
भोपाल के पास बेतवा नदी का उद्गम सूखने की कगार पर है—लेकिन अब इसे बचाने के लिए बड़ा अभियान शुरू होने जा रहा है। 26 अप्रैल से 2 मई 2026 तक एक हफ्ते का श्रमदान कार्यक्रम तय हुआ है, जिसमें आम लोग भी हिस्सा ले सकेंगे।
कहां और कैसे होगा अभियान
यह पहल झिरी गांव में स्थित बेतवा नदी उद्गम स्थल पर आयोजित की जाएगी। इस अभियान में मध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी और स्थानीय ग्रामीण मिलकर काम करेंगे। उद्देश्य साफ है—सूखते स्रोत को फिर से जीवंत बनाना और पानी को रोकने के स्थायी उपाय तैयार करना।
पिछले साल सूख गया था उद्गम
आयोजकों के अनुसार, पिछले साल गर्मियों में उद्गम स्थल पूरी तरह सूख गया था। यह स्थिति सिर्फ स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि बड़े जल संकट का संकेत मानी गई। इसके बाद मई में श्रमदान शिविर लगाया गया, जिसमें 55 चेक डैम बनाए गए। इससे जल संचयन में सुधार हुआ और कुछ हद तक पानी वापस लौटने लगा—जिससे उम्मीद जगी।
इस बार लक्ष्य—पूरी तरह पुनर्जीवन
इस साल अभियान को और बड़े स्तर पर आयोजित किया जा रहा है। लक्ष्य सिर्फ अस्थायी सुधार नहीं, बल्कि उद्गम स्थल को पूरी तरह पुनर्जीवित करना है। इसके तहत नए चेक डैम बनाए जाएंगे, जल प्रवाह मार्गों की सफाई होगी और ऐसी संरचनाएं तैयार की जाएंगी, जो लंबे समय तक पानी को संरक्षित रख सकें—यही इस अभियान की खास बात है।
देशभर के विशेषज्ञ भी जुड़ेंगे
इस पहल में कई अनुभवी और प्रतिष्ठित लोग शामिल हो रहे हैं। इनमें आरके पालीवाल, राजेश बादल, आबिद सूरती, अभिलाष खांडेकर और बाबूलाल दाहिया जैसे नाम शामिल हैं। इनके साथ सेवानिवृत्त अधिकारी, डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता भी जुड़ रहे हैं—जिससे अभियान को अनुभव और दिशा दोनों मिलेंगे।
आम लोगों के लिए भी खुला है मौका
आयोजकों ने साफ किया है कि यह पूरी तरह सामुदायिक पहल है। इसमें कोई भी व्यक्ति शामिल होकर श्रमदान कर सकता है। उनका मानना है कि जब स्थानीय लोग खुद आगे आते हैं, तभी ऐसे प्रयास लंबे समय तक सफल रहते हैं—और यही मॉडल इस अभियान में अपनाया जा रहा है।
क्यों अहम है बेतवा को बचना
बेतवा नदी मध्य भारत की प्रमुख नदियों में से एक है, जो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से को प्रभावित करती है। अगर इसका उद्गम ही सूखता है, तो इसका असर हजारों गांवों, खेती और जल आपूर्ति पर पड़ सकता है। यही वजह है कि यह अभियान सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य से जुड़ा हुआ है।
क्या बदलेगा इस पहल से?
अगर यह प्रयास सफल होता है, तो यह देशभर के लिए एक उदाहरण बन सकता है कि कैसे सामुदायिक भागीदारी से नदियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। अब सबकी नजर इस एक हफ्ते के अभियान पर है—क्योंकि यही तय करेगा कि बेतवा का भविष्य कितना सुरक्षित रहेगा।
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