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ग्वालियर-चंबल में भाजपा का बढ़ा कद, अब जमीन मजबूत करने की चुनौती

22 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
ग्वालियर-चंबल में भाजपा का बढ़ा कद, अब जमीन मजबूत करने की चुनौती
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में मध्य प्रदेश के सात नेताओं को नई जिम्मेदारियां मिलने से ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीतिक अहमियत बढ़ी है। अंचल से जुड़े तीन नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका मिली है।


राष्ट्रीय राजनीति में बढ़े प्रतिनिधित्व के साथ भाजपा के सामने स्थानीय स्तर पर संगठन को मजबूत रखने की चुनौती भी है। 34 विधानसभा और 4 लोकसभा सीटों वाले इस क्षेत्र में लोकसभा चुनावों में पार्टी का दबदबा कायम है, लेकिन विधानसभा स्तर पर कांग्रेस अब भी मुकाबले में बनी हुई है।


राष्ट्रीय टीम में अंचल के तीन चेहरे

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने श्रावण मास के तीसरे सोमवार को राष्ट्रीय टीम की घोषणा की। मध्य प्रदेश के सात नेताओं को संगठन में जिम्मेदारी दी गई है।


ग्वालियर-चंबल से जुड़े प्रमुख नामों में वीडी शर्मा, लाल सिंह आर्य और आशीष अग्रवाल शामिल हैं।

- वीडी शर्मा को प्रकोष्ठ संकुल का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है।

- लाल सिंह आर्य को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है।

- आशीष अग्रवाल को मीडिया टीम का सह-संयोजक बनाया गया है।


आशीष अग्रवाल के जरिए युवा नेतृत्व को जगह

आशीष अग्रवाल इससे पहले भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। राष्ट्रीय मीडिया टीम में नई भूमिका मिलने के साथ अंचल को संगठन में एक युवा चेहरा मिला है। आशीष अग्रवाल वैश्य समाज से आते हैं। उनकी नियुक्ति को अंचल की राजनीति में युवा नेतृत्व की बढ़ती मौजूदगी के तौर पर देखा जा रहा है।


सिंधिया और तोमर के बीच संगठनात्मक संतुलन अहम

ग्वालियर-चंबल में भाजपा के पास पहले से प्रभावशाली राजनीतिक और संगठनात्मक नेतृत्व मौजूद है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया क्षेत्र के बड़े जननेता हैं, जबकि विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को लंबे समय से संगठन कुशलता के लिए जाना जाता है। राष्ट्रीय संगठन में अन्य नेताओं की जिम्मेदारियां बढ़ने से भाजपा की आंतरिक राजनीति में नेतृत्व और प्रभाव का संतुलन भी महत्वपूर्ण हो गया है।


उपचुनावों ने पार्टी की चिंता बढ़ाई

विजयपुर और दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार ने अंचल में संगठन की चुनौतियां सामने रखी हैं। बसपा के कमजोर होने के बाद कांग्रेस को भाजपा के सामने ज्यादा प्रभावी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है। पार्टी के लिए अब बूथ स्तर की मजबूती के साथ सामाजिक समीकरणों को साधे रखना भी अहम होगा।


2018 में कांग्रेस ने भाजपा को दिया था बड़ा झटका

ग्वालियर-चंबल में 4 लोकसभा और 34 विधानसभा सीटें हैं। वर्तमान में चारों लोकसभा सीटें भाजपा के पास हैं। विधानसभा चुनावों में तस्वीर अलग रही है। 2018 में कांग्रेस ने 34 में से 26 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा सिर्फ 6 सीटों तक सीमित रह गई थी। उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में थे और क्षेत्र के चुनाव परिणामों पर उनका प्रभाव दिखाई दिया।


सिंधिया के भाजपा में आने से बदला समीकरण

2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद ग्वालियर-चंबल की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। सिंधिया के साथ उनके कई समर्थक नेता और विधायक भी भाजपा में आए। इससे विधानसभा में भाजपा की स्थिति मजबूत हुई और क्षेत्र में पार्टी ने अपनी चुनावी जमीन दोबारा तैयार की।


2023 में भाजपा ने बनाई बढ़त

इसके बाद हुए चुनावों में भाजपा ने अंचल में अपनी स्थिति बेहतर की। पार्टी ने 16 सीटें जीतीं। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदर्शन और सुधारा। उसे 18 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर रही। यानी भाजपा ने कांग्रेस से 2 सीटों की बढ़त बनाई। फिर भी 2018 से 2023 के बीच वापसी के बावजूद ग्वालियर-चंबल को पूरी तरह कांग्रेस मुक्त करने का लक्ष्य हासिल नहीं हुआ।


अब राष्ट्रीय जिम्मेदारी को स्थानीय ताकत में बदलने की परीक्षा

राष्ट्रीय संगठन में बढ़ी जिम्मेदारियों से अंचल के नेताओं का राजनीतिक प्रभाव निश्चित रूप से बढ़ा है। इसके साथ उनसे क्षेत्र में संगठन को मजबूत करने की अपेक्षाएं भी बढ़ गई हैं। भाजपा के सामने अब मुख्य सवाल यही है कि दिल्ली में मिले बढ़े हुए राजनीतिक वजन का इस्तेमाल ग्वालियर-चंबल में बूथ संगठन, सामाजिक समीकरण और विधानसभा स्तर की चुनावी मजबूती के लिए किस तरह किया जाता है। लोकसभा में क्लीन स्वीप के बावजूद विधानसभा स्तर पर कांग्रेस की चुनौती बरकरार है।

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