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छत्तीसगढ़ का कृषि ढांचा अब एक बड़े बदलाव की ओर, किसान अब आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा: राम विचार नेताम

29 मई, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
छत्तीसगढ़ का कृषि ढांचा अब एक बड़े बदलाव की ओर, किसान अब आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा: राम विचार नेताम
Hitesh Kumar Singh
डेस्क रिपोर्टर
Hitesh Kumar Singh

रायपुर। ‘छत्तीसगढ़ का कृषि ढांचा अब एक बड़े बदलाव की ओर है। हमारा किसान अब आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। खरीफ 2026 में हम अरहर, उड़द और मूंग के लिए क्लस्टर आधारित रणनीति लागू कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य हर हाथ को काम और हर खेत को सही समय पर गुणवत्तायुक्त बीज और संतुलित खाद उपलब्ध कराना है।’ ये बातें कृषि मंत्री राम विचार नेताम ने केन्द्रीय कृषि विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में शुक्रवार को नई दिल्ली में हुए उच्च स्तरीय सम्मेलन में कहीं। 


सम्मेलन में कृषि मंत्री राम विचार नेताम और कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल परदेशी की ओर से बताया गया कि धान के कटोरे के रूप में विख्यात छत्तीसगढ़ अब परंपरागत धान की खेती से आगे बढ़कर फसल विविधीकरण, डिजिटल तकनीक और पर्यावरण अनुकूल स्थायी कृषि के एक नए युग में अग्रसर हो रहा है। राज्य सरकार की ओर से लागू किए गए ‘‘नवा अंजोर विज़न 2047’’ के तहत किसानों की आय दोगुनी करने और कृषि क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए चौतरफा रणनीति पर काम शुरू हो गया है।

 

कृषि मंत्री नेताम ने सम्मेलन में कहा कि हमारी सरकार ‘‘नवा अंजोर विज़न 2047’’ के जरिए राज्य के लगभग 40 लाख किसान परिवारों के आर्थिक उत्थान के लिए प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। जिनमें 82 प्रतिशत लघु व सीमांत, 31 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के किसान शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दलहन उत्पादन में वर्ष 2025-26 के दौरान दर्ज की गई 76 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि और तिलहन के रकबे में 28 हजार हेक्टेयर से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। 


खरीफ 2026 के लिए हमारी तैयारियां पूरी तरह वैज्ञानिक और तकनीक-आधारित

कृषि उत्पादन आयुक्त सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी ने कहा कि कृषि तकनीक, बुनियादी ढांचे और वैज्ञानिक प्रबंधन से खेती की तस्वीर बदल रही है। उन्होंने सम्मेलन में कहा कि खरीफ 2026 के लिए हमारी तैयारियां पूरी तरह वैज्ञानिक और तकनीक-आधारित हैं। राज्य के किसानों को कृषि विश्वविद्यालयों की वैज्ञानिक अनुशंसा के आधार पर ही उर्वरकों का वितरण किया जा रहा है। सीमांत किसानों को जहां एकमुश्त उर्वरक दिया जा रहा है, वहीं यूरिया की कालाबाजारी और अत्यधिक खपत को रोकने के लिए लघु व बड़े किसानों को 20 से 25 दिनों के अंतराल पर 2 से 3 बार में यूरिया देने की व्यवस्था की गई है। हम डीएपी के विकल्प के रूप में नैनो डीएपी, एसएसपी और एनपीके कॉम्प्लेक्स को तेजी से बढ़ावा दे रहे हैं। 


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