
भोपाल। राजधानी भोपाल अब तेजी से “स्मार्ट सिक्योरिटी सिटी” बनने की ओर बढ़ रहा है। शहर में जल्द ही 8,000 AI आधारित CCTV कैमरे लगाए जाएंगे, जो अपराध होने से पहले ही अलर्ट जारी कर देंगे।
Project Safe Guard: शहर की सुरक्षा का नया ब्लूप्रिंट
इस पूरी पहल को “प्रोजेक्ट सेफ गार्ड” के तहत लागू किया जा रहा है। इसका मकसद है—हर गली, हर चौराहे पर रियल-टाइम निगरानी और किसी भी घटना पर तुरंत कार्रवाई। अभी जहां शहर में सिर्फ 700 कैमरे लगे हैं, वहीं यह संख्या कई गुना बढ़ने वाली है।
30 सेकंड में अपराधी की पहचान
AI तकनीक से लैस ये कैमरे फेस रिकग्निशन सिस्टम से जुड़े होंगे। जैसे ही कोई संदिग्ध व्यक्ति कैमरे में कैप्चर होगा, सिस्टम 30 सेकंड के भीतर उसकी पहचान कर लेगा और तुरंत नजदीकी थाने को अलर्ट भेज देगा। यह तकनीक फरार अपराधियों और लापता लोगों को ढूंढने में गेमचेंजर साबित हो सकती है।
डायल 112 से सीधा कनेक्शन, बिना कॉल भी पहुंचेगी पुलिस
इस सिस्टम को डायल 112 से जोड़ा जाएगा। यानि अगर कहीं कोई आपराधिक गतिविधि होती है, तो बिना किसी कॉल के भी पुलिस को तुरंत जानकारी मिल जाएगी। इससे रिस्पॉन्स टाइम में भारी कमी आएगी—और अपराध पर तेजी से लगाम लगेगी।
2 लाख कैमरों का नेटवर्क, निजी कैमरे भी जुड़ेंगे
इस योजना के तहत सिर्फ 1 लाख नए कैमरे ही नहीं लगाए जाएंगे, बल्कि 1 लाख निजी CCTV कैमरों को भी नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। दुकानदार, बैंक और संस्थान ₹2000 प्रति माह देकर अपने कैमरों को सिस्टम से लिंक कर सकते हैं। इससे चोरी या संदिग्ध गतिविधि की जानकारी सीधे पुलिस तक पहुंचेगी।
स्कूल-कॉलेज और संवेदनशील क्षेत्रों पर खास नजर
महिला कॉलेज, स्कूल और भीड़भाड़ वाले इलाकों पर इन कैमरों से विशेष निगरानी रखी जाएगी। अगर कहीं अचानक भीड़ बढ़ती है या संदिग्ध गतिविधि होती है, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट करेगा—जिससे पुलिस मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाल सके।
पुरानी व्यवस्था कमजोर, नई तकनीक से उम्मीद
फिलहाल शहर के मौजूदा CCTV नेटवर्क की मेंटेनेंस में दिक्कत आ रही है, जिसकी वजह बजट की कमी बताई जा रही है। लेकिन नई AI आधारित प्रणाली के आने से उम्मीद है कि सुरक्षा व्यवस्था ज्यादा मजबूत और प्रभावी होगी।
क्या बदलेगा इस सिस्टम से?
इस नई तकनीक से सिर्फ निगरानी ही नहीं, बल्कि अपराध रोकने की क्षमता भी बढ़ेगी। लोगों में सुरक्षा का भरोसा बढ़ेगा और अपराधियों में डर—यही इस पूरे प्रोजेक्ट का असली मकसद है। अब देखना होगा कि यह सिस्टम जमीन पर कितनी तेजी से लागू होता है।
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