और एक बार फिर मनोज मंडावी ने 26,693 वोटों से बीजेपी प्रत्याशी देवलाल दुग्गा को हराकर दूसरी बार भानुप्रतापपुर में कांग्रेस को जीत दिलाई।


कांकेर के अंतिम राजा भानुप्रताप देव की मृत्यु के बाद भानुप्रतापपुर बसाया गया था। जो अब भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट में तबदील हो चुका है। इस क्षेत्र में 1 लाख 90 हजार से ज्यादा मतदाता निवास करते है, जिनमें 98,669 पुरुष और 97,513 महिला मतदाता है। भानुप्रतापपुर विधानसभा प्रदेश की 80वीं विधानसभा है। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के समय इस विधानसभा पर कांग्रेस का कब्जा था। लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी देवलाल डुग्गा ने कांग्रेस प्रत्याशी मनोज मांडवी को 1,379 वोटों के मामूली अंतर से हराकर इस सीट पर कब्जा किया। 2008 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपना प्रत्याशी बदला और ब्रम्हानंद नेताम को टिकट दिया। लेकिन कांग्रेस ने दोबारा मनोज मंडावी पर भरोसा जताया लेकिन वो इस बार भी भरोसे पर खरे नहीं उतरे।


संयुक्त मध्य प्रदेश के समय 1962 में पहली बार भानुप्रतापपुर का विधानसभा क्षेत्र घोषित किया गया। 

पहले चुनाव में निर्दलीय रामप्रसाद पोटाई ने कांग्रेस के पाटला ठाकुर को हराया। 


कब कौन जीता

1967 के दूसरे चुनाव में प्रजा सोसलिस्ट पार्टी के जे हथोई जीते। 

1972 में कांग्रेस के सत्यनारायण सिंह जीते। 

1979 में जनता पार्टी के प्यारेलाल सुखलाल सिंह जीत गए।

1980 और 1985 के चुनाव में कांग्रेस के गंगा पोटाई की जीत हुई। 

1990 के चुनाव में निर्दलीय झाड़ूराम ने पोटाई को हरा दिया। 

1993 में भाजपा के देवलाल दुग्गा यहां से जीत गए। 

1998 में कांग्रेस के मनोज मंडावी जीते। अजीत जोगी सरकार में मंत्री रहे। 

2003 में भाजपा के देवलाल दुग्गा फिर जीत गए। 

2008 में भाजपा के ही ब्रम्हानंद नेताम यहां से विधायक बने। 

2013 में कांग्रेस के मनोज मंडावी ने वापसी की। 

2018 के चुनाव में भी उन्होंने जीत दर्ज की।


यहां की भूगौलिक स्थिति

इस क्षेत्र की भूगौलिक स्थिति देखें तो-रेल सुविधाओं के शुरु होते ही भानुप्रतापपुर विकास के मानचित्र पर काफी आगे निकल गया। भानुप्रतापपुर विधानसभा की 3 तहसील भानुप्रतापपुर, चरामा और दुर्गुकोंदल के अंतर्गत 350 से ज्यादा गांव आते है। यहां के निवासियों का मुख्य पेशा खेती है। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण इस विधानसभा में गोंड जाति के लोग बड़ी संख्या में निवास करते है। साथ ही ओबीसी वर्ग का एक बहुत बड़ा समुदाय भी विधानसभा में चुनाव में मुख्य भूमिका निभाता है।

Md. Kamar Khan

Md. Kamar Khan

kamarkhan@newsworld.com

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