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एयरपोर्ट पर ट्रम्प ने किया शी जिनपिंग का स्वागत, B-1 बॉम्बर से स्टेट डिनर तक क्यों खास है मुलाकात, जाने इस मुलाक़ात से भारत पर क्या पड़ेगा असर?

24 सित, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
एयरपोर्ट पर ट्रम्प ने किया शी जिनपिंग का स्वागत, B-1 बॉम्बर से स्टेट डिनर तक क्यों खास है मुलाकात, जाने इस मुलाक़ात से भारत पर क्या पड़ेगा असर?
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

न्यूयोर्क। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का 23 सितंबर 2026 को जॉइंट बेस एंड्रयूज पर व्यक्तिगत रूप से स्वागत किया। शी के साथ उनकी पत्नी पेंग लियुआन और ट्रम्प के साथ फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रम्प मौजूद थीं।


शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान व्यापार-टैरिफ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ताइवान और रूस से ऊर्जा खरीद जैसे मुद्दे बातचीत के केंद्र में हैं। व्हाइट हाउस में शी और पेंग लियुआन के सम्मान में स्टेट डिनर भी निर्धारित है।


एयरपोर्ट पर ट्रम्प ने किया व्यक्तिगत स्वागत

विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति का सीधे एयरपोर्ट पहुंचना सामान्य प्रोटोकॉल नहीं माना जाता। इस बार ट्रम्प खुद जॉइंट बेस एंड्रयूज पहुंचे और शी जिनपिंग का स्वागत किया। यह शी की 11 साल बाद अमेरिका यात्रा के दौरान हुआ है।


स्वागत समारोह में दोनों देशों के झंडे, सैन्य सम्मान, बैंड, रेड कार्पेट और तोपों की सलामी शामिल रही। समारोह के दौरान दो B-1 बॉम्बर विमानों ने फ्लाईपास्ट किया।


ट्रम्प और मेलानिया ने शी जिनपिंग तथा पेंग लियुआन का अभिवादन किया। इसके बाद दोनों दंपतियों ने स्वागत समारोह में हिस्सा लिया।


व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर

अमेरिकी राष्ट्रपति और फर्स्ट लेडी की ओर से 24 सितंबर की शाम व्हाइट हाउस में शी जिनपिंग और पेंग लियुआन के सम्मान में स्टेट डिनर रखा गया है। इसके अलावा औपचारिक स्वागत समारोह और अन्य कार्यक्रम भी यात्रा का हिस्सा हैं।


इसके बाद ट्रम्प और शी के बीच द्विपक्षीय बातचीत होनी है। दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय से चल रहे आर्थिक और तकनीकी विवादों के साथ कई संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दे भी चर्चा में हैं।


ट्रेड और टैरिफ पर सबसे ज्यादा नजर

अमेरिका और चीन के रिश्तों में व्यापार शुल्क सबसे अहम आर्थिक मुद्दों में शामिल है। दोनों पक्ष टैरिफ कम करने और व्यापारिक तनाव को नियंत्रित रखने के रास्ते तलाश रहे हैं। करीब 30-30 अरब डॉलर के सामान पर शुल्क घटाने तथा ऊर्जा और कृषि उत्पादों से जुड़े टैक्स पर भी चर्चा का उल्लेख किया गया है।


पहले दोनों देशों के बीच टैरिफ संबंधी सहमति की समयसीमा 10 नवंबर बताई गई थी। ताजा घटनाक्रम में अमेरिका-चीन ट्रेड ट्रूस को आगे बढ़ाने की सहमति बनी है, इसलिए बातचीत का फोकस अब इस व्यवस्था को बनाए रखने और व्यापारिक तनाव को कम करने पर भी है।


AI पर पहली बार अलग बातचीत की दिशा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा का नया प्रमुख क्षेत्र बन चुका है। दोनों देशों के बीच AI मॉडल, उन्नत तकनीक और उनसे जुड़े सुरक्षा जोखिमों को लेकर मतभेद हैं।


अमेरिका ने चीन को अत्याधुनिक AI चिप और दूसरी तकनीकों तक पहुंच को लेकर कई प्रतिबंध लगाए हैं। चीन इन नियंत्रणों का विरोध करता रहा है और इन्हें तकनीकी तथा व्यापारिक गतिविधियों में बाधा के रूप में देखता है।


