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Chhattisgarh

गर्भवती महिला को खाट पर उठाकर पार कराई गई उफनती नदी, व्यवस्था की पोल खोलती एक मार्मिक तस्वीर

04 अक्टू, 20250 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
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Sandeep Sinha
डेस्क रिपोर्टर
Sandeep Sinha

रिपोर्ट - मनमोहन नेताम

गरियाबंद। देवभोग में बीते कुछ दिनों से हो रही लगातार बारिश से जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। नदी-नाले उफान पर हैं और गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से कट चुका है। इसी बीच मैनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत अमाड़ अंतर्गत ग्राम देवझर अमली से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर किया है।

यह मार्मिक घटना 24 वर्षीय गर्भवती महिला पिंकी नेताम की है, जिन्हें प्रसव पीड़ा होने पर उनके परिजनों और ग्रामीणों ने मिलकर खाट पर लिटा कर उफनती नदी पार कराई। यह कार्य बेहद जोखिम भरा था, लेकिन जब कोई और विकल्प ही शेष न बचे, तो ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर यह कदम उठाना पड़ा।
न एम्बुलेंस पहुँची, न कोई प्रशासनिक मदद
ग्रामवासियों के अनुसार, कई बार संपर्क करने के बावजूद एम्बुलेंस या स्वास्थ्य विभाग की कोई सहायता नहीं मिल सकी। भारी बारिश और कटे हुए संपर्क मार्गों के कारण सरकारी तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय नजर आया। ऐसे में सवाल यह उठता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव कब तक लोगों की जान पर बनता रहेगा?
 
“हमने अपनी बेटी को बचाने के लिए जान जोखिम में डाल दी”
 
पिंकी नेताम के परिजनों का कहना है कि उनके पास कोई और चारा नहीं था। “अगर हमने इंतज़ार किया होता, तो शायद बहुत देर हो जाती,” उन्होंने कहा। गांव के अन्य लोग भी इस स्थिति से आक्रोशित हैं और वर्षों से सड़क, पुल और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग कर रहे हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।
 
लाचार परिजन, लापरवाह सिस्टम
 
इस घटना ने यह सवाल फिर से जिंदा कर दिया है कि क्या सिर्फ़ संविधान में दर्ज अधिकारों से कोई देश स्वतंत्र कहलाता है? जब नागरिकों को जीवन की मूलभूत सुविधाएं—जैसे कि सड़क, स्वास्थ्य सेवा, एम्बुलेंस, सुरक्षित प्रसव की सुविधा—नसीब नहीं होती, तो ऐसी स्वतंत्रता का क्या अर्थ रह जाता है?
 
प्रशासन मौन, जनता परेशान
 
स्थानीय प्रशासन इस पूरे मामले पर अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दे सका है। वहीं ग्रामीणों में गहरा रोष है। उनका कहना है कि हर चुनाव में वादे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत में कोई सुधार नहीं होता। चाहे वह बारिश हो या स्वास्थ्य आपातकाल, हर बार गांव वाले खुद ही अपनी लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं।

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