शनिवार, 25 जुलाई 2026
Logo
Madhaya Pradesh

एम्स भोपाल में सिलिकोसिस के मरीज को नई सांस, मध्य भारत में पहली बार ‘होल लंग्स लैवेज’ से बची जान

03 फ़र, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
एम्स भोपाल में सिलिकोसिस के मरीज को नई सांस, मध्य भारत में पहली बार ‘होल लंग्स लैवेज’ से बची जान

एम्स भोपाल में सिलिकोसिस के मरीज को नई सांस, मध्य भारत में पहली बार ‘होल लंग्स लैवेज’ से बची जान

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। पत्थर और सीमेंट से बनी ऊंची इमारतें हमें जितनी मजबूत दिखती हैं, उनके पीछे काम करने वाले मजदूर उतने ही असुरक्षित होते हैं। इन्हीं मजदूरों की सांसें चुपचाप निगल लेने वाली खतरनाक बीमारी है सिलिकोसिस। हाल ही में ऐसा ही एक गंभीर मामला AIIMS Bhopal में पहुंचा, जहां स्टोन क्रशर में काम करने वाला एक मजदूर मौत से जूझ रहा था। डॉक्टरों ने एक दुर्लभ और जटिल प्रक्रिया से उसे नई जिंदगी दे दी।


मध्य भारत में पहली बार अपनाई गई खास तकनीक

एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने इस मरीज के इलाज के लिए होल लंग्स लैवेज (Whole Lung Lavage) नाम की प्रक्रिया अपनाई। इसमें फेफड़ों के अंदर जमी धूल और प्रोटीन को सलाइन वाटर से धोकर बाहर निकाला जाता है।

एम्स प्रबंधन के मुताबिक, यह मध्य भारत में पहली बार है जब सिलिकोसिस से प्रभावित फेफड़ों को इस तकनीक से सफलतापूर्वक साफ किया गया।


स्टोन क्रशर की धूल से बिगड़े फेफड़े

एम्स के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रोफेसर Dr Alokesh Khurana और असिस्टेंट प्रोफेसर Dr Abhinav Khurana ने बताया कि मरीज लंबे समय से स्टोन क्रशर में काम कर रहा था। वहां उड़ने वाली बेहद बारीक सिलिका धूल उसके फेफड़ों में जमा होती चली गई, जिससे डिफ्यूज एल्वियोलर प्रोटीनोसिस की स्थिति बन गई। इसमें फेफड़ों की हवा वाली थैलियों में प्रोटीन भर जाता है और ऑक्सीजन का आदान-प्रदान रुकने लगता है।


6 घंटे चला बेहद जोखिमभरा इलाज

होल लंग्स लैवेज के दौरान फेफड़ों में 6 से 8 लीटर तक सलाइन वाटर डाला जाता है और फिर उसे बाहर निकाला जाता है, ताकि जमा प्रोटीन साफ हो सके।

यह प्रक्रिया बेहद खतरनाक होती है, क्योंकि ज्यादा पानी फेफड़ों में जाने से मरीज की जान को खतरा हो सकता है। डॉक्टरों की टीम ने करीब 6 घंटे तक मरीज के ऑक्सीजन स्तर, दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर पर लगातार नजर रखी।


कार्डियक ओटी में हुआ ऑपरेशन

यह पूरी प्रक्रिया कार्डियक ओटी में की गई, जिसमें कार्डियक थोरेसिक सर्जन Dr Yogesh Nivaria भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि जब एक फेफड़ा साफ किया जाता है, तो मरीज को दूसरे फेफड़े के सहारे ही सांस लेनी पड़ती है। इस मरीज में दोनों फेफड़े कमजोर थे, फिर भी डॉक्टरों की सतर्कता से उसे हार्ट-लंग मशीन पर जाने की जरूरत नहीं पड़ी।


क्या है सिलिकोसिस और क्यों है यह जानलेवा

सिलिकोसिस सिलिका धूल से होने वाली बीमारी है। यह धूल सांस के साथ फेफड़ों में पहुंचकर वहां जम जाती है और धीरे-धीरे फेफड़ों को पत्थर की तरह सख्त बना देती है।

शुरुआत में सांस फूलना, खांसी और थकान होती है, लेकिन गंभीर स्थिति में शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और जान का खतरा हो जाता है।


मजदूर सबसे ज्यादा खतरे में

खदानों, स्टोन क्रशर, सीमेंट फैक्ट्रियों और कांच-सिरेमिक उद्योगों में काम करने वाले मजदूर सिलिकोसिस के सबसे बड़े शिकार होते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी से बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है – इसके लिए मास्क, धूल नियंत्रण और नियमित स्वास्थ्य जांच बेहद जरूरी है।

पाठकों की राय (0)

इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

अपनी प्रतिक्रिया दें