
भोपाल में मेट्रो निर्माण ने ट्रैफिक व्यवस्था को बड़ा झटका दिया है। शहर के सबसे व्यस्त इलाकों में अब 3 साल तक बिना ट्रैफिक सिग्नल ही वाहन चलेंगे—जिससे चुनौती और बढ़ने वाली है।
मेट्रो ब्लू लाइन के कारण बड़ा फैसल
भोपाल मेट्रो की ब्लू लाइन के निर्माण के चलते रत्नागिरी तिराहा से भदभदा चौराहा तक 13 ट्रैफिक सिग्नल और CCTV कैमरे हटाने का निर्णय लिया गया है। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है ताकि मेट्रो के सिविल और इलेक्ट्रिकल कार्य में कोई बाधा न आए। लेकिन इसका सीधा असर शहर की ट्रैफिक व्यवस्था पर पड़ने वाला है—जो पहले से ही दबाव में है।
हर घंटे 2000 से ज्यादा वाहन, अब कैसे संभलेगा ट्रैफिक?
इन चौराहों पर पहले ही भारी ट्रैफिक रहता है। विशेषज्ञों के मुताबिक कई जगहों पर हर घंटे 2000 से अधिक वाहन गुजरते हैं। ऐसे में बिना सिग्नल के ट्रैफिक को नियंत्रित करना पूरी तरह ट्रैफिक पुलिस पर निर्भर होगा। सीमित बल के साथ यह काम कितना चुनौतीपूर्ण होगा।
3 साल तक बनी रहेगी यह स्थिति
इस पूरे प्रोजेक्ट की अवधि करीब 3 साल तय की गई है। यानी इतने लंबे समय तक इन प्रमुख मार्गों पर बिना सिग्नल ट्रैफिक चलेगा। रंगमहल, रोशनपुरा, पिपलानी, रत्नागिरी और प्रभात चौराहा जैसे पहले से व्यस्त इलाकों में हालात और बिगड़ सकते हैं—जिससे रोजाना जाम की समस्या बढ़ने की आशंका है।
किन-किन जगहों से हटेंगे सिग्नल
हटाए जाने वाले प्रमुख चौराहों में भदभदा, डिपो, जवाहर चौक, रंगमहल, रोशनपुरा, कुशाभाऊ ठाकरे हॉल, पुलिस कंट्रोल रूम, पुराना एसपी ऑफिस, प्रभात चौराहा, आईटीआई, जेके रोड, पिपलानी और रत्नागिरी शामिल हैं। इन स्थानों पर सिग्नल हटने के बाद ट्रैफिक मूवमेंट पूरी तरह मैन्युअल कंट्रोल पर निर्भर रहेगा—जो स्थिति को और संवेदनशील बना सकता है।
कुछ सिग्नल होंगे शिफ्ट, खर्च बचाने की कोशिश
ट्रैफिक विभाग ने स्मार्ट सिटी कंपनी को पत्र लिखकर सिग्नल और कैमरों को हटाने के साथ उन्हें दूसरी जगह लगाने का प्रस्ताव दिया है। करीब 9 सिग्नलों को नए स्थानों—जैसे माता मंदिर, मैनिट, रोहित नगर और बजरिया तिराहा—पर शिफ्ट किया जा सकता है, ताकि मेंटेनेंस पर होने वाला अनावश्यक खर्च बचाया जा सके।
पहले भी हटे सिग्नल, लेकिन हुआ नुकसान
पहले बीआरटीएस हटाने के दौरान भी कई सिग्नल और कैमरे हटाकर रख दिए गए थे। इसके बावजूद एजेंसी को मेंटेनेंस का भुगतान करना पड़ा था। इस बार प्रशासन ऐसी स्थिति से बचने की कोशिश कर रहा है।
मेट्रो प्रोजेक्ट की तैयारी भी तेज
करीब 13 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर पर 550 स्थानों पर सॉयल टेस्टिंग पूरी हो चुकी है। जियोटेक्निकल रिपोर्ट के आधार पर मेट्रो के पिलर और नींव तय की जा रही है। यानी एक तरफ विकास की रफ्तार तेज है, तो दूसरी तरफ ट्रैफिक का दबाव भी बढ़ने वाला है।
आगे क्या होगा?
भोपाल मेट्रो शहर के लिए बड़ी राहत लेकर आएगी, लेकिन फिलहाल इसके निर्माण के दौरान ट्रैफिक प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस 3 साल लंबे ट्रैफिक टेस्ट को कैसे संभालता है—क्योंकि इसका असर हर रोज सड़कों पर दिखेगा।
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