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रानी अहिल्याबाई होल्कर देश की सांस्कृतिक एकता और सुशासन का प्रतीक: विष्णु देव साय

30 मई, 20250 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
रानी अहिल्याबाई होल्कर देश की सांस्कृतिक एकता और सुशासन का प्रतीक: विष्णु देव साय

रानी अहिल्याबाई होल्कर देश की सांस्कृतिक एकता और सुशासन का प्रतीक: विष्णु देव साय

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

रायपुर। रानी अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती पर गुरुवार को राजधानी में मुख्यमंत्री निवास में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अध्यक्षता की। उन्होंने रानी अहिल्याबाई होल्कर को भारत की सांस्कृतिक एकता और सुशासन का प्रतीक बताया। उनके करीब 30 वर्षों के शासन को प्रजा कल्याण, राष्ट्र निर्माण और न्याय का स्वर्ण युग कहा।

    

मुख्यमंत्री ने कहा कि इंदौर की महारानी होने के बावजूद राजमाता ने स्वयं को किसी एक भौगोलिक सीमा में नहीं बांधा। उन्होंने देशभर में मंदिरों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया। उन्होंने रामराज्य की अवधारणा को साकार करते हुए तीन दशकों तक होल्कर राजवंश का नेतृत्व किया। काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में रानी अहिल्याबाई होल्कर के योगदान को ऐतिहासिक बताया। पेशवा माधवराव की इच्छा के अनुरूप राजमाता ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर करोड़ों आस्थावानों की भावना को सम्मान दिया।

   

संगोष्ठी में केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्री तोखन साहू और कृषि मंत्री रामविचार नेताम भी शामिल हुए। विभिन्न वर्गों के बुद्धिजीवी, समाज सेवी, डॉक्टर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट, वकील और साहित्यकार भी संगोष्ठी में मौजूद थे। 


न्याय के लिए परिवार के सदस्यों को भी दंड देने से नहीं किया परहेज

मुख्यमंत्री ने कहा कि राजमाता रानी अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का भी ऐतिहासिक निर्णय लिया, जो देश की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का प्रतीक बना। आज इंदौर देश में स्वच्छता में अग्रणी है, इसके पीछे राजमाता की ओर से स्थापित गुड गवर्नेंस की प्रेरणा है। वे न्यायप्रिय थीं। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को भी न्याय के लिए दंड देने से परहेज नहीं किया।


धर्मसत्ता और न्यायसत्ता की आवाज बुलंद की: प्रहलाद सिंह पटेल

मध्यप्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि रानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1767 से 1795 तक अपने 28 वर्षो के शासन काल में धर्मसत्ता और न्यायसत्ता की आवाज बुलंद की। उन्होंने अपने जीवन में तमाम विपत्तियों के बीच अनेक अनुकरणीय कार्य किए। उन्होंने अपने शासन काल में सार्वजनिक धन और राजकोष के सदुपयोग की मिसालें कायम की। राजसत्ता की कोई राशि कभी अपने लिए खर्च नहीं की। रानी अहिल्याबाई होल्कर अपने पति के निधन के बाद कभी राजमहल में नहीं रहीं। झोपड़ी में अपना जीवन बिताया। न्याय के लिए उन्होंने अपने पुत्र को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। उन्होंने अपने शासन में विधवाओं को दत्तक पुत्र लेने की अनुमति प्रदान की। रानी अहिल्याबाई होल्कर के प्रजाहितैषी और कल्याणकारी कार्यों के कारण उनके राज्य के लोगों ने उन्हें लोकमाता का दर्जा दिया था।

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