
भोपाल। सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर देश उन्हें आधुनिक भारत की एकता और अखंडता की मजबूत नींव रखने वाले नेता के रूप में याद कर रहा है। भोपाल को भारतीय संघ का हिस्सा बनाने में भी उनकी निर्णायक भूमिका रही थी।
आजादी के बाद भोपाल के तत्कालीन नवाब हमीदुल्लाह ने रियासत को अपने नियंत्रण में बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए। बैंक में जमा भोपालवासियों का पैसा पाकिस्तान भेजने से लेकर विलय आंदोलनकारियों पर गोली चलवाने तक की घटनाएं हुईं, लेकिन पटेल की रणनीति के सामने नवाब को महज 3 दिन में अपना फैसला बदलना पड़ा।
सरदार पटेल की जयंती पर नेताओं ने किया नमन
31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के साथ राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित देशभर के नेताओं ने राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को याद किया।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सरदार पटेल को श्रद्धांजलि देते हुए राष्ट्रीय एकता दिवस की शुभकामनाएं दीं।
मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि सरदार पटेल का पूरा जीवन मातृभूमि की सेवा और राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए समर्पित रहा। उनका व्यक्तित्व देशभक्तों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
हेमंत खंडेलवाल और जीतू पटवारी ने भी दी श्रद्धांजलि
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने सरदार पटेल को अदम्य इच्छाशक्ति और मजबूत नेतृत्व का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि पटेल ने भारत की एकता और अखंडता को वास्तविक स्वरूप देने में ऐतिहासिक योगदान दिया।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी सरदार वल्लभभाई पटेल को अखंड भारत का शिल्पकार बताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
नवाब हमीदुल्लाह ने पाकिस्तान में खुलवाई थी बैंक की शाखा
आजादी के समय भोपाल रियासत के भारत में विलय का रास्ता आसान नहीं था। तत्कालीन नवाब हमीदुल्लाह खान पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी थे और रियासत पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहते थे। 1947 में नवाब ने विलय के लिए सहमति तो जताई, लेकिन इसके बाद भी अपनी सत्ता बचाने की कोशिशें जारी रखीं।
उस दौर में भोपाल के अधिकांश नागरिकों की जमा पूंजी बैंक ऑफ भोपाल में थी। नवाब ने 1948 में पाकिस्तान में बैंक की एक शाखा खुलवाई और भोपाल में जमा पूरा पैसा वहां स्थानांतरित करवा दिया। इस कदम से शहर के लोगों को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।
विलय आंदोलनकारियों पर चलवाई गई थीं गोलियां
भोपाल को भारतीय संघ में शामिल करने की मांग लगातार तेज हो रही थी। रियासत में भारत के साथ विलय के समर्थन में आंदोलन चल रहा था।
नवाब के आदेश पर आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई गईं। इस कार्रवाई में कई लोगों ने अपनी जान गंवाई। घटनाओं ने भोपाल के विलय का मामला और गंभीर बना दिया।
वीपी मेनन की कूटनीति से बदला घटनाक्रम
भोपाल में पैदा हुए हालात पर सरदार वल्लभभाई पटेल ने विशेष ध्यान दिया। उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद अधिकारियों में शामिल वीपी मेनन को नवाब से बातचीत के लिए भेजने का निर्णय लिया।
24 जनवरी 1949 को मेनन भोपाल पहुंचे। उन्हें साम, दाम, दंड और भेद की रणनीति के जरिए नवाब को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
मेनन की बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों का असर जल्द दिखाई दिया। केवल 3 दिनों के भीतर नवाब हमीदुल्लाह भारत में विलय के लिए सहमत हो गए।
1 जून 1949 को भारत का हिस्सा बना भोपाल
नवाब की सहमति के बाद भोपाल के भारतीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया पूरी हुई। आखिरकार 1 जून 1949 को भोपाल आधिकारिक रूप से भारत का अभिन्न अंग बन गया।
इस तरह सरदार पटेल के नेतृत्व और वीपी मेनन की कूटनीतिक पहल ने भोपाल रियासत के भारत में विलय का रास्ता साफ किया। देश की एकता और अखंडता स्थापित करने के उनके प्रयासों को आज भी ऐतिहासिक महत्व के साथ याद किया जाता है।
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