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अस्पतालों का पैसा अटका, 1 अक्टूबर की तलवार लटकी; आयुष्मान CEO अरविंद शाह से जवाब मांग रहे निजी अस्पताल

30 सित, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
अस्पतालों का पैसा अटका, 1 अक्टूबर की तलवार लटकी; आयुष्मान CEO अरविंद शाह से जवाब मांग रहे निजी अस्पताल
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। आयुष्मान योजना में इलाज करने वाले निजी अस्पतालों का भुगतान महीनों से अटकने और 1 अक्टूबर से NABH की शर्त को लेकर भोपाल में निजी अस्पतालों का गुस्सा अब खुलकर सामने आ गया है। डॉक्टर और अस्पताल संचालक आयुष्मान योजना के कार्यालय पहुंचकर प्रदर्शन कर रहे हैं। सवाल अब सिर्फ अस्पतालों का नहीं है सवाल उस व्यवस्था की जवाबदेही का है, जिसकी कमान फिलहाल आयुष्मान भारत मध्य प्रदेश के CEO अरविंद शाह के हाथों में है।


निजी अस्पतालों का आरोप है कि जब अस्पतालों को महीनों से उनका भुगतान नहीं मिल रहा, तब दूसरी ओर नई शर्तें लागू कर अस्पतालों पर अनुपालन का दबाव बनाया जा रहा है। ऐसे में अस्पताल संचालक सीधे सवाल उठा रहे हैं कि पहले लंबित भुगतान का रास्ता साफ होगा या फिर अस्पतालों को नियमों की नई बाधाओं में उलझाया जाएगा?


करोड़ों का भुगतान अटका, अस्पतालों का बढ़ता दबाव

प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के बैनर तले अस्पताल संचालकों ने लंबित भुगतान जारी करने और NABH की अनिवार्यता हटाने की मांग की है। अस्पताल संगठनों के अनुसार भोपाल में करीब 468 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से जुड़े हैं और प्रत्येक अस्पताल का औसतन 1.5 से 2 करोड़ रुपये तक भुगतान लंबित बताया जा रहा है। अस्पताल संचालकों का दावा है कि करीब 5-6 महीने से भुगतान नहीं मिला है।


यदि अस्पतालों के बताए इन आंकड़ों को आधार माना जाए तो लंबित रकम का आकार बेहद बड़ा हो सकता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी वित्तीय देनदारी के बीच भुगतान व्यवस्था को लेकर जिम्मेदारी किसकी है?


CEO अरविंद शाह के सामने सबसे बड़ा सवाल

आयुष्मान भारत मध्य प्रदेश के CEO के तौर पर अरविंद शाह योजना के संचालन और अस्पतालों के साथ समन्वय से जुड़े शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों में हैं। हाल ही में योजना के तहत अस्पतालों पर कार्रवाई और निगरानी को लेकर भी उनका नाम सामने आया है। सितंबर में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक 2026 में 83 अस्पतालों पर कार्रवाई हुई, जिनमें डी-एम्पैनलमेंट, निलंबन और जुर्माना शामिल था। ऐसे में निजी अस्पतालों के प्रदर्शन के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है की, जब अस्पतालों से नियमों के पालन की सख्ती से अपेक्षा की जा रही है, तो अस्पतालों के लंबित भुगतान की समयबद्ध जिम्मेदारी कौन तय करेगा?


1 अक्टूबर से NABH की शर्त, अस्पतालों में बेचैनी

भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के निजी अस्पतालों के लिए 1 अक्टूबर 2026 से NABH से जुड़ी नई व्यवस्था लागू होने की रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक चार शहरों में निजी अस्पतालों के लिए NABH प्रमाणन की शर्त महत्वपूर्ण होने जा रही है। अस्पताल संगठनों की आपत्ति NABH की गुणवत्ता व्यवस्था से नहीं, बल्कि उसकी अनिवार्यता, लागत और समयसीमा से है। अस्पताल संचालकों का कहना है कि छोटे और मध्यम अस्पतालों के लिए NABH की प्रक्रिया आर्थिक और प्रशासनिक रूप से भारी पड़ सकती है।


भुगतान नहीं, ऊपर से नई शर्त

अस्पताल संचालकों की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण यही है कि एक तरफ महीनों से भुगतान अटका होने की बात कही जा रही है और दूसरी तरफ अस्पतालों को नई गुणवत्ता संबंधी शर्त पूरी करने के लिए तैयार रहना है। यानी अस्पतालों के सामने दोहरा दबाव है, बकाया भुगतान का संकट और 1 अक्टूबर की NABH की समयसीमा। यहीं से CEO अरविंद शाह की जवाबदेही पर सवाल और तीखे हो जाते हैं।


क्या 1 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर डी-एम्पैनलमेंट होगा?

