
नीट पेपर लीक को लेकर देशभर में आक्रोश है। जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया तक सरकार, परीक्षा एजेंसियों और व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल उठने भी चाहिए, क्योंकि निष्पक्ष परीक्षा कराना सरकार और संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
पेपर लीक कभी एक व्यक्ति से नहीं होता। इसके पीछे एक पूरा नेटवर्क होता है कोई पेपर चुराता है, कोई बेचता है और कोई खरीदता है। यदि खरीदने वाला कोई न हो, तो बेचने का बाजार भी नहीं बचेगा। इसलिए हमें एक कठिन लेकिन जरूरी प्रश्न भी पूछना होगा जो अभिभावक लाखों रुपए देकर अपने बच्चों के लिए पेपर खरीदते हैं, उनकी जिम्मेदारी क्या है? क्या वे केवल व्यवस्था के शिकार हैं, या समस्या का हिस्सा भी?
यह भी सच है कि अधिकांश विद्यार्थी ईमानदारी से मेहनत करते हैं और ऐसे हर पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं को उठाना पड़ता है। यदि समाज का एक छोटा-सा वर्ग भी गलत तरीके से सफलता खरीदने को तैयार है, तो वह पूरे परीक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाता है।
हमें अपने आप से भी एक असहज प्रश्न पूछना चाहिए यदि किसी व्यक्ति को बिना पकड़े जाने की पूरी गारंटी मिले, तो क्या वह पेपर खरीदने से इंकार करेगा? हर व्यक्ति का उत्तर अलग होगा, लेकिन यही प्रश्न समाज की नैतिक स्थिति का आईना है।
पेपर लीक केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक विफलता भी है। जब तक सफलता का मूल्य ईमानदारी से अधिक और परिणाम का महत्व प्रक्रिया से बड़ा रहेगा, तब तक केवल गिरफ्तारियां, नए कानून या मंत्रियों के इस्तीफे इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन पाएंगे।
ईमानदार परीक्षार्थी महज निष्पक्ष व्यवस्था के हकदार नहीं हैं। वे ऐसे समाज के भी हकदार हैं, जहां उनके सपनों की कीमत किसी और की बेईमानी से तय न हो।
समाधान तभी संभव, जब तीनों स्तरों पर एक साथ काम हो
. सरकार निष्पक्ष और सुरक्षित परीक्षा प्रणाली सुनिश्चित करे।
. अपराधियों के विरुद्ध त्वरित और कठोर कार्रवाई हो।
. समाज, अभिभावक और विद्यार्थी यह तय करें कि सफलता खरीदी नहीं जाएगी।
(लेखक, वरिष्ठ मनोचिकित्सक हैं। )
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