शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
Logo
Madhaya Pradesh

तीन नसबंदी केंद्र, हर साल 25 हजार कुत्तों का दावा और 8.56 करोड़ खर्च, फिर भी भोपाल में नहीं घट रही आबादी

30 अक्टू, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
तीन नसबंदी केंद्र, हर साल 25 हजार कुत्तों का दावा और 8.56 करोड़ खर्च, फिर भी भोपाल में नहीं घट रही आबादी
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आवारा कुत्तों की बढ़ती तादाद नगर निगम के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। शहर में करीब 1.25 लाख आवारा श्वान होने का अनुमान है, जबकि नसबंदी और टीकाकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं।


नगर निगम के पास फिलहाल तीन एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) सेंटर हैं। हर साल हजारों कुत्तों की नसबंदी का दावा किया जा रहा है, लेकिन आबादी में अपेक्षित कमी नहीं दिख रही है। स्थायी डॉग शेल्टर का इंतजाम भी अब तक अधूरा है।


पांच साल में नसबंदी और टीकाकरण पर खर्च हुए 8.56 करोड़

आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए भोपाल नगर निगम पिछले पांच वर्षों में 8.56 करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। इस राशि का इस्तेमाल नसबंदी और एंटी-रेबीज टीकाकरण जैसी गतिविधियों में किया गया है।


निगम के दावे के मुताबिक, हर साल लगभग 25 हजार श्वानों की नसबंदी की जाती है। इसके बावजूद शहर में आवारा कुत्तों की संख्या कम होने के बजाय चुनौती बनी हुई है।


तीन ABC सेंटर में रोजाना 20 से 25 कुत्तों का उपचार

शहर में नसबंदी और एंटी-रेबीज वैक्सीनेशन के लिए तीन केंद्र काम कर रहे हैं। ये सेंटर अलग-अलग स्थानों पर संचालित हैं:

  1. अरवलिया

  2. आदमपुर छावनी

  3. कजलीखेड़ा


इन तीनों केंद्रों पर प्रतिदिन करीब 20 से 25 श्वानों की नसबंदी और टीकाकरण किया जा रहा है।


भानपुर में नया केंद्र बन रहा, कालापानी में शेल्टर का इंतजार

नसबंदी की मौजूदा व्यवस्था बढ़ाने के लिए भानपुर में नए केंद्र का निर्माण कराया जा रहा है। इससे संबंधित सुविधाओं के विस्तार की योजना पर काम जारी है। स्थायी डॉग शेल्टर के मामले में स्थिति अलग है। कोर्ट के निर्देश के बावजूद भोपाल में अभी तक एक भी स्थायी डॉग शेल्टर तैयार नहीं हुआ है।


1000 कुत्तों की क्षमता वाला प्रस्तावित शेल्टर अटका

कालापानी में 1,000 आवारा श्वानों को रखने की क्षमता वाला डॉग शेल्टर प्रस्तावित है। लेकिन इस परियोजना का निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाया है।


इस तरह एक तरफ नसबंदी और टीकाकरण पर लगातार खर्च हो रहा है, तो दूसरी तरफ स्थायी आश्रय की व्यवस्था जमीन पर उतरने का इंतजार कर रही है।

पाठकों की राय (0)

इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

अपनी प्रतिक्रिया दें