न्यूयॉर्क में हुई हालिया अमेरिकी-चीनी बातचीत में AI से जुड़े जोखिमों पर अलग संवाद शुरू करने की दिशा में चर्चा हुई। अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर माने जाने वाले AI खतरों की जानकारी साझा करने की व्यवस्था का प्रस्ताव भी रखा है।


ताइवान पर दोनों देशों की अलग-अलग नीति

ताइवान भी ट्रम्प-शी वार्ता का संवेदनशील हिस्सा है। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका ताइवान की सुरक्षा के लिए समर्थन देता है।


ताइवान का महत्व केवल सुरक्षा और समुद्री मार्गों तक सीमित नहीं है। वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई में इसकी भूमिका के कारण अमेरिका और चीन दोनों के लिए यह रणनीतिक विषय है।


बातचीत में चीन की ओर से ताइवान को लेकर अमेरिकी समर्थन कम करने की मांग और अमेरिकी नीति से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण रह सकते हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि बैठक से ताइवान को लेकर कोई बड़ा समझौता सामने आएगा या नहीं।


रूस से तेल खरीद भी बातचीत में अहम

रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव भी चीन के लिए महत्वपूर्ण विषय है। चीन रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदता है और रूस के साथ अपने व्यापार में तीसरे देशों के हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है।


अमेरिका रूस से जुड़े ऊर्जा कारोबार पर दबाव बढ़ाने की नीति अपना रहा है। इसलिए चीन की रूसी ऊर्जा खरीद और उससे जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों का मुद्दा दोनों राष्ट्राध्यक्षों की बातचीत में जगह बना सकता है।


एक साल से कम समय में तीसरी मुलाकात

ट्रम्प और शी जिनपिंग की सीधी बातचीत पिछले कुछ समय में लगातार बनी हुई है। एक साल से कम अवधि में यह दोनों नेताओं की तीसरी मुलाकात बताई गई है। इससे पहले भी दोनों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत हुई है, लेकिन अब तक कोई ऐसा बड़ा समझौता सामने नहीं आया है जो दोनों देशों के सभी प्रमुख विवादों को खत्म कर दे।


आगे नवंबर में चीन के शेनझेन में APEC समिट और दिसंबर में अमेरिका के मियामी में G20 समिट के दौरान दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात की चर्चा है। APEC के दौरान ट्रम्प, शी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच संभावित त्रिपक्षीय बैठक का भी उल्लेख किया गया है।


भारत के लिए क्यों अहम है ट्रम्प-शी बातचीत?

अमेरिका और चीन के बीच रिश्तों में बदलाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों तक पहुंच सकता है। इसका एक प्रमुख क्षेत्र वैश्विक सप्लाई चेन है।


अगर अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ संबंधी तनाव कम होता है, तो दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों में बदलाव आ सकता है। इसका असर उन वैश्विक कंपनियों पर भी पड़ सकता है जो चीन के बाहर वैकल्पिक उत्पादन केंद्र तलाश रही हैं।


भारत पर संभावित असर वाले प्रमुख क्षेत्र

- ट्रेड और सप्लाई चेन: अमेरिका-चीन व्यापार नीति में बदलाव से वैश्विक कंपनियों की उत्पादन रणनीति प्रभावित हो सकती है।

- रूसी तेल: चीन और भारत दोनों रूस से ऊर्जा खरीदते हैं, इसलिए रूस से जुड़े अमेरिकी दबाव में बदलाव भारत के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

- AI और चिप्स: अमेरिकी और चीनी तकनीकी नियमों में बदलाव से AI चिप और सेमीकंडक्टर की वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

- टेक्नोलॉजी कारोबार: दोनों देशों के बीच तकनीकी प्रतिबंधों में बदलाव का असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो अमेरिकी और चीनी बाजारों से जुड़ी हैं।


शी जिनपिंग की वॉशिंगटन यात्रा ऐसे समय हो रही है जब अमेरिका और चीन व्यापार से आगे बढ़कर AI, तकनीकी नियंत्रण, ताइवान और ऊर्जा नीति जैसे मुद्दों पर भी आमने-सामने हैं। ट्रम्प का एयरपोर्ट पर व्यक्तिगत स्वागत और यात्रा से जुड़े औपचारिक कार्यक्रम दोनों देशों के रिश्तों में बातचीत के महत्व को दिखाते हैं, जबकि वास्तविक परिणाम द्विपक्षीय वार्ता के फैसलों पर निर्भर करेंगे।

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