
भोपाल। मध्यप्रदेश में बेतवा नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए व्यापक तैयारी शुरू हो गई है। नमामि गंगे मिशन के तहत सरकार केवल नदी की सफाई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर ऐसी दीर्घकालिक योजना तैयार की जाएगी, जिससे पूरे नदी तंत्र को पुनर्जीवित किया जा सके। इस उद्देश्य से भोपाल में अधिकारियों और इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के आधार पर बेतवा नदी के लिए विस्तृत डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की जाएगी, जिसमें नदी से जुड़ी पर्यावरणीय और तकनीकी चुनौतियों का समाधान शामिल होगा।
सबसे पहले प्रदूषण प्रभावित हिस्सों पर रहेगा फोकस
अधिकारियों के अनुसार बेतवा नदी का उद्गम रायसेन जिले के झिरी क्षेत्र के जंगलों में होता है। उद्गम के बाद भोपाल, रायसेन और विदिशा जिलों में नदी प्रदूषण की समस्या से प्रभावित हो रही है। भोजपुर के पास कलियासोत और बेतवा का संगम क्षेत्र तथा मंडीदीप के आसपास नदी का बड़ा हिस्सा जलकुंभी से प्रभावित है। इसी कारण इन तीनों जिलों को संरक्षण कार्यों की प्राथमिकता में रखा गया है।
सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण रोकने पर विशेष योजना
सरकार की रणनीति में सीवेज को नदी में पहुंचने से रोकना प्रमुख लक्ष्य है। इसके लिए भोपाल, रायसेन और विदिशा के नगरीय निकायों के इंजीनियरों को विशेषज्ञों द्वारा तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। मंडीदीप क्षेत्र में अब तक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बनने के कारण उद्योगों का प्रदूषित पानी सीधे बेतवा नदी में पहुंच रहा है। इसका प्रभाव नदी के साथ आसपास की कृषि भूमि पर भी पड़ रहा है। सरकार का उद्देश्य नदी की धारा को स्वच्छ और निरंतर प्रवाहित बनाए रखना है।
डीपीआर में इन विषयों को मिलेगी जगह
प्रस्तावित डीपीआर में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया जाएगा, जिनमें—
- सीवेज प्रबंधन
- प्रदूषण नियंत्रण
- अपशिष्ट जल और ठोस कचरा प्रबंधन
- पर्यावरणीय प्रवाह बढ़ाना
- नदी तटों का पुनर्स्थापन
- जैव विविधता संरक्षण
- जलग्रहण क्षेत्र का उपचार
- जनभागीदारी को बढ़ावा
अधिकारियों को दी जा रही तकनीकी तैयारी
परियोजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए क्षेत्रीय अधिकारियों को विभिन्न तकनीकी पहलुओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें डेटा संग्रह, विभागों के बीच समन्वय, हितधारकों से परामर्श और परियोजना संचालन से जुड़ी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
बेतवा के सामने ये बड़ी चुनौतियां
प्रस्तुति में बेतवा नदी के सामने मौजूद प्रमुख समस्याओं का भी उल्लेख किया गया। इनमें—
- अनुपचारित सीवेज
- औद्योगिक अपशिष्ट
- नदी तटों का कटाव
- पर्यावरणीय प्रवाह में कमी
इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक और टिकाऊ डीपीआर तैयार की जाएगी।
मध्यप्रदेश के गंगा बेसिन का दायरा
अधिकारियों ने बताया कि नमामि गंगे भारत सरकार का एकीकृत नदी संरक्षण मिशन है। मध्यप्रदेश का गंगा बेसिन 34 जिलों और 283 शहरी निकायों तक फैला है। इस बेसिन में 11 प्रमुख नदियां शामिल हैं, जिनमें चंबल, बेतवा, सिंध, काली सिंध, धसान, केन, क्षिप्रा, गंभीर, टोंस, सोन और पावती शामिल हैं।
दूसरे चरण में प्रदेश को मिलीं आठ परियोजनाएं
नमामि गंगे मिशन के दूसरे चरण में मध्यप्रदेश को ₹824.57 करोड़ की 8 परियोजनाएं स्वीकृत हो चुकी हैं। इन सभी योजनाओं को 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता से लागू किया जा रहा है।
इन परियोजनाओं में शामिल हैं—
- इंदौर, उज्जैन और नागदा में सीवेज प्रबंधन एवं प्रदूषण नियंत्रण
- चित्रकूट (सतना) में मंदाकिनी नदी पर घाट निर्माण
- मंदसौर में शिवना नदी का पर्यावरण उन्नयन
- ग्वालियर में मोरार नदी पुनर्जीवन एवं रिवर फ्रंट विकास की दो परियोजनाएं
- मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) की चार प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण
सबसे बड़ी परियोजना इंदौर में
स्वीकृत योजनाओं में सबसे बड़ी परियोजना इंदौर की कान्ह एवं सरस्वती नदी प्रदूषण नियंत्रण परियोजना है, जिसकी स्वीकृत लागत ₹511.15 करोड़ है।
नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरुआत
भारत सरकार ने वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया था। पहले चरण में गंगा तटीय राज्यों में सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कार्य किए गए। दूसरे चरण में गंगा की सहायक नदियों वाले राज्यों, जिनमें मध्यप्रदेश भी शामिल है, में नदी संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई।
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