
मध्य पूर्व में हालात तेजी से विस्फोटक होते जा रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित 45 दिन के सीजफायर पर फैसला अब सिर्फ 48 घंटे दूर है—और असफलता का मतलब हो सकता है बड़ा सैन्य टकराव।
45 दिन का सीजफायर: शांति या रणनीतिक विराम?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती चरण में 45 दिन का अस्थायी युद्धविराम लागू करने का प्रस्ताव है। इस दौरान दोनों पक्ष स्थायी समझौते पर बातचीत करेंगे। इस पहल में पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये अहम मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अंदरखाने यह भी कहा जा रहा है कि यह “आखिरी खिड़की” हो सकती है—जिसके बाद हालात हाथ से निकल सकते हैं।
समझौता फेल हुआ तो क्या होगा?
खुफिया रिपोर्ट्स इशारा कर रही हैं कि इजराइल और अमेरिका ने पहले ही ईरान के ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर ठिकानों को निशाना बनाने की तैयारी कर ली है। यानी अगर बातचीत टूटती है, तो हमला तुरंत हो सकता है—और इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर दिखेगा। यही डर इस बातचीत को और भी अहम बना देता है।
ईरान का सख्त रुख: “रियायत नहीं देंगे”
हालांकि, ईरान फिलहाल अपने दो बड़े मुद्दों—परमाणु कार्यक्रम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज—पर झुकने को तैयार नहीं दिख रहा। यही जिद इस डील की सबसे बड़ी रुकावट बन रही है। अगर कोई ब्रेकथ्रू नहीं हुआ, तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं—और इसके संकेत अब साफ दिखने लगे हैं।
ग्लोबल सप्लाई चेन पर खतरा क्यों?
ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो वह सिर्फ सैन्य जवाब नहीं देगा—बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करेगा। ईरानी नेतृत्व के करीबी अली अकबर वेलायती ने संकेत दिया कि तेल और व्यापार के अहम समुद्री रास्तों को निशाना बनाया जा सकता है। इसमें बाब-अल-मंदेब जैसे मार्ग भी शामिल हैं, जो एशिया-यूरोप व्यापार के लिए बेहद अहम हैं। यह खतरा वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका दे सकता है।
ट्रम्प का अल्टीमेटम और बढ़ता दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को साफ संदेश दिया है कि होर्मुज स्ट्रेट खुला रहना चाहिए, वरना कड़ी कार्रवाई होगी। यह बयान ऐसे वक्त आया है जब यमन के हूती विद्रोही पहले ही रेड सी में जहाजों पर हमलों की चेतावनी दे चुके हैं। इससे क्षेत्र में तनाव कई गुना बढ़ गया है—और दुनिया की नजर अब अगले 48 घंटे पर टिकी है।
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