
भोपाल। भोपाल में प्रतिमा विसर्जन के बाद सातों निर्धारित स्थलों पर सफाई और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। कुंडों में मूर्तियों को लंबे समय तक छोड़े जाने से उनमें इस्तेमाल होने वाले रसायनों के पानी में घुलने और जलीय जीवों को नुकसान पहुंचने की आशंका जताई गई है।
नवमी से अब तक इन सात स्थलों पर 2,963 छोटी-बड़ी प्रतिमाएं विसर्जित की जा चुकी हैं। प्रेमपुरा, रानी कमलापति और खटलापुरा घाट पर बड़ी संख्या में मूर्तियों के ढांचे, फूल-मालाएं और बांस के फ्रेम पानी में दिखाई दिए।
प्रेमपुरा घाट पर सबसे ज्यादा अवशेष, सफाई बनी चुनौती
विसर्जन के बाद प्रेमपुरा घाट के कुंड में 350 से अधिक मूर्तियां और उनके अवशेष जमा होने की जानकारी सामने आई है। इन अवशेषों को हटाना प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है।
रानी कमलापति घाट के कुंड में 300 से अधिक मूर्तियों के ढांचे, फूल-मालाएं और बांस के फ्रेम तैरते नजर आए। खटलापुरा घाट पर भी 70 से अधिक बड़ी प्रतिमाएं और करीब 200 मूर्तियों के बांस के ढांचे पानी में दिखाई दिए।
सात घाटों पर कितनी प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ?
नवमी से अब तक दर्ज विसर्जन के आंकड़ों के मुताबिक, अलग-अलग घाटों पर प्रतिमाओं की संख्या इस प्रकार है:
प्रेमपुरा: 595
बैरागढ़: 451
हथाईखेड़ा: 310
रानी कमलापति: 253
खटलापुरा: 145
मालीखेड़ी: 93
शाहपुरा: 73
कुल: 2,963
इन आंकड़ों में सातों विसर्जन स्थलों पर विसर्जित छोटी-बड़ी प्रतिमाएं शामिल हैं।
कुंडों में घंटों पड़ी रहीं प्रतिमाएं, रसायनों को लेकर चिंता
पर्यावरणविद् डॉ. विपिन व्यास ने पानी में लंबे समय तक मूर्तियां रहने से उनके रंगों में मौजूद रसायनों के घुलने का खतरा बताया है। उनके अनुसार, इन रसायनों से जलीय जीवों को नुकसान पहुंच सकता है और उनकी सांस लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
दिए गए विवरण के मुताबिक, प्रतिमाओं को विसर्जन कुंडों में 10 से 12 घंटे तक छोड़ दिया गया, जबकि निर्धारित व्यवस्था के अनुसार उन्हें 2 से 3 घंटे के भीतर बाहर निकालना था।
POP और जहरीले रंगों से पानी की गुणवत्ता पर खतरा
मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP), लेड और कैडमियमयुक्त सिंथेटिक रंगों को पर्यावरण के लिए चिंता का विषय माना गया है। लंबे समय तक पानी में डूबे रहने पर इन सामग्रियों से प्रदूषण बढ़ने की आशंका है।
डॉ. व्यास के मुताबिक, रसायनों के पानी में घुलने से उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और ऑक्सीजन का स्तर गिरने से जलीय जीवों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।
विसर्जन कुंडों के इस्तेमाल के नियमों पर सवाल
प्रशासन ने प्रतिमा विसर्जन के लिए दिशा-निर्देश तय किए थे, लेकिन उनके पालन पर सवाल उठे हैं। पर्यावरण संबंधी सुझावों के मुताबिक, कृत्रिम कुंडों का इस्तेमाल प्रतीकात्मक विसर्जन के लिए किया जाना चाहिए और प्रतिमा को पानी में डालने के बाद 30 से 60 मिनट के भीतर सुरक्षित निकाल लेना चाहिए।
इस व्यवस्था का उद्देश्य मूर्तियों को लंबे समय तक पानी में पड़े रहने से रोकना और रंगों तथा अन्य सामग्रियों से होने वाले प्रदूषण को कम करना है।
पर्यावरण अनुकूल विसर्जन के लिए क्या जरूरी है?
जलाशयों और जलीय जीवों को नुकसान से बचाने के लिए तीन उपायों पर जोर दिया गया है:
- त्वरित निष्कासन: विसर्जन के बाद प्रतिमाओं को जल्द से जल्द कुंड से बाहर निकाला जाए।
- प्राकृतिक सामग्री: प्राकृतिक मिट्टी और गैर-हानिकारक रंगों से बनी मूर्तियों को प्राथमिकता दी जाए।
- वैज्ञानिक निस्तारण: कृत्रिम कुंडों के दूषित पानी को मुख्य जल स्रोतों में जाने से रोकने के लिए उचित प्रबंधन किया जाए।
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