
चांद की सतह पर स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट का ऊपरी हिस्सा टकराने की घटना अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए नए शोध का अवसर बन गई है। करीब 4 हजार किलोग्राम वजनी यह रॉकेट हिस्सा तेज रफ्तार से चंद्र सतह से टकराया, जबकि नासा ने स्पष्ट किया है कि इस घटना से पृथ्वी पर किसी तरह का खतरा नहीं है।
टक्कर की आधिकारिक पुष्टि अब ऑर्बिटरों से मिलने वाली तस्वीरों के बाद होगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रभाव से बने नए गड्ढे और उड़ी धूल के अध्ययन से चांद के इतिहास और सौर मंडल के निर्माण से जुड़े अहम संकेत मिल सकते हैं।
Falcon 9 का ऊपरी हिस्सा कैसे पहुंचा चांद तक?
यह मलबा स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट का ऊपरी चरण (Upper Stage) था। इसे जनवरी 2025 में फ्लोरिडा से अमेरिका और जापान के दो लूनर लैंडर अंतरिक्ष में भेजने के मिशन के लिए लॉन्च किया गया था। मिशन पूरा होने के बाद रॉकेट का यह हिस्सा अंतरिक्ष में ही रह गया। पिछले 18 महीनों में पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण इसकी कक्षा बदलती रही और अंततः यह चांद से टकरा गया।
खगोलविदों ने पहले ही लगा लिया था अनुमान
डेटा विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिकों ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि यह बेकाबू रॉकेट चंद्रमा की दिशा में बढ़ रहा है और उसकी सतह से टकरा सकता है। बाद में यही अनुमान सही साबित हुआ।
कहां हुई टक्कर और क्यों नहीं दिखी?
रॉकेट की टक्कर चांद के आइंस्टीन क्रेटर के पास हुई। यह इलाका चंद्रमा के उस हिस्से में है जहां दिन का उजाला रहता है और जो पृथ्वी से दिखाई देता है। इसके बावजूद टक्कर के समय बनी चमक इतनी हल्की थी कि उसे सामान्य दूरबीन से देख पाना संभव नहीं था।
धूल का गुबार 100 किलोमीटर तक पहुंचने का अनुमान
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के खगोलविद डॉ. मैट बोथवेल के अनुसार, इस टक्कर से चंद्र सतह की धूल का बड़ा गुबार उठा होगा, जो करीब 100 किलोमीटर तक ऊपर गया होगा और कई मिनट तक बना रहा होगा।
अब ऑर्बिटर भेजेंगे तस्वीरें
टक्कर के समय कोई भी चंद्र ऑर्बिटर सही स्थिति में नहीं था, इसलिए घटना की लाइव तस्वीरें उपलब्ध नहीं हो सकीं। अब दक्षिण कोरिया का दानुरी ऑर्बिटर और नासा का लूनर रिकोनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) प्रभावित क्षेत्र के ऊपर से गुजरेंगे। वैज्ञानिक पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना कर नए बने निशान की पहचान करेंगे।
चांद पर बढ़ता जा रहा मानव निर्मित मलबा
इस घटना के बाद चंद्रमा पर छोड़ी गई या दुर्घटनाग्रस्त मानव निर्मित वस्तुओं की संख्या लगभग 3,000 तक पहुंच गई है, जिनका कुल वजन करीब 190 टन माना जा रहा है। सितंबर 1959 में सोवियत संघ का लूना-2 चांद तक पहुंचने वाला पहला मानव निर्मित ऑब्जेक्ट था। नासा के अपोलो प्रोग्राम से जुड़ी 796 वस्तुएं भी आज चंद्रमा पर मौजूद हैं।
वैज्ञानिकों को क्या मिलेगा फायदा?
साइंस म्यूजियम की स्पेस हेड लिब्बी जैक्सन के मुताबिक यह घटना वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि रॉकेट का वजन, आकार और गति पहले से ज्ञात थे। प्राकृतिक उल्कापिंडों की तुलना में इस नियंत्रित डेटा वाली टक्कर से बने गड्ढे और धूल का अध्ययन करके वैज्ञानिक चांद तथा सौर मंडल के शुरुआती विकास को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
चंद्रमा पर कचरे को लेकर बढ़ रही चिंता
चांद पर वायुमंडल या जैविक पर्यावरण नहीं होने से वहां मौजूद मलबा किसी ईकोसिस्टम को प्रभावित नहीं करता। फिर भी वैज्ञानिकों को आशंका है कि भविष्य में बढ़ते लूनर ट्रैफिक से ऐतिहासिक अपोलो लैंडिंग साइट्स और नए मिशनों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।
18वीं उड़ान के लिए तैयार उसी मिशन का बूस्टर
जिस फाल्कन 9 मिशन का ऊपरी हिस्सा चांद से टकराया, उसी रॉकेट का पुन: उपयोग होने वाला निचला बूस्टर सुरक्षित पृथ्वी पर लौट आया था। इसे 10 अगस्त को 18वीं बार लॉन्च करने की तैयारी की जा रही है।
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