अस्पताल संगठनों का दावा है कि उन्हें ऐसी जानकारी मिल रही है कि 1 अक्टूबर से चार प्रमुख शहरों में बड़ी संख्या में अस्पताल आयुष्मान नेटवर्क से बाहर किए जा सकते हैं। हालांकि, अभी तक संबंधित अस्पतालों की अंतिम आधिकारिक सूची या बड़े पैमाने पर डी-एम्पैनलमेंट का अंतिम आदेश सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। इसलिए कितने अस्पताल प्रभावित होंगे, इसका अंतिम आंकड़ा अभी स्पष्ट नहीं है। यही वजह है कि अस्पताल संगठन सरकार और आयुष्मान प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं।


छोटे अस्पताल बाहर हुए तो मरीज कहां जाएंगे?

यह विवाद सिर्फ अस्पताल संचालकों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर आयुष्मान कार्डधारी मरीजों की पहुंच पर पड़ सकता है। अगर बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम अस्पताल योजना के नेटवर्क से बाहर होते हैं तो मरीजों को दूसरे सूचीबद्ध अस्पतालों की ओर जाना पड़ेगा। इससे बड़े अस्पतालों पर मरीजों का अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका अस्पताल संगठनों ने जताई है।


गुणवत्ता के नाम पर व्यवस्था तो ठीक, लेकिन जवाबदेही भी तय हो

NABH जैसी गुणवत्ता व्यवस्था का उद्देश्य अस्पतालों में मानक सुधारना है। लेकिन निजी अस्पताल संगठनों का सवाल यह है कि क्या गुणवत्ता सुधार की जिम्मेदारी सिर्फ अस्पतालों की है? अगर अस्पतालों से स्टाफ, उपकरण, रिकॉर्ड, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रमाणन के मानक पूरे करने की अपेक्षा है, तो योजना प्रशासन से भी यह पूछा जाना चाहिए कि लंबित भुगतान समय पर क्यों नहीं हुआ और अस्पतालों की आपत्तियों पर समय रहते समाधान क्यों नहीं निकला।


अब अरविंद शाह से सीधे जवाब की मांग

निजी अस्पतालों के प्रदर्शन के बाद मामला अब सिर्फ ज्ञापन और नारेबाजी तक सीमित नहीं दिख रहा। अस्पताल संचालक चाहते हैं कि आयुष्मान प्रशासन सामने आकर स्पष्ट करे—

महीनों से लंबित भुगतान कब तक जारी होगा?

अस्पतालों के लंबित क्लेम का निपटारा किस समयसीमा में होगा?

1 अक्टूबर से वास्तव में कितने अस्पताल प्रभावित होंगे?

क्या NABH की शर्त में छोटे और मध्यम अस्पतालों के लिए व्यावहारिक राहत दी जाएगी?

क्या बिना NABH वाले अस्पतालों को अचानक आयुष्मान मरीजों के इलाज से बाहर किया जाएगा?

और सबसे महत्वपूर्ण—अस्पतालों की समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी आखिर किस अधिकारी की है?


बात नहीं बनी तो आंदोलन प्रदेशभर में

अस्पताल संगठनों ने साफ संकेत दिया है कि यदि लंबित भुगतान जारी नहीं हुआ और 1 अक्टूबर से बड़े स्तर पर डी-एम्पैनलमेंट की कार्रवाई हुई तो आंदोलन को प्रदेशभर में ले जाया जाएगा। अब गेंद आयुष्मान प्रशासन के पाले में है। CEO अरविंद शाह के सामने चुनौती सिर्फ NABH लागू कराने की नहीं, बल्कि भुगतान संकट और निजी अस्पतालों की नाराजगी को संभालने की भी है।


फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या 1 अक्टूबर से पहले आयुष्मान प्रशासन अस्पतालों का बकाया साफ करेगा और NABH को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान निकालेगा, या फिर निजी अस्पतालों का यह विरोध प्रदेशव्यापी टकराव में बदल जाएगा?

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