
वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में अब सैन्य कार्रवाई के साथ आर्थिक दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका के पास स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर “पूरा नियंत्रण” है। हालांकि, जमीन पर स्थिति इतनी सीधी नहीं है। होर्मुज से व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही अब भी बेहद सीमित है और ईरान लगातार अमेरिकी दावे को खारिज करते हुए कह रहा है कि जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण कायम है।
ट्रंप ने 19 अगस्त को कहा था कि अमेरिका के पास होर्मुज पर “possession, complete control” है। उनके मुताबिक, ईरान की ओर से कभी-कभार ड्रोन हमले अब सिर्फ परेशानी पैदा करने तक सीमित हैं। लेकिन शिपिंग डेटा बताता है कि सामान्य समय की तुलना में इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या काफी कम है।
इसी बीच ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव को नई ऊंचाई पर ले जाने का फैसला किया है। ट्रंप ने इसे “Economic D-Day” और बेहद कठोर आर्थिक अभियान बताया है, जबकि वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ईरान के खिलाफ इतिहास के सबसे सख्त आर्थिक प्रतिबंधों की बात कही है।
ट्रंप बोले- ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे
ट्रंप लगातार यह साफ कर रहे हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना है कि ईरान के परमाणु खतरे को खत्म करना अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल रहा है।
अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि पिछले महीनों की सैन्य कार्रवाई में ईरान की सैन्य क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा है। ट्रंप ने ईरान की नौसेना और वायुसेना को हुए नुकसान का भी जिक्र किया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं पर दबाव बनाए रखना अभी भी वॉशिंगटन की रणनीति का अहम हिस्सा है।
हालांकि, सैन्य नुकसान के बावजूद ईरान ने संघर्ष खत्म करने या अमेरिकी शर्तों पर झुकने के संकेत नहीं दिए हैं। यही वजह है कि वॉशिंगटन अब सैन्य दबाव के साथ आर्थिक दबाव को भी प्रमुख हथियार बना रहा है।
बातचीत पर भी संशय, ईरान में फैसले कौन ले रहा है?
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की संभावनाएं भी अनिश्चित बनी हुई हैं। ट्रंप ने 19 अगस्त को कहा था कि बातचीत किसी समय दोबारा शुरू हो सकती है, लेकिन तत्काल कोई स्पष्ट वार्ता प्रक्रिया सामने नहीं है। जून में हुए समझौते के तहत तय 60 दिन की बातचीत की अवधि भी बिना अंतिम समझौते के खत्म हो चुकी है।
ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ढांचे को हुए भारी नुकसान के बाद वॉशिंगटन के लिए यह समझना भी चुनौती बना हुआ है कि तेहरान में अंतिम फैसले किस स्तर पर लिए जा रहे हैं। हालांकि ईरानी सरकार और उसके सुरक्षा तंत्र ने काम करना जारी रखा है और अमेरिकी दबाव के बावजूद बातचीत तथा प्रतिरोध—दोनों विकल्पों को अपने तरीके से इस्तेमाल किया है।
ईरान की अर्थव्यवस्था पर अमेरिका का नया वार
ट्रंप प्रशासन ने अब आर्थिक मोर्चे पर भी बड़ा अभियान शुरू किया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जो देश, कंपनियां या वित्तीय संस्थान ईरान को आर्थिक मदद या व्यापारिक रास्ता उपलब्ध कराते रहेंगे, उन्हें भी अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका ईरान पर अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। नई कार्रवाई में सिर्फ ईरानी संस्थानों को निशाना बनाने के बजाय उन विदेशी संस्थाओं पर भी दबाव बढ़ाया जा सकता है, जो ईरान के तेल कारोबार, वित्तीय लेन-देन, शिपिंग या दूसरे आर्थिक नेटवर्क से जुड़ी हैं।
अमेरिका की रणनीति का एक अहम हिस्सा secondary sanctions यानी ईरान के साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों और संस्थाओं पर कार्रवाई का खतरा है। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, इसलिए अमेरिकी दबाव का सबसे बड़ा असर बीजिंग के साथ संबंधों पर पड़ सकता है।
चीन ने अमेरिका को चेताया- प्रतिबंधों से नहीं सुलझेगा संकट
अमेरिका की नई रणनीति पर चीन ने खुलकर आपत्ति जताई है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने शुक्रवार को कहा कि प्रतिबंध और दबाव मध्य पूर्व के संकट का समाधान नहीं कर सकते।
उन्होंने सभी संबंधित पक्षों से जिम्मेदारी के साथ कदम उठाने और राजनीतिक तथा कूटनीतिक माध्यम से समाधान खोजने की अपील की। चीन ने यह भी दोहराया कि वह ऐसे एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी हासिल नहीं है।
चीन की प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान के तेल कारोबार में उसकी बड़ी भूमिका है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ईरानी तेल का प्रमुख खरीदार बना हुआ है। ऐसे में वॉशिंगटन अगर बीजिंग से ईरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करने के लिए कहता है, तो यह अमेरिका-चीन संबंधों में नया तनाव पैदा कर सकता है।
