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Bhojshala Dhar: 992 साल पुरानी भोजशाला का इतिहास, विवाद और रहस्य

22 जन, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
Bhojshala Dhar: 992 साल पुरानी भोजशाला का इतिहास, विवाद और रहस्य

Bhojshala Dhar: 992 साल पुरानी भोजशाला का इतिहास, विवाद और रहस्य

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि आस्था और पहचान की टकराती हुई भावनाओं का केंद्र है। जब भी बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ती है, तो यहां माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। एक ओर हिंदू समाज सरस्वती पूजा की मांग करता है, तो दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष जुमे की नमाज। इसी वजह से भोजशाला को लोग ‘एमपी की अयोध्या’ भी कहते हैं।


992 साल पुरानी ज्ञान की धरोहर

भोजशाला की स्थापना परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने साल 1034 में कराई थी। उस दौर में इसे सरस्वती सदन या सरस्वती कंठाभरण कहा जाता था। यहां वाग्देवी यानी देवी सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी। यह स्थान कभी नालंदा और तक्षशिला की तरह आवासीय विश्वविद्यालय था, जहां छात्र-शिक्षक रहते थे और गणित, तर्कशास्त्र, साहित्य जैसे विषयों की पढ़ाई होती थी।


जहां पढ़ाते थे महाकवि

इतिहासकारों के अनुसार इस ज्ञान केंद्र में कालिदास, भवभूति, माघ, धनपाल और बाणभट्ट जैसे महान विद्वान अध्यापन करते थे। भोजशाला के बीचों-बीच बना हवन कुंड आज भी उस परंपरा की याद दिलाता है, जहां बसंत पंचमी भव्य रूप से मनाई जाती थी।


खिलजी आक्रमण और संरचना में बदलाव

साल 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला और आसपास की इमारतों को ध्वस्त कर दिया। इससे पहले 1269 में सूफी संत कमाल मौलाना यहां आकर बसे थे। बाद में दिलावर खां गौरी और महमूद शाह खिलजी (1514) के दौर में भी यहां तोड़फोड़ हुई। मुख्य द्वार के पास कमाल मौलाना मस्जिद का निर्माण कराया गया, जिससे परिसर की मूल संरचना बदल गई।


लंदन में बंद है वाग्देवी

भोजशाला का पहला पुरातात्विक सर्वे 1875 में हुआ। खुदाई में मिली वाग्देवी की प्रतिमा को अंग्रेज अपने साथ ब्रिटेन ले गए। आज भी यह प्रतिमा लंदन म्यूजियम में सुरक्षित रखी है।


शिलालेखों में छिपा सच

यहां मिले शिलालेखों में

“सरस्वतीये नम:”

“ॐ नमः शिवाय”

 जैसे मंत्र उत्कीर्ण हैं। साथ ही बसंत लीला और राम जैसे शब्द भी प्राचीन लिपि में मिले हैं, जो इसके हिंदू सांस्कृतिक स्वरूप की ओर इशारा करते हैं।


हिंदू, मुस्लिम और जैन – तीनों का दावा

भोजशाला से परमारकालीन स्थापत्यकला के प्रमाण मिले हैं। खंभों पर राम, कृष्ण, ब्रह्मा, हनुमान, नारायण की मूर्तियां भी पाई गईं। जहां हिंदू इसे मंदिर मानते हैं, वहीं मुस्लिम इसे मस्जिद कहते हैं। खुदाई में तीर्थंकर नेमीनाथ की मूर्तियां मिलने के बाद जैन समाज ने भी अपना दावा पेश किया।


ASI की निगरानी में स्मारक

भोजशाला को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने संरक्षित स्मारक घोषित किया है। इसके बावजूद यह स्थल आज भी आस्था और इतिहास के बीच खड़ा एक संवेदनशील प्रतीक बना हुआ है।

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