
भोपाल। राजधानी भोपाल गैस त्रासदी के करीब चार दशक बाद मध्य प्रदेश सरकार अब उस जहर के अंतिम निशानों को भी मिटाने की तैयारी में जुट गई है, जिसने हजारों जिंदगियों को प्रभावित किया था। जहरीले कचरे के निपटान के बाद अब सरकार की नजर यूनियन कार्बाइड परिसर, दूषित मिट्टी और भूजल पर है। सरकार ने यूनियन कार्बाइड (यूका) परिसर और उसके आसपास 2 किलोमीटर क्षेत्र में फैले संभावित प्रदूषण का आकलन कर उसे खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए विशेषज्ञ एजेंसियों और संस्थानों से प्रस्ताव मांगे गए हैं।
अब मिट्टी और भूजल से हटेगा जहर
भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग की योजना के तहत यूनियन कार्बाइड परिसर में मौजूद दूषित मिट्टी, भूजल और जंग लगे औद्योगिक ढांचे का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा। विशेषज्ञ यह भी जांचेंगे कि वर्षों से जमीन और पानी में मौजूद रासायनिक तत्वों का प्रभाव कितना फैला है और उन्हें सुरक्षित तरीके से कैसे समाप्त किया जा सकता है।
1984 की त्रासदी के बाद पहली व्यापक पहल
यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1969 में भोपाल में कीटनाशक निर्माण के लिए हुई थी। बाद में 1979 में मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) उत्पादन इकाई स्थापित की गई। दिसंबर 1984 की भयावह गैस त्रासदी के बाद संयंत्र को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया था। इसके बाद वर्षों तक परिसर में जमा जहरीला कचरा और प्रदूषण चिंता का विषय बना रहा। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद संग्रहित जहरीले कचरे का निपटान पीथमपुर में कराया गया था। अब अगला चरण परिसर और आसपास के पर्यावरण को सुरक्षित बनाने का है।
तीन चरणों में होगा पूरा अध्ययन
सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया को तीन प्रमुख चरणों में बांटा है। पहले चरण में यूनियन कार्बाइड परिसर और आसपास के क्षेत्र का प्रारंभिक सर्वे और दस्तावेजी अध्ययन किया जाएगा। इसमें पुराने नक्शे, रिपोर्ट और वैज्ञानिक आंकड़ों की समीक्षा होगी। दूसरे चरण में विस्तृत जांच और नमूनों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा, जबकि तीसरे चरण में पर्यावरण और स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव का आकलन कर समाधान की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
189 मानकों पर होगी जांच
विशेषज्ञ टीम परिसर और उसके आसपास के क्षेत्रों से मिट्टी और भूजल के नमूने एकत्र करेगी। योजना के अनुसार 50 मिट्टी के नमूने और 15 भूजल नमूनों की जांच करीब 189 अलग-अलग पैरामीटर पर की जाएगी। इससे यह पता लगाया जाएगा कि प्रदूषण किस स्तर तक फैला है और उसका असर कितना गंभीर है।
तालाब, डंपिंग एरिया और भूजल की होगी जांच
जांच केवल परिसर तक सीमित नहीं रहेगी। आसपास के तालाबों, डंपिंग क्षेत्रों और जल स्रोतों का भी अध्ययन किया जाएगा। हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययन के जरिए यह समझने की कोशिश होगी कि प्रदूषक तत्व भूजल में किस दिशा और कितनी दूरी तक पहुंचे हैं। इसके आधार पर भविष्य की सफाई और उपचार योजना बनाई जाएगी।
बनेगा रेमेडियल एंड रिहेबिलिटेशन प्लान
अध्ययन के बाद एक विस्तृत रेमेडियल एंड रिहेबिलिटेशन एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा। इसमें दूषित मिट्टी और खतरनाक अपशिष्ट के उपचार, भंडारण, परिवहन और सुरक्षित निपटान के उपाय शामिल होंगे। साथ ही प्रभावित क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों का भी आकलन किया जाएगा।
भोपाल से त्रासदी का अंतिम दाग मिटाने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफल होती है तो भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े पर्यावरणीय खतरे को काफी हद तक समाप्त किया जा सकेगा। करीब 40 साल बाद पहली बार यूनियन कार्बाइड परिसर और आसपास के प्रदूषण को वैज्ञानिक तरीके से खत्म करने की दिशा में व्यापक कदम उठाया जा रहा है। अब सभी की नजर इस अध्ययन और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर टिकी है।
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