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भोपाल में रिहायशी इलाकों की कमर्शियल लड़ाई: 8 हजार से ज्यादा नोटिस, अब सीलिंग की बारी

21 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
भोपाल में रिहायशी इलाकों की कमर्शियल लड़ाई: 8 हजार से ज्यादा नोटिस, अब सीलिंग की बारी
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। राजधानी भोपाल में आवासीय भवनों में चल रहे व्यावसायिक इस्तेमाल के खिलाफ नगर निगम की कार्रवाई अब नोटिस बांटने से आगे बढ़ रही है। शहर में 8 हजार से ज्यादा नोटिस जारी हो चुके हैं। कई मामलों में नोटिस की समय-सीमा पूरी हो गई है और अब सुनवाई के बाद अंतिम आदेश जारी किए जाने की तैयारी है। इसके बाद नियमों का उल्लंघन जारी रहने पर सीलिंग की कार्रवाई हो सकती है।


एक तरफ निगम की कार्रवाई से कारोबारियों में दुकान बंद होने या दूसरी जगह शिफ्ट होने की चिंता है। दूसरी तरफ रहवासी संगठन इसे लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान मान रहे हैं और सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। शनिवार को गुलमोहर में प्रस्तावित टॉर्च रैली इसी बढ़ते विरोध-समर्थन का अगला बड़ा पड़ाव होगी।


लेकिन इस पूरे विवाद को सिर्फ दुकानें बंद कराने की कार्रवाई के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे सवाल है कि भोपाल की कई रिहायशी कॉलोनियों में पिछले वर्षों में जिस तरह कारोबार फैलता गया, उसे अब नियमों के मुताबिक कैसे नियंत्रित किया जाए?


शुरुआत 1-2 हजार नोटिस से हुई, अब आंकड़ा 8 हजार पार

नगर निगम ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों की जांच का दायरा तेजी से बढ़ाया है। शुरुआती कार्रवाई में एक हजार से ज्यादा प्रतिष्ठानों को नोटिस दिए गए थे और कुछ परिसरों को सील भी किया गया था। 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के सामने BMC की ओर से भी बताया गया था कि रिहायशी क्षेत्रों में चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई शुरू की जा चुकी है।


इसके बाद निगम ने शहरभर में सर्वे बढ़ा दिया। निगम के अनुसार 62 हजार से ज्यादा ऐसी प्रॉपर्टी सूचीबद्ध की गई हैं, जहां रिहायशी उपयोग वाली संपत्तियों में व्यावसायिक गतिविधियों की जांच की जानी है।


5 अगस्त से पहले 1018 नोटिस दिए जा चुके थे। इसके बाद 5 से 12 अगस्त के बीच 1163, 13 अगस्त को 1135 और 14 अगस्त को 1478 नोटिस जारी किए गए। 16 अगस्त तक यह संख्या 5778 पहुंच गई थी।


अब 20 अगस्त तक निगम के आंकड़े के मुताबिक नोटिसों की संख्या 8 हजार से ज्यादा हो चुकी है।


अब मामला सिर्फ नोटिस का नहीं, सुनवाई और अंतिम आदेश का है

निगम अधिकारियों के मुताबिक सभी नोटिसों पर सीधे सीलिंग नहीं होगी। पहले संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा। अधिभोग उल्लंघन के मामलों में दस्तावेजों और मौके की स्थिति का परीक्षण होगा। इसके बाद अंतिम आदेश जारी किया जाएगा।


निगम के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार करीब 750 ऐसे नोटिस हैं, जिनकी अधिभोग उल्लंघन की अवधि अगले तीन दिन में पूरी होने वाली है।


इसके अलावा अवैध निर्माण से जुड़े 85 नोटिस जारी किए जा रहे हैं। इनमें 24 मामले ऐसे बताए गए हैं, जिनमें अंतिम आदेश भी जारी हो चुका है।


यानी आने वाले दिनों में निगम की कार्रवाई का अगला चरण सिर्फ नए नोटिस जारी करना नहीं, बल्कि पहले से जारी नोटिसों पर निर्णय लेना और उसके बाद अनुपालन सुनिश्चित करना होगा।


सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने पूरी तस्वीर बदल दी

इस मामले की जड़ स्थानीय विवाद से कहीं बड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने रिहायशी कॉलोनियों में आवासीय भवनों और जमीन के अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल को गंभीरता से लेते हुए राजधानी शहरों की नगरपालिकाओं को अपने क्षेत्र में ऐसे मामलों की व्यापक पहचान और जांच करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि रिहायशी क्षेत्र को अनधिकृत तरीके से व्यावसायिक क्षेत्र में बदलना सार्वजनिक हित और वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों को प्रभावित करता है।


