
रायपुर। उत्तर बस्तर कांकेर में रक्षाबंधन के अवसर पर शुक्रवार को संघर्ष के अतीत और शांति के वर्तमान की अनूठी तस्वीर देखने को मिली। भानुप्रतापपुर क्षेत्र के ग्राम चौगेल (मुल्ला) स्थित पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित माओवादियों ने जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों को राखी बांधी।
कभी जंगल में बंदूक लेकर आमने-सामने रहने वाले हाथ आज भाईचारे और विश्वास के धागे से जुड़ गए। पुनर्वास केंद्र में रह रही आत्मसमर्पित माओवादी शांति कवाची ने बताया कि उन्होंने पहली बार रक्षाबंधन का त्योहार मनाया है। मुख्यमंत्री कौशल विकास प्रशिक्षण के तहत उन्होंने राखी बनाना सीखा और अपने हाथों से तैयार राखियां डीआरजी जवानों की कलाई पर बांधीं। उन्होंने इस पल को बेहद खास और भावुक बताया।
आत्मसमर्पण के बाद मुख्यधारा में लौटने का एहसास
शांति कवाची ने कहा कि आत्मसमर्पण के बाद अब उन्हें महसूस हो रहा है कि वह समाज की मुख्यधारा में वापस लौट आई हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार जताते हुए कहा कि नक्सल पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उन्होंने आत्मसमर्पण का फैसला लिया।
हथियार छोड़कर हुनर की राह
पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित माओवादियों को सिलाई, काष्ठ शिल्प और राखी निर्माण समेत कई कौशलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उद्देश्य है कि वे इन हुनरों के जरिए सम्मानजनक आजीविका हासिल कर सकें और अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर सकें।
डीआरजी जवान बोले- पहले बंदूक थी, आज राखी है
डीआरजी जवान टेकेश्वर हिचामी ने कहा कि पहले परिस्थितियां ऐसी थीं कि दोनों पक्ष बंदूक लेकर एक-दूसरे के सामने रहते थे। आज वही हाथ राखी के पवित्र धागे से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि आत्मसमर्पित माओवादी द्वारा उनकी कलाई पर बांधी गई राखी उनके लिए बेहद भावुक और खास अनुभव है।
रक्षाबंधन बना बदलाव का प्रतीक
चौगेल पुनर्वास केंद्र में मनाया गया यह रक्षाबंधन केवल एक पर्व का आयोजन नहीं रहा, बल्कि शांति और पुनर्वास की बदलती तस्वीर का प्रतीक बन गया। आत्मसमर्पण के बाद माओवादी अब हथियारों की जगह हुनर को अपना रहे हैं और समाज की मुख्यधारा में लौटकर नई जिंदगी शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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