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कौन हैं बंशीलाल गुर्जर? सरपंच से राज्यसभा और अब BJP किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक का सफर

18 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
कौन हैं बंशीलाल गुर्जर? सरपंच से राज्यसभा और अब BJP किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक का सफर
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। मंदसौर की जमीनी राजनीति से निकले बंशीलाल गुर्जर अब भाजपा की राष्ट्रीय किसान राजनीति का चेहरा होंगे। पंचायत से शुरू हुआ सफर राज्यसभा तक पहुंचा और अब किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि उन्हें पद क्यों मिला, बल्कि यह है कि भाजपा ने किसान संगठन की कमान के लिए गुर्जर पर ही भरोसा क्यों जताया?


भोपाल। भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय संगठन में बड़े बदलाव करते हुए मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद बंशीलाल गुर्जर को किसान मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया है। यह फैसला भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम की घोषणा के साथ सामने आया। मध्य प्रदेश से कई नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जिम्मेदारियां मिली हैं और इसी कड़ी में गुर्जर को किसान मोर्चे की कमान सौंपी गई है।


पहली नजर में यह एक संगठनात्मक नियुक्ति है, लेकिन गुर्जर की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखें तो इसके मायने इससे कहीं बड़े दिखाई देते हैं। वह लंबे समय से किसान राजनीति और भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं। पंचायत स्तर से शुरू हुई उनकी राजनीति ने मंडी, जिला संगठन, किसान मोर्चा, राज्य सरकार से जुड़े दायित्व और फिर संसद तक का सफर तय किया। 2024 में भाजपा ने उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा और अब दो साल के भीतर उन्हें राष्ट्रीय किसान संगठन की कमान भी मिल गई है।


किसान नेता की पहचान ही बनी सबसे बड़ी ताकत

बंशीलाल गुर्जर की राजनीति को समझने के लिए मंदसौर से निकलकर दिल्ली तक पहुंची उनकी यात्रा को देखना होगा। मंदसौर शहर से सटे लालघाटी गांव से आने वाले गुर्जर ने स्थानीय राजनीति से अपनी शुरुआत की। उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक वह दो बार अपने गांव के सरपंच रहे। इसके बाद जनपद सदस्य और जिला पंचायत सदस्य की भूमिका निभाई। मंदसौर कृषि उपज मंडी की राजनीति में भी उनकी लंबी पारी रही और वह कई वर्षों तक मंडी अध्यक्ष रहे। भाजपा संगठन में मंदसौर ग्रामीण मंडल अध्यक्ष से लेकर कार्यवाहक जिलाध्यक्ष और प्रदेश स्तर की जिम्मेदारियों तक उन्होंने काम किया। बाद में किसान मोर्चे की प्रदेश और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों तक पहुंचे।


यानी गुर्जर की राजनीतिक पहचान किसी एक चुनाव या एक पद से नहीं बनी। उनकी राजनीति का आधार गांव, मंडी, किसान संगठन और भाजपा का कैडर नेटवर्क रहा है।


यही वह प्रोफाइल है जो उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करती है। भाजपा ने किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए ऐसे नेता को चुना है जिसकी राजनीतिक पहचान लंबे समय से किसान और संगठन दोनों से जुड़ी रही है।


पंचायत से संसद तक की सीढ़ियां

गुर्जर की राजनीतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने सीधे किसी बड़े चुनावी पद से शुरुआत नहीं की। उनकी राजनीति स्थानीय निकाय और संगठन से आगे बढ़ी। लालघाटी के सरपंच से लेकर जनपद और जिला पंचायत तक पहुंचना, फिर कृषि मंडी की राजनीति में प्रभाव बनाना और उसके बाद भाजपा संगठन में जिम्मेदारियां हासिल करना—यह सफर बताता है कि उनकी राजनीति का बड़ा हिस्सा जमीनी संगठन के साथ गुजरा है। पुराने समाचारों में उनके भाजपा संगठन के विभिन्न पदों और किसान मोर्चे की जिम्मेदारियों का उल्लेख मिलता है।


यही वजह है कि उनकी नई जिम्मेदारी को केवल दिल्ली में मिला एक संगठनात्मक पद मानना अधूरा होगा। किसान मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ उनके सामने अब वही जमीनी अनुभव देशभर में पार्टी के किसान नेटवर्क के लिए इस्तेमाल करने की चुनौती होगी।


2024 में राज्यसभा: दिल्ली की राजनीति में बड़ा प्रवेश

फरवरी 2024 में भाजपा ने बंशीलाल गुर्जर को मध्य प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार घोषित किया। उस समय वह भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और HUDCO के निदेशक थे। बाद में वह निर्विरोध राज्यसभा के लिए चुने गए। यह नियुक्ति अपने आप में महत्वपूर्ण थी। एक तरफ भाजपा ने लंबे समय से किसान संगठन से जुड़े चेहरे को संसद भेजा, दूसरी तरफ मंदसौर और मालवा-निमाड़ की क्षेत्रीय राजनीति को राष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधित्व मिला। अब 2026 में किसान मोर्चे की राष्ट्रीय कमान मिलना इस राजनीतिक यात्रा का अगला पड़ाव है।


संसद में भी किसान और ग्रामीण मुद्दों से जुड़ी मौजूदगी

राज्यसभा सदस्य बनने के बाद गुर्जर की भूमिका सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं रही। PRS India के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 13 अगस्त 2026 तक उनके राज्यसभा रिकॉर्ड में 93 प्रतिशत उपस्थिति, 129 बहसों में भागीदारी और 40 सवाल दर्ज हैं। यह आंकड़े 2024 में उनके राज्यसभा कार्यकाल शुरू होने से लेकर उपलब्ध नवीनतम संसदीय डेटा तक के हैं। उनकी संसदीय भागीदारी में अलग-अलग राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दे शामिल रहे हैं। किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सवाल भी उनके संसदीय हस्तक्षेप का हिस्सा रहे हैं।


मंदसौर क्यों महत्वपूर्ण है?

