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बायोमार्कर किट कोविड के शुरुआती चरण में ही लगा सकती है बीमारी की गंभीरता का अनुमान, अम्बेडकर अस्पताल के एमआरयू के वैज्ञानिकों ने विकसित किया

03 सित, 20240 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
बायोमार्कर किट कोविड के शुरुआती चरण में ही लगा सकती है बीमारी की गंभीरता का अनुमान, अम्बेडकर अस्पताल के एमआरयू के वैज्ञानिकों ने विकसित किया

बायोमार्कर किट कोविड के शुरुआती चरण में ही लगा सकती है बीमारी की गंभीरता का अनुमान, अम्बेडकर अस्पताल के एमआरयू के वैज्ञानिकों ने विकसित किया

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

रायपुर। डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय के मल्टी डिसिप्लिनरी रिसर्च यूनिट (एमआरयू) के वैज्ञानिकों ने ऐसा बायोमार्कर किट विकसित किया है जो कोविड महामारी संक्रमण की गंभीरता का अनुमान प्रारंभिक चरण में ही लगा लेगा। कोविड-19 के शुरुआती चरण से ही टीम ने शोध कार्य शुरू किया था। शोध के परिणाम हाल ही में साइंटिफिक रिपोर्ट्स 

(https://www.nature.com/articles/s41598-024-70161-8) में प्रकाशित हुई है।

    

प्रतिष्ठित नेचर प्रकाशन समूह की ओर से शोधपत्र प्रकाशित किया गया है। रिसर्च के क्षेत्र में यह दुनिया का 5वां सबसे अधिक संदर्भित किया जाने वाला रिसर्च जर्नल है। महामारी की शुरुआत में, जबकि देश के कई प्रमुख वैज्ञानिक नए कोविड-19 डायग्नोस्टिक टेस्ट किट विकसित करने में जुटे हुए थे, रिसर्च पब्लिकेशन के करेस्पोंडिंग लेखक (प्रिसिंपल इन्वेस्टिगेटर) डॉ. जगन्नाथ पाल ( वरिष्ठ वैज्ञानिक, एमआरयू ) ने कोविड-19 महामारी के प्रबंधन के बुनियादी मुद्दे की दिशा में विचार करना शुरू किया, जो भविष्य में किसी भी महामारी की स्थिति से निपटने के लिए भी उपयोग में आ सकता है।

        

कोविड-19 प्रोग्नोस्टिक बायोमार्कर किट को विकसित करने वाले प्रमुख वैज्ञानिक और टीम लीडर डॉ. जगन्नाथ पाल के अनुसार, कोरोना महामारी के प्रारंभिक चरण में संसाधन एवं एंटी-वायरस दवाओं का बहुतायत मात्रा में प्रयोग हुआ, जिससे गंभीर दवा संकट के साथ-साथ रेमडेसिवीर जैसी जीवन रक्षक दवाओं का संकट भी उत्पन्न हुआ। शुरुआती चरण में यह पता लगाना मुश्किल होता था कि किन कोरोना रोगियों को मेडिकल की अग्रिम सुविधा की आवश्यकता है या नहीं ? इसलिए पूर्वानुमानित परिणाम के आधार पर रोगियों के संक्रमण की गंभीरता को अलग-अलग श्रेणी में विभाजन करना आवश्यक था, जिससे कि इन संसाधनों का गंभीर कोरोना रोगियों में उपयोग किया जा सके, परन्तु उस समय कोई भी ऐसा टेस्ट/जांच उपलब्ध नहीं था जिससे कि प्रारंभिक चरण में ही कोरोना रोगियों की गंभीरता का पता चल सके।

 

तीन साल के परिश्रम के बाद मिली सफलता

डॉ. पाल के नेतृत्व में एमआरयू रिसर्च टीम ने उपलब्ध सीमित संसाधन का इस्तेमाल करके इस दिशा में काम करना शुरू किया और अंततः बायोमार्कर किट विकसित करने में सफलता हासिल कर ली, जिसका उपयोग करके कोरोना के गंभीरता की भविष्यवाणी प्रारंभिक चरण में ही की जा सकती है। इस शोध कार्य में वैज्ञानिकों ने क्यू पीसीआर आधारित टेस्ट का उपयोग करके एक सीवियरिटी स्कोर विकसित किया। जिनकी संवेदनशीलता 91 प्रतिशत और विशेषता 94 प्रतिशत है। इस शोध दल में एक अन्य एमआरयू वैज्ञानिक डॉ. योगिता राजपूत, पेपर की पहली लेखिका ने विभिन्न विभागों के अन्य बहु-विषयक योगदानकर्ताओं के साथ समन्वय करते हुए चुनौतीपूर्ण परियोजना को मूर्त रूप में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


पेटेंट के लिए भी आवेदन किया है

डॉ. पाल के आविष्कार के संभावित व्यावसायिक मूल्य को ध्यान में रखते हुए पं. जेएनएम मेडिकल कॉलेज ने भारतीय पेटेंट के साथ-अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट के लिए भी आवेदन किया है। डॉ. पाल के अनुसार, हाल ही में अमेरिका की पेटेंट सर्च एजेंसी ने अमेरिका में आविष्कार के संभावित व्यावसायिक महत्व को दर्शाते हुए उत्साहजनक रिपोर्ट प्रदान की है। इसका मतलब है कि भारत की आर्थिक वृद्धि में योगदान देने वाली चिकित्सा प्रौद्योगिकी को विदेशों में निर्यात करने का अवसर हमें मिल सकता है। एमआरयू का रिसर्च हमारे देश के प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया अभियान को भी बरकरार रखेगा।

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