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सरकारी आवास बन गए, लेकिन पर्यावरणीय मंजूरी कहां है? भोपाल के 18 में से 17 हाउसिंग प्रोजेक्ट पर सवाल

21 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
सरकारी आवास बन गए, लेकिन पर्यावरणीय मंजूरी कहां है? भोपाल के 18 में से 17 हाउसिंग प्रोजेक्ट पर सवाल
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। राजधानी भोपाल में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को पक्का घर देने के लिए बनाई गई सरकारी आवास योजनाएं अब एक अलग वजह से सवालों के घेरे में हैं। आरोप है कि नगर निगम के ‘हाउसिंग फॉर ऑल’ के तहत तैयार कराए गए 18 आवासीय प्रोजेक्ट में से 17 के लिए जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) नहीं ली गई। एकमात्र राहुल नगर प्रोजेक्ट को EC प्राप्त होने का दावा किया जा रहा है।


मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि इन प्रोजेक्टों में कई आवास तैयार हो चुके हैं और उनमें परिवार रह रहे हैं। यानी सवाल सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में मंजूरी का नहीं है। यदि पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन साबित होता है तो आगे की कार्रवाई, पर्यावरणीय क्षति की भरपाई, सीवेज और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन तथा इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी—ये सभी सवाल सीधे उन परिवारों से जुड़ जाएंगे, जिन्हें सरकार ने मकान उपलब्ध कराए हैं।


पर्यावरण मामलों से जुड़े नितिन सक्सेना समेत अन्य पक्षों ने इसी आधार पर संबंधित विभागों और केंद्रीय स्तर पर शिकायतें किए जाने की बात कही है।


सबसे पहले समझिए—EC आखिर जरूरी क्यों है?

इस मामले में एक तथ्य को लेकर भ्रम है। EIA Notification, 2006 के Schedule के Item 8(a) के मुताबिक 20,000 वर्गमीटर या उससे अधिक और 1,50,000 वर्गमीटर से कम built-up area वाले Building & Construction Projects को पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना होता है। यह सीमा 20 हजार वर्गफीट नहीं, बल्कि 20 हजार वर्गमीटर है।


मध्यप्रदेश में ऐसे Category-B प्रोजेक्टों की पर्यावरणीय मंजूरी के लिए राज्य स्तर की व्यवस्था काम करती है। मध्यप्रदेश SEIAA के रिकॉर्ड में भोपाल और इंदौर के कई आवासीय प्रोजेक्ट Item 8(a) के तहत दर्ज हैं। उदाहरण के तौर पर भोपाल के एक ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट का 28,565.04 वर्गमीटर built-up area होने के कारण उसे Category-B, Item 8(a) में रखा गया था।


यानी केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि प्रोजेक्ट सरकारी है या गरीबों के लिए बनाया गया है। जिस परियोजना पर EIA Notification लागू होता है, वहां संबंधित पर्यावरणीय प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है।


भोपाल में विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

मामला नगर निगम के ‘हाउसिंग फॉर ऑल’ प्रोजेक्टों से जुड़ा है। उपलब्ध शिकायत और RTI-आधारित दावे के मुताबिक निगम ने 18 आवासीय परियोजनाएं अपने स्तर पर ली थीं। आरोप है कि इनमें से राहुल नगर परियोजना को छोड़कर बाकी 17 में पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी नहीं ली गई। इस दावे का स्वतंत्र महत्व इसलिए भी है क्योंकि मध्यप्रदेश में पर्यावरण मंजूरी का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और राज्य SEIAA वर्षों से Building & Construction के Item 8(a) मामलों की सुनवाई करता रहा है।


मध्यप्रदेश विधानसभा के रिकॉर्ड से भी यह स्पष्ट है कि भोपाल नगर निगम PMAY-Urban के Affordable Housing in Partnership घटक के तहत बड़े पैमाने पर आवास बना रहा है। मार्च 2025 के विधानसभा उत्तर में सरकार ने बताया था कि नगर निगम भोपाल के क्षेत्र में इस घटक के तहत 5,517 आवास बन चुके थे और 15 स्थलों पर काम जारी था।


यही वजह है कि अब सवाल सिर्फ एक-दो भवनों का नहीं, बल्कि सरकारी हाउसिंग प्रोजेक्टों की मंजूरी प्रक्रिया का बन गया है।


मकान बनाने से पहले पर्यावरण की जांच हुई थी या नहीं?

किसी बड़े आवासीय प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरणीय मंजूरी का मकसद सिर्फ कागजी अनुमति लेना नहीं है। परियोजना के आकार के हिसाब से पानी की जरूरत, सीवेज का निस्तारण, ठोस कचरा, वर्षा जल प्रबंधन, हरित क्षेत्र, यातायात और निर्माण के पर्यावरणीय प्रभाव जैसे पहलुओं का आकलन किया जाता है।


इसीलिए पर्यावरणीय मंजूरी को निर्माण पूरा होने के बाद की औपचारिकता नहीं माना जाता। न्यायिक फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि जिन परियोजनाओं पर पूर्व EC लागू है, उन्हें मंजूरी मिलने से पहले निर्माण शुरू नहीं करना चाहिए।


अगर EC नहीं थी तो निर्माण कैसे आगे बढ़ा?