ईरान ने कहा- अमेरिकी प्रतिबंधों से नीति नहीं बदलेगी
ईरान ने अमेरिका की नई आर्थिक कार्रवाई को खारिज करते हुए इसे “आर्थिक आतंकवाद” बताया है। ईरानी विदेश मंत्रालय का कहना है कि दशकों से लगाए जा रहे प्रतिबंध उसके रुख को बदलने में सफल नहीं हुए हैं और नए प्रतिबंध भी तेहरान को अमेरिकी शर्तें स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं कर पाएंगे।
ईरान का तर्क है कि अमेरिका जब बातचीत के बजाय दबाव का रास्ता अपनाता है तो दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास और बढ़ता है।
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के ईरान प्रोजेक्ट के निदेशक अली वाएज के मुताबिक, सिर्फ आर्थिक दबाव बढ़ाने से ईरान के झुकने की संभावना कम हो सकती है। उनका आकलन है कि तेहरान के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों को झेलना मुश्किल जरूर है, लेकिन अमेरिकी शर्तों के सामने पूरी तरह आत्मसमर्पण करना उसे इससे भी ज्यादा जोखिम भरा लगता है।
होर्मुज पर अमेरिका के दावे और ईरान की हकीकत में बड़ा अंतर
ट्रम्प के “पूर्ण नियंत्रण” वाले दावे के बावजूद होर्मुज की स्थिति अभी सामान्य नहीं हुई है। रॉयटर्स के मुताबिक 19 अगस्त को इस रास्ते से सिर्फ कुछ ही कमोडिटी जहाज गुजरे थे और आवाजाही हाल के औसत से काफी नीचे थी।
अमेरिका का कहना है कि उसकी नौसेना जलडमरूमध्य के दक्षिणी हिस्से में शिपिंग को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ ईरान लगातार यह दावा कर रहा है कि होर्मुज पर उसका नियंत्रण है और उसकी शर्तें पूरी होने तक सामान्य अंतरराष्ट्रीय आवाजाही बहाल नहीं होगी।
यानी फिलहाल “अमेरिका के पास सैन्य और नौसैनिक बढ़त” तथा “होर्मुज से सामान्य वाणिज्यिक आवाजाही पर पूर्ण नियंत्रण”—इन दोनों बातों को एक जैसा मानना सही नहीं होगा।
होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इसकी सबसे बड़ी अहमियत वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति में है।
1. दुनिया के तेल कारोबार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से
IEA के अनुसार 2025 में औसतन करीब 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और तेल उत्पाद होर्मुज से गुजरे। यह दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।
2. LNG के लिए भी अहम रास्ता
कतर और UAE की LNG सप्लाई के लिए होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण है। IEA के मुताबिक दोनों देशों के LNG निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है और यह वैश्विक LNG व्यापार में करीब 19% हिस्सेदारी से जुड़ा है।
3. एशिया की ऊर्जा सुरक्षा इससे जुड़ी है
होर्मुज से गुजरने वाली ऊर्जा का बड़ा हिस्सा एशियाई बाजारों की ओर जाता है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े ऊर्जा आयातक इस मार्ग में किसी भी लंबे व्यवधान से प्रभावित हो सकते हैं।
4. रास्ता बंद होने पर तेल की कीमतों पर सीधा असर
होर्मुज में तनाव बढ़ने का असर सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहता। जहाजों की आवाजाही घटने पर तेल और गैस की वैश्विक कीमतों में तेजी आ सकती है। मौजूदा संघर्ष में भी शिपिंग बाधित होने के बाद ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी है।
5. ईरान की रणनीतिक ताकत
होर्मुज ईरान के लिए सिर्फ व्यापारिक मार्ग नहीं बल्कि रणनीतिक दबाव का साधन भी है। जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित करने की उसकी क्षमता अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसी वजह से होर्मुज को दोबारा सुरक्षित और नियमित रूप से खोलना अमेरिकी रणनीति का प्रमुख लक्ष्य बना हुआ है।
आगे क्या होगा?
अब अमेरिका के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और दूसरी तरफ होर्मुज से व्यावसायिक जहाजों की नियमित आवाजाही बहाल करना।
वॉशिंगटन को उम्मीद है कि प्रतिबंधों, नौसैनिक दबाव और ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था का संयुक्त असर तेहरान को समझौते की ओर ला सकता है। लेकिन ईरान का अब तक का रुख बताता है कि वह दबाव के सामने तुरंत झुकने के बजाय प्रतिरोध और वैकल्पिक आर्थिक रास्तों पर जोर दे रहा है।
चीन का विरोध भी अमेरिकी रणनीति को जटिल बनाता है, क्योंकि ईरान के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदारों में चीन शामिल है। ऐसे में आने वाले दिनों में असली लड़ाई सिर्फ मिसाइलों और युद्धपोतों की नहीं होगी—होर्मुज, तेल, प्रतिबंध और वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर भी अमेरिका और ईरान के बीच टकराव जारी रहने की संभावना है।
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