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ईरान से जंग खत्म करने के लिए ट्रम्प ने बदली रणनीति, परमाणु डील के बजाय अब होर्मुज स्ट्रेट पर नजर

10 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
ईरान से जंग खत्म करने के लिए ट्रम्प ने बदली रणनीति, परमाणु डील के बजाय अब होर्मुज स्ट्रेट पर नजर
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के लिए परमाणु समझौते को अनिवार्य शर्त मानने से पीछे हटते दिख रहे हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट में सामान्य कारोबारी जहाजों की आवाजाही बहाल होना अमेरिका के लिए संघर्ष समाप्त करने का रास्ता बन सकता है।


ट्रम्प पिछले कुछ हफ्तों से इस विकल्प पर विचार कर रहे हैं। इसके पीछे ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि युद्ध से बढ़ती ऊर्जा कीमतें, होर्मुज की रणनीतिक अहमियत और अमेरिका में नजदीक आते मध्यावधि चुनाव भी महत्वपूर्ण कारण बताए गए हैं।


ट्रम्प की रणनीति में आया बड़ा बदलाव

अब तक अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकता ईरान के साथ परमाणु समझौता कराने की रही थी। लेकिन लंबे समय तक चले संघर्ष के बीच ट्रम्प अब बिना औपचारिक न्यूक्लियर डील के भी युद्ध रोकने का विकल्प देख रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ निजी बातचीत में यह संभावना रखी है कि यदि ईरान होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलकर सामान्य व्यापारिक जहाजों को गुजरने देता है, तो अमेरिका सैन्य संघर्ष से पीछे हट सकता है।

होर्मुज क्यों बन गया अहम मुद्दा?

ईरान और ओमान के बीच मौजूद होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां से दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 20% और LNG का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग में तनाव बढ़ने या आवाजाही रुकने से अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है। यही वजह है कि स्ट्रेट को खोलना अमेरिका के लिए युद्ध समाप्ति की महत्वपूर्ण शर्त बन सकता है।


ईरान की मांगें अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती

ईरान ने होर्मुज को खोलने के बदले सिर्फ सैन्य कार्रवाई रोकने की बात नहीं की है। ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाघेर जोलघदार ने कई शर्तें सामने रखी हैं। ईरान चाहता है कि अमेरिका युद्ध स्थायी रूप से समाप्त करे और अपनी नौसैनिक नाकाबंदी हटाए। इसके साथ अमेरिकी सैनिकों की क्षेत्र से वापसी भी उसकी मांगों में शामिल है। ईरान ने सभी प्रतिबंध हटाने, विदेशों में जमा ईरानी संपत्ति जारी करने और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा देने की मांग भी रखी है। इसके अलावा तेहरान चाहता है कि अमेरिका पश्चिम एशिया में उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बंद करे।


ट्रम्प पर अमेरिका के भीतर भी दबाव

युद्ध का असर अमेरिकी नागरिकों पर पेट्रोल की कीमतों के रूप में भी पड़ रहा है। बढ़ती ऊर्जा लागत के बीच ट्रम्प प्रशासन के सामने संघर्ष को खत्म करने का दबाव बढ़ा है। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव भी नजदीक हैं। ट्रम्प पहले कई बार ईरान के साथ समझौता जल्द होने की बात कह चुके हैं और हाल में एक पोस्ट के जरिए यह संकेत भी दिया कि अमेरिका युद्ध में जीत हासिल कर चुका है।


परमाणु समझौते के बिना क्यों बदल रहा रुख?

रिपोर्ट के अनुसार ट्रम्प का आकलन है कि उनके कार्यकाल के दौरान ईरान के लिए अपना परमाणु कार्यक्रम आसानी से दोबारा शुरू करना मुश्किल होगा। उनका मानना है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ईरान की नई परमाणु गतिविधियों पर निगरानी रख सकती हैं। यदि तेहरान दोबारा परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ता है, तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई करने का विकल्प रख सकता है।


ईरान को सैन्य रूप से दबाना अमेरिका के लिए आसान क्यों नहीं?

ईरान की सैन्य क्षमता और पश्चिम एशिया में उसका प्रभाव युद्ध को लंबा खींचने वाली बड़ी चुनौतियां हैं।


3,000 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें

अमेरिकी खुफिया एजेंसी ODNI के मुताबिक, युद्ध से पहले ईरान के पास 3,000+ बैलिस्टिक मिसाइलें थीं। इनकी मारक क्षमता 2,000 किलोमीटर तक बताई गई है। इनका बड़ा हिस्सा पहाड़ों के नीचे बने भूमिगत ठिकानों में रखा गया है। सुरंगों के भीतर मिसाइलों के साथ लॉन्चर और कंट्रोल सेंटर भी मौजूद होते हैं, जिससे हवाई हमलों के जरिए उन्हें पूरी तरह नष्ट करना मुश्किल माना जाता है।


हजारों ड्रोन का नेटवर्क

ईरान ने पिछले एक दशक में शाहेद जैसे हजारों ड्रोन विकसित किए हैं। इनका इस्तेमाल लंबी दूरी के हमलों के साथ निगरानी के लिए किया जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में ईरानी ड्रोन के इस्तेमाल ने भी तेहरान की ड्रोन क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।


पश्चिम एशिया में सहयोगी सशस्त्र समूह

ईरान से जुड़े सशस्त्र नेटवर्क का दायरा उसके अपने क्षेत्र से बाहर तक फैला है। लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हूती और इराक के कई शिया सशस्त्र गुट उसके समर्थन वाले समूहों में शामिल हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ इन नेटवर्क को ईरान की फॉरवर्ड डिफेंस स्ट्रटजी का हिस्सा मानते हैं। इनके जरिए ईरान अपने सीमावर्ती क्षेत्र से बाहर भी दबाव बना सकता है।


होर्मुज पर ईरान का दावा कैसे मजबूत हुआ?

होर्मुज स्ट्रेट का उत्तरी किनारा ईरान और दक्षिणी किनारा ओमान से जुड़ा है। इसकी सबसे संकरी जगह महज 21 नॉटिकल मील यानी करीब 39 किलोमीटर चौड़ी है। शुरुआत में दोनों देशों का समुद्री क्षेत्र 3 नॉटिकल मील तक माना जाता था। समुद्री कानूनों में बदलाव के बाद ईरान ने 1959 में और ओमान ने 1972 में अपनी समुद्री सीमा बढ़ाकर 12-12 नॉटिकल मील, यानी करीब 22-22 किलोमीटर, कर दी। इस बदलाव के बाद स्ट्रेट का सबसे संकरा हिस्सा ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्रों में आ गया। समुद्री यातायात जारी रखने के लिए 2-2 नॉटिकल मील चौड़ी ट्रांजिट लेन बनाई गई।


अब सबसे बड़ी अड़चन क्या है?

अमेरिका के लिए होर्मुज स्ट्रेट से सामान्य जहाजों की आवाजाही बहाल होना युद्ध समाप्त करने का संभावित रास्ता बन सकता है। लेकिन ईरान की मांगें इस समझौते को जटिल बना रही हैं। अमेरिकी सैनिकों की वापसी, प्रतिबंध हटाना, विदेशी संपत्तियां जारी करना और युद्ध के नुकसान का मुआवजा जैसे मुद्दे दोनों पक्षों के बीच सहमति की राह में बड़ी बाधा बन सकते हैं।SEO पैकेज

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