अदालत के निर्देशों में यह भी कहा गया है कि अनधिकृत भवन में किसी तरह का व्यापार या कारोबार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और विकास को संबंधित जोनल प्लान तथा भूमि उपयोग के अनुरूप होना चाहिए।


यही वजह है कि भोपाल में अब निगम की कार्रवाई को केवल स्थानीय प्रशासनिक अभियान नहीं माना जा रहा। नगर निगम पर अदालत के निर्देशों का पालन कराने का सीधा दबाव है।


सरकार ने समिति बनाई, सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई रोकने वाला आदेश रोक दिया

इस विवाद में एक अहम मोड़ 5 अगस्त को आया था। राज्य सरकार ने मामले के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा और नीति तैयार करने के लिए 10 सदस्यीय समिति बनाई थी। इसी बीच कार्रवाई रोकने की कोशिश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा।


5 अगस्त की सुनवाई के बाद अदालत ने राज्य सरकार के उस प्रशासनिक आदेश को तत्काल प्रभाव से अबeyance में रखने का निर्देश दिया, जिसके जरिए BMC की सीलिंग कार्रवाई रोकी गई थी। अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप की कोशिश माना।


इसके बाद स्थिति स्पष्ट हो गई कि नीति पर विचार अपनी जगह चलता रहेगा, लेकिन नगर निगम को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक कार्रवाई जारी रखनी होगी।


कारोबारियों की सबसे बड़ी चिंता: दुकान बंद हुई तो आगे क्या?

निगम की कार्रवाई का सबसे सीधा असर उन कारोबारियों पर पड़ रहा है, जिन्होंने वर्षों से रिहायशी इलाकों में दुकान, ऑफिस, क्लीनिक, शोरूम, कैफे या दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां शुरू कर रखी हैं।


व्यापारियों का तर्क है कि कई इलाकों में कारोबार अचानक शुरू नहीं हुआ। समय के साथ मुख्य सड़कों और कॉलोनियों के आसपास व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ती गईं। अब एक साथ कार्रवाई होने पर दुकानें बंद होंगी तो कारोबार, कर्मचारियों और ग्राहकों पर असर पड़ेगा।


इसी मांग को लेकर व्यापारी संगठनों ने सड़क पर उतरकर विरोध भी किया है। व्यापारियों की मांग में ऐसी नीति शामिल है, जिससे पहले से विकसित व्यावसायिक गतिविधियों को नियमों के दायरे में लाने का रास्ता निकले। इससे पहले व्यापारी संगठनों ने मिश्रित भूमि उपयोग या गुजरात मॉडल जैसे विकल्पों की भी मांग उठाई थी।


मंगलवार को व्यापारियों ने रोशनपुरा चौराहे पर प्रदर्शन और चक्काजाम किया था। उनका कहना था कि एक साथ बड़ी संख्या में प्रतिष्ठान बंद होने से रोजगार और आम लोगों को मिलने वाली सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।


रहवासियों का तर्क: घर रहने के लिए हैं, बाजार बनाने के लिए नहीं

दूसरी तरफ रहवासी संगठनों का कहना है कि रिहायशी कॉलोनियों में कारोबार बढ़ने से सबसे ज्यादा परेशानी वहां रहने वाले लोगों को होती है।


उनकी शिकायतों में बढ़ता ट्रैफिक, पार्किंग की समस्या, सड़क पर भीड़, शोर, कचरा और कॉलोनी के मूल स्वरूप में बदलाव जैसे मुद्दे शामिल हैं।


रहवासी संगठन चाहते हैं कि आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को किसी भी तरह की ढील न दी जाए और कार्रवाई सभी पर समान रूप से हो।


इसी मांग को लेकर रहवासी संगठन पहले भी टॉर्च मार्च निकाल चुके हैं। अब शनिवार को गुलमोहर में बड़े स्तर पर टॉर्च रैली की तैयारी है।


यानी इस विवाद में अब सड़क पर दो अलग-अलग आवाजें साफ सुनाई दे रही हैं—एक पक्ष कारोबार बचाने के लिए नीति चाहता है, दूसरा रिहायशी इलाकों की मूल पहचान बचाने के लिए सख्त कार्रवाई।


किन इलाकों पर असर ज्यादा?