यही इस मामले का सबसे अहम सवाल है। एक तरफ निर्माण एजेंसी को परियोजना तैयार करनी थी। दूसरी तरफ भवन निर्माण की अनुमति, तकनीकी स्वीकृतियां और दूसरी विभागीय प्रक्रियाओं के दौरान यह देखा जाना चाहिए था कि परियोजना पर पर्यावरणीय मंजूरी लागू होती है या नहीं।


मध्यप्रदेश SEIAA के रिकॉर्ड में ऐसे मामले भी मिलते हैं जहां 20,000 वर्गमीटर या उससे ज्यादा built-up area वाले प्रोजेक्ट को EC के लिए SEIAA/SEAC के सामने भेजा गया।


ऐसे में यदि 17 सरकारी आवासीय परियोजनाओं में वास्तव में EC नहीं ली गई, तो अगला सवाल यह होना चाहिए कि फाइल किस स्तर पर आगे बढ़ी और किस अधिकारी या एजेंसी ने यह सत्यापित किया कि पर्यावरणीय मंजूरी जरूरी है या नहीं।


जिम्मेदारी किसकी होगी?

मान लीजिए जांच में आरोप सही पाए जाते हैं। तो कार्रवाई सीधे उन परिवारों पर नहीं जानी चाहिए जिन्होंने सरकारी योजना के तहत घर लिया या आवंटित कराया। सबसे पहले यह तय करना होगा कि परियोजना की योजना किसने बनाई, निर्माण किस एजेंसी ने कराया, तकनीकी और प्रशासनिक स्वीकृति किसने दी और पर्यावरणीय अनुपालन की जिम्मेदारी किस अधिकारी/एजेंसी की थी।


पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई परियोजना के स्वरूप और उल्लंघन की स्थिति के अनुसार हो सकती है। MoEF&CC की violation मामलों से जुड़ी प्रक्रिया में closure, environmental compensation और कुछ परिस्थितियों में demolition तक के प्रावधानों का उल्लेख है।


लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि EC न होने की हर स्थिति में मकान तुरंत तोड़ दिए जाएंगे। किसी मामले में क्या कार्रवाई होगी, यह संबंधित परियोजना की स्थिति, क्षेत्र, उल्लंघन की प्रकृति, पर्यावरणीय प्रभाव और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा।


सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है—उल्लंघन की कीमत तय हो सकती है

पर्यावरणीय मंजूरी के बिना शुरू की गई परियोजनाओं पर अदालतों ने कई मामलों में गंभीर रुख अपनाया है। एक मामले में NGT ने बिना पूर्व EC निर्माण शुरू करने वाली परियोजना पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का सवाल उठाया था। वहीं EC violation से संबंधित मामलों में remediation plan, natural resource augmentation और community resource augmentation जैसी जिम्मेदारियां भी तय की जा सकती हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने भी पर्यावरणीय मंजूरी के उल्लंघन वाले मामलों में ‘polluter pays’ सिद्धांत और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के महत्व को रेखांकित किया है। हालांकि बाद के फैसलों में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि हर मामले का समाधान स्वतः demolition नहीं होता; परिस्थितियों के आधार पर वैधानिक प्रक्रिया और पर्यावरणीय अनुपालन देखा जाता है।


कटारा हिल्स का घरौंदा परिसर क्यों बना उदाहरण?

इस पूरे विवाद में सीवेज का मुद्दा भी सामने आया है। कटारा हिल्स क्षेत्र के घरौंदा आवासीय परिसर के संबंध में शिकायत है कि सीवेज की निकासी नहर की तरफ हो रही है। यदि मौके पर यह स्थिति सही पाई जाती है तो यह सवाल उठता है कि परियोजना के सीवेज ट्रीटमेंट और डिस्चार्ज की व्यवस्था किस मानक के आधार पर बनाई गई थी।


यहां एक सावधानी जरूरी है—नहर में सीवेज जाने का आरोप मौके की स्वतंत्र तकनीकी जांच के बाद ही अंतिम तथ्य माना जाना चाहिए। सिर्फ EC के अभाव से यह अपने आप साबित नहीं होता कि किसी परिसर का सीवेज गलत तरीके से बह रहा है।


लेकिन यदि दोनों बातें जांच में सही निकलती हैं, तो मामला सिर्फ मंजूरी की कमी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वास्तविक पर्यावरणीय नुकसान का भी बन जाएगा।


सरकारी योजना होने से नियमों में छूट नहीं

PMAY-Urban को केंद्र सरकार ने 25 जून 2015 को शहरी क्षेत्रों में ‘Housing for All’ के उद्देश्य से शुरू किया था। योजना का लक्ष्य EWS, LIG और MIG सहित जरूरतमंद शहरी परिवारों के लिए पक्के आवास उपलब्ध कराना था।


