
भोपाल। राजधानी भोपाल में प्रॉपर्टी खरीदने वालों के लिए बड़ी खबर है। 1 अप्रैल से नई कलेक्टर गाइडलाइन लागू हो रही है, लेकिन मेट्रो कॉरिडोर की जमीन दरों में इस बार भी बढ़ोतरी नहीं की गई। सरकार ने यह फैसला सोच-समझकर लिया है—और इसके पीछे बड़ा प्लान छिपा है।
मेट्रो लाइन के किनारे दरें स्थिर, सरकार का डेवलपमेंट फोकस
नई गाइडलाइन में मेट्रो कॉरिडोर के आसपास जमीन की कीमतें पिछले साल की तरह ही रखी गई हैं। यहां दरें 13,000 से 40,000 रुपए प्रति वर्गमीटर तय हैं, यानी करीब 1300 से 4000 रुपए प्रति वर्गफीट रजिस्ट्रेशन के लिए देने होंगे। सरकार का मानना है कि दरें कम रखने से इन इलाकों में तेजी से विकास होगा—जो आने वाले समय में शहर का नक्शा बदल सकता है।
करोंद बना सबसे महंगा इलाका, मेट्रो से बढ़ी वैल्यू
मेट्रो प्रोजेक्ट के चलते कुछ इलाकों की अहमियत तेजी से बढ़ी है। इनमें करोंद सबसे महंगा क्षेत्र बनकर उभरा है, जहां जमीन की दर 40,000 रुपए प्रति वर्गमीटर तक पहुंच गई है। एम्स से करोंद तक करीब 16 किमी लंबी मेट्रो लाइन बिछाई जा रही है, जिसमें से 7 किमी पर कमर्शियल रन शुरू हो चुका है। यही वजह है कि निवेशकों की नजर अब इन इलाकों पर टिक गई है।
100 किमी दायरे में तय हुए नए रेट, पूरे कॉरिडोर को कवर
नई गाइडलाइन में सिर्फ एक-दो जगह नहीं, बल्कि पूरे मेट्रो नेटवर्क को ध्यान में रखा गया है। एम्स-करोंद और प्रस्तावित भदभदा-रत्नागिरी लाइन के 50 मीटर दायरे में नई दरें तय की गई हैं। पुराने भोपाल में यह दरें 12,000 से 15,000 रुपए प्रति वर्गमीटर के बीच रखी गई हैं—जो अलग-अलग क्षेत्रों के हिसाब से तय की गई हैं।
TOD मॉडल से क्या बदल जाएगा? जानिए फायदे
इस योजना के तहत कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं:
केंद्रित विकास: मेट्रो के आसपास ऊंची इमारतें और ज्यादा आबादी
मिश्रित उपयोग: एक ही जगह घर, ऑफिस और बाजार
बेहतर कनेक्टिविटी: पैदल और साइकिल के लिए सुविधाएं
कम ट्रैफिक: निजी वाहनों की जरूरत घटेगी
बेहतर जीवनशैली: समय और खर्च दोनों की बचत
यानी यह सिर्फ जमीन की कीमतों का मामला नहीं, बल्कि शहर के भविष्य की योजना है।
सरकार ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) मॉडल पर काम कर रही है। इसका मतलब है कि मेट्रो या सार्वजनिक परिवहन के आसपास ही घर, ऑफिस और बाजार विकसित किए जाएं। इससे लोगों को कम दूरी तय करनी पड़ेगी, निजी वाहनों पर निर्भरता घटेगी और शहर ज्यादा व्यवस्थित तरीके से बढ़ेगा। यही मॉडल बड़े शहरों में पहले से सफल माना जाता है।
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