बंशीलाल गुर्जर की नियुक्ति का सबसे दिलचस्प राजनीतिक संदर्भ मंदसौर है। मंदसौर लंबे समय से मध्य प्रदेश की किसान राजनीति में संवेदनशील क्षेत्र रहा है। 2017 का किसान आंदोलन और उसके दौरान हुई पुलिस फायरिंग ने पूरे देश में इस क्षेत्र को किसान असंतोष के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया था। बाद के चुनावों में भी यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा। ऐसे क्षेत्र से आने वाले किसान नेता को भाजपा के राष्ट्रीय किसान संगठन की कमान मिलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक ध्यान खींचता है।


यह कहना सही नहीं होगा कि 2017 की घटना ही गुर्जर की नियुक्ति का कारण है। इसके लिए कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इतना जरूर कहा जा सकता है कि मंदसौर की किसान राजनीति की पृष्ठभूमि में वहां से निकले नेता को राष्ट्रीय किसान संगठन की जिम्मेदारी मिलना भाजपा के लिए एक मजबूत राजनीतिक संदेश जरूर बन सकता है। यानी जिस क्षेत्र की पहचान कभी किसान असंतोष के कारण राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी, उसी क्षेत्र का एक किसान नेता अब देशभर में भाजपा की किसान राजनीति को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभालेगा।


गुर्जर फैक्टर भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

मंदसौर-नीमच क्षेत्र का एक और राजनीतिक महत्व है। यह इलाका राजस्थान की सीमा से जुड़ा है और गुर्जर समाज की मौजूदगी मध्य प्रदेश के साथ राजस्थान में भी महत्वपूर्ण है। 2024 में गुर्जर को राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने के समय कई राजनीतिक विश्लेषणों ने उनकी उम्मीदवारी को किसान प्रतिनिधित्व के साथ सामाजिक समीकरणों से भी जोड़कर देखा था। लेकिन किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति को सिर्फ गुर्जर वोट की राजनीति से जोड़ना जल्दबाजी होगी। उनका किसान संगठन का लंबा अनुभव और राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक काम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।


राजकुमार चाहर से बंशीलाल गुर्जर तक—क्या बदला?

किसान मोर्चे की नई नियुक्ति को समझने के लिए पिछली व्यवस्था पर नजर डालना भी जरूरी है। बंशीलाल गुर्जर से पहले राजकुमार चाहर किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। अब भाजपा ने यह जिम्मेदारी मध्य प्रदेश के राज्यसभा सांसद को दी है। यह बदलाव अपने आप में किसी नीति परिवर्तन का प्रमाण नहीं है, लेकिन नेतृत्व की प्रोफाइल में अंतर जरूर दिखाई देता है। गुर्जर की पहचान लंबे समय से किसान संगठन और कृषि मंडी की राजनीति से जुड़ी रही है, जबकि अब उनके पास संसद का अनुभव भी है।


अब असली परीक्षा शुरू होगी

बंशीलाल गुर्जर के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद सम्मान से ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है। किसान मोर्चे के सामने देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मुद्दे हैं। कहीं MSP बड़ा सवाल है, कहीं फसल की कीमत, कहीं सिंचाई, कहीं आवारा पशु, कहीं खाद-बीज और कहीं किसान संगठनों की नाराजगी।


ऐसे में गुर्जर की चुनौती केवल भाजपा के किसान कार्यक्रम आयोजित करने की नहीं होगी। उन्हें किसान संगठनों और स्थानीय किसानों के मुद्दों को पार्टी के राजनीतिक एजेंडे से जोड़ना होगा।


दूसरी चुनौती यह होगी कि किसान मोर्चा सिर्फ पार्टी के कार्यक्रमों तक सीमित न रहे, बल्कि गांवों और कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर लगातार सक्रिय दिखाई दे।


तीसरी चुनौती आने वाले चुनावों की है। किसान और ग्रामीण मतदाता भारतीय चुनावी राजनीति में हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। इसलिए किसान मोर्चे की सक्रियता का असर केवल संगठनात्मक स्तर पर नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति में भी दिखाई देता है।


2029 की तैयारी के संदर्भ में भी अहम

2026 में किसान मोर्चे की कमान बदलने का अर्थ केवल तत्कालीन संगठनात्मक जरूरतों से जोड़ना जल्दबाजी होगी। लेकिन अगले लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा को अभी से किसान और ग्रामीण क्षेत्रों में अपना संगठन मजबूत करना होगा।


यही वजह है कि गुर्जर की नियुक्ति को 2029 के व्यापक संगठनात्मक संदर्भ में भी देखा जा सकता है।


हालांकि यह कहना कि “उन्हें 2029 चुनाव के लिए ही नियुक्त किया गया है” तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि भाजपा ने नियुक्ति का ऐसा कोई आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया है।


लेकिन उनकी किसान पृष्ठभूमि, राज्यसभा अनुभव और अलग-अलग राज्यों में संगठनात्मक काम को देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि पार्टी को एक ऐसा चेहरा मिला है जिसे राष्ट्रीय किसान राजनीति में इस्तेमाल किया जा सकता है।

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