सरकारी योजना का उद्देश्य सामाजिक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उससे जुड़े निर्माण पर सामान्य पर्यावरणीय कानून स्वतः लागू नहीं होंगे।


दरअसल, सरकारी परियोजनाओं में अनुपालन की जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां निर्माण सार्वजनिक धन से होता है और लाभार्थी अपनी तरफ से परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया नियंत्रित नहीं करता।


भोपाल में पहले भी बड़े सरकारी प्रोजेक्टों के EC रिकॉर्ड मौजूद हैं

मध्यप्रदेश SEIAA के रिकॉर्ड में सरकारी एजेंसियों से जुड़े बड़े आवासीय प्रोजेक्टों के उदाहरण मौजूद हैं। 2016 के एक रिकॉर्ड में मध्यप्रदेश पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन की इंदौर स्थित बहुमंजिला आवासीय परियोजना को 1,43,602.78 वर्गमीटर built-up area के कारण EIA Notification के Item 8(a) Category-B में रखा गया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकारी निर्माण एजेंसी होने से Building & Construction परियोजना पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया से स्वतः बाहर नहीं हो जाती।


अब तीन विभागों से जवाब जरूरी

इस पूरे मामले में अब केवल नगर निगम से जवाब मांगना पर्याप्त नहीं होगा।


तीन स्तरों पर रिकॉर्ड सामने आने चाहिए—

पहला: नगर निगम के 18 Housing for All प्रोजेक्टों की पूरी सूची और प्रत्येक का built-up area।

दूसरा: प्रत्येक परियोजना के लिए EC की स्थिति—EC ली गई, आवेदन किया गया, लंबित रही या कभी आवेदन ही नहीं किया गया।

तीसरा: जिन परियोजनाओं में EC जरूरी थी लेकिन नहीं ली गई, उनमें निर्माण शुरू करने और पूरा करने की अनुमति किस स्तर पर मिली।


इसके अलावा MP Pollution Control Board से सीवेज, ठोस कचरा और Consent संबंधी रिकॉर्ड भी सामने आना चाहिए।


2 लाख लोगों का आंकड़ा अभी क्यों सावधानी से लिखना चाहिए?

मूल खबर में इन सरकारी आवासों में रह रहे 2 लाख से ज्यादा लोगों का आंकड़ा दिया गया है। लेकिन उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों में मुझे ऐसा consolidated रिकॉर्ड नहीं मिला जिसमें इन 17 परियोजनाओं में रहने वाले लोगों की कुल संख्या 2 लाख से अधिक बताई गई हो।


इसलिए प्रकाशित खबर में इस आंकड़े को सीधे तथ्य के रूप में लिखना जोखिम भरा होगा। पहले सभी 18 प्रोजेक्ट की unit-wise संख्या, आवंटित मकानों और वास्तविक निवासियों का आंकड़ा लेना ज्यादा मजबूत पत्रकारिता होगी।


यही आंकड़ा मिल जाए तो खबर का असर कई गुना बढ़ सकता है—कितने फ्लैट, कितने परिवार, कितने लोग और कितनी सरकारी राशि इन परियोजनाओं में लगी।


शिकायतकर्ता बोले—जिम्मेदारी तय नहीं हुई तो अदालत जाएंगे

पर्यावरण मामलों के जानकार नितिन सक्सेना का कहना है कि पर्यावरणीय नियमों का पालन करना संबंधित अधिकारियों और निर्माण एजेंसियों की जिम्मेदारी थी। उनका आरोप है कि यदि परियोजनाओं में जरूरी मंजूरी नहीं ली गई तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। सक्सेना ने कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में न्यायालय जाने की बात कही है। अब गेंद संबंधित सरकारी एजेंसियों के पाले में है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि 18 परियोजनाओं में से किन-किन पर EC लागू थी, किन्होंने मंजूरी ली और यदि 17 परियोजनाओं में मंजूरी नहीं ली गई तो निर्माण किस आधार पर आगे बढ़ा।


असली सवाल अब मकान तोड़ने का नहीं, जवाबदेही का है

भोपाल में सरकारी आवास गरीब परिवारों को छत देने के लिए बनाए गए थे। अगर इनके निर्माण में पर्यावरणीय मंजूरी की अनदेखी हुई है तो इसका खामियाजा उन परिवारों को नहीं भुगतना चाहिए, जिन्होंने सरकारी व्यवस्था पर भरोसा करके इन घरों में रहना शुरू किया।


पहले दस्तावेज सामने आने चाहिए। फिर परियोजना-दर-परियोजना जांच होनी चाहिए। जहां पर्यावरणीय नुकसान हुआ है, वहां उसकी भरपाई और सुधार की योजना बननी चाहिए। और यदि किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।


क्योंकि सरकारी योजना का मकसद सिर्फ घर की चाबी देना नहीं है। उस घर के आसपास पानी, सीवेज, कचरा और पर्यावरण की सुरक्षित व्यवस्था करना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

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