निगम का सर्वे पूरे शहर में चल रहा है। शुरुआती और विस्तारित सर्वे में मुख्य सड़कों के अलावा उनसे जुड़ी गलियों और रिहायशी कॉलोनियों को भी जांच के दायरे में लिया जा रहा है।


नगर निगम की विधानसभा क्षेत्रवार कार्रवाई के आंकड़ों के मुताबिक 16 अगस्त तक नरेला में 1470, गोविंदपुरा में 1250, मध्य में 1093, हुजूर में 1032, दक्षिण-पश्चिम में 652 और उत्तर विधानसभा क्षेत्र में 371 नोटिस जारी हो चुके थे।


इन आंकड़ों से यह भी साफ है कि कार्रवाई किसी एक पॉश कॉलोनी या एक इलाके तक सीमित नहीं है। अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में नोटिस जारी किए जा रहे हैं।


अवधपुरी से अयोध्या बायपास तक कारोबारियों की चिंता

जिन इलाकों में रिहायशी बस्तियों के भीतर या उनके आसपास कारोबार तेजी से बढ़ा है, वहां इसका असर ज्यादा दिखाई दे रहा है।


अवधपुरी, अयोध्या बायपास, गौतम नगर, अशोका गार्डन और लालघाटी जैसे इलाकों में नोटिस मिलने के बाद कुछ कारोबारी वैकल्पिक कमर्शियल स्पेस तलाश रहे हैं।


यहां असली चुनौती यह है कि यदि कारोबार को रिहायशी क्षेत्र से बाहर जाना है तो क्या शहर में पर्याप्त और व्यावहारिक कमर्शियल स्पेस उपलब्ध है?


यही सवाल अब सिर्फ व्यापारियों का नहीं, शहर की प्लानिंग का भी है।


मुख्य सड़कों के साथ अब नदी-तालाब और ग्रीन बेल्ट भी जांच में

नगर निगम का मौजूदा अभियान सिर्फ रिहायशी भवनों के कमर्शियल इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। सर्वे में भवन निर्माण से जुड़े दूसरे उल्लंघनों को भी देखा जा रहा है। मुख्य मार्गों के दोनों तरफ और उनसे जुड़ी गलियों की जांच के साथ नदी-तालाब के किनारे, ग्रीन बेल्ट, बफर जोन और कैचमेंट एरिया में बने भवनों पर भी नजर है।


अवैध मैरिज गार्डन और अन्य ऐसे निर्माण भी जांच के दायरे में आ सकते हैं, जहां भूमि उपयोग या निर्माण अनुमति नियमों से मेल नहीं खाती।


मास्टर प्लान का सवाल फिर सामने

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण और लंबे समय का सवाल भोपाल के मास्टर प्लान से जुड़ता है। व्यापारियों का कहना है कि शहर के कई हिस्सों में जमीन का वास्तविक उपयोग बदल चुका है। कई सड़कें और इलाके व्यवहार में व्यावसायिक केंद्र बन गए हैं, जबकि उनका नियोजित उपयोग अलग रहा है।


वहीं, रहवासियों का कहना है कि यदि कुछ इलाकों में कारोबार बढ़ गया है तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरे रिहायशी क्षेत्र का चरित्र बदल दिया जाए।


यही वह बिंदु है जहां प्रशासन को दो जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा—एक तरफ कानून और भूमि उपयोग की व्यवस्था, दूसरी तरफ वर्षों से विकसित कारोबार और उससे जुड़ी रोजी-रोटी।


अब आगे क्या होगा?

फिलहाल निगम की प्राथमिकता पुराने नोटिसों की प्रक्रिया पूरी करना है। जिन मामलों में नोटिस की अवधि पूरी हो रही है, वहां संबंधित पक्ष की सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के बाद अंतिम आदेश जारी किए जाएंगे। जिन मामलों में अंतिम आदेश हो चुके हैं, वहां आदेश के अनुपालन की स्थिति देखी जाएगी।


यदि किसी परिसर में अनधिकृत व्यावसायिक गतिविधि जारी रहती है तो नियमों के अनुसार सीलिंग जैसी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है।


अवैध निर्माण वाले मामलों में प्रक्रिया अलग होगी और वहां निर्माण अनुमति, स्वीकृत नक्शे और मौके पर हुए निर्माण के बीच अंतर की जांच महत्वपूर्ण होगी।


यानी आने वाले दिनों में भोपाल में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि “कितने नोटिस और दिए गए?”


सवाल यह होगा कि “8 हजार से ज्यादा नोटिसों में से कितने मामलों में अंतिम निर्णय हुआ और कितने प्रतिष्ठानों पर वास्तव में कार्रवाई हुई?”


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