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भोपाल में बढ़ा E-Waste का खतरा, जहरीली गैस और धातुएं बना रहीं लोगों को बीमार

06 मई, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
भोपाल में बढ़ा E-Waste का खतरा, जहरीली गैस और धातुएं बना रहीं लोगों को बीमार
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल में तेजी से बढ़ता इलेक्ट्रॉनिक कचरा अब बड़ा स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। पुराने मोबाइल, खराब कंप्यूटर, चार्जर और इलेक्ट्रॉनिक सामान से निकलने वाली जहरीली धातुएं लोगों की सेहत पर गंभीर असर डाल रही हैं। सबसे चिंाजनक बात यह है कि शहर में निकलने वाले ज्यादातर ई-वेस्ट का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण ही नहीं हो पा रहा।


विशेषज्ञों के अनुसार, खुले में ई-वेस्ट जलाने और तोड़ने से निकलने वाली जहरीली गैसें बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को बीमार बना रही हैं। इसका असर अब पर्यावरण और भूजल पर भी दिखाई देने लगा है।


जहरीली धातुएं बढ़ा रहीं गंभीर बीमारियों का खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि खराब इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में मौजूद शीशा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम और बेरिलियम जैसी धातुएं बेहद खतरनाक होती हैं। जब कबाड़ी इन्हें खुले में जलाते या तोड़ते हैं तो जहरीले तत्व हवा में घुल जाते हैं। इससे बच्चों के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है, वहीं किडनी और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोगों के लिए यह स्थिति और ज्यादा खतरनाक मानी जा रही है।


देश की पहली ई-वेस्ट क्लिनिक अब डंपिंग यार्ड में

भोपाल में साल 2020 में देश की पहली ई-वेस्ट क्लिनिक शुरू की गई थी। नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और निजी एजेंसियों ने मिलकर इसे शुरू किया था। इसके लिए एक लो फ्लोर बस को ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर में बदला गया था। यहां मोबाइल, कंप्यूटर, चार्जर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान जमा किया जाता था। शुरुआती तीन वर्षों में करीब 100 टन ई-वेस्ट का निस्तारण भी किया गया, लेकिन बाद में यह क्लिनिक बंद हो गई और अब डंपिंग यार्ड में पड़ी है।


बजट की कमी से बंद हुई व्यवस्था

आधिकारिक तौर पर ई-वेस्ट क्लिनिक बंद होने के पीछे मेट्रो ब्रिज निर्माण को वजह बताया गया, लेकिन जानकारों के मुताबिक असली कारण बजट की कमी रही। क्लिनिक बंद होने के बाद शहर में ई-वेस्ट प्रबंधन की व्यवस्था कमजोर पड़ गई। अब अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक कचरा सीधे कबाड़ियों तक पहुंच रहा है, जहां उसका असुरक्षित तरीके से निपटान किया जा रहा है।


हर रोज निकल रहा डेढ़ टन ई-वेस्ट

राजधानी भोपाल में हर दिन करीब डेढ़ टन ई-वेस्ट निकल रहा है। इसमें से केवल 10 प्रतिशत कचरे का ही वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण हो पा रहा है। बाकी करीब 90 प्रतिशत ई-वेस्ट शहर के लगभग 250 कबाड़ी कारोबारियों के पास पहुंच रहा है। धातुएं निकालने के लिए कई जगह इसे जलाया जाता है, जिससे जहरीली गैसें वातावरण में घुल रही हैं।


भूजल और खेती पर भी मंडराया खतरा

ई-वेस्ट का गलत तरीके से निपटान सिर्फ हवा ही नहीं, बल्कि मिट्टी और भूजल को भी दूषित कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अवैध डंपिंग और लैंडफिल में पड़े इलेक्ट्रॉनिक कचरे से रसायन जमीन में रिस रहे हैं। इसका असर फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन पर भी पड़ सकता है। दूषित पानी और मिट्टी से स्वास्थ्य संबंधी खतरे लगातार बढ़ रहे हैं।


क्या कहती हैं ई-वेस्ट गाइडलाइन?

ई-वेस्ट प्रबंधन को लेकर सरकार की स्पष्ट गाइडलाइन मौजूद हैं। नियमों के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक कचरे को सामान्य या गीले कचरे के साथ मिलाना प्रतिबंधित है। निर्माता कंपनियों के लिए पुराने उपकरण वापस लेने की व्यवस्था बनाना जरूरी है। साथ ही केवल मान्यता प्राप्त रीसायकलर या ई-वेस्ट क्लिनिक को ही इलेक्ट्रॉनिक कचरा देने का प्रावधान है।


विशेषज्ञ ने दी चेतावनी

ठोस अवशिष्ट निस्तारण समिति मध्यप्रदेश के सलाहकार इम्तियाज अली के अनुसार, शहर में हर दिन केवल करीब 100 किलो ई-वेस्ट ही वैज्ञानिक तरीके से नष्ट हो पा रहा है। उन्होंने बताया कि बाकी कचरा कबाड़ियों के पास पहुंच रहा है, जहां धातुएं निकालने के लिए इसे जलाया जाता है। इससे कई खतरनाक गैसें हवा में मिल रही हैं, जो आने वाले समय में बड़े पर्यावरणीय संकट का कारण बन सकती हैं।

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