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दतिया हार के बाद भाजपा सख्त, जिलाध्यक्ष से लेकर मंडल तक पूरी टीम हटाई; अब पार्षदों पर कार्रवाई की तैयारी

05 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
दतिया हार के बाद भाजपा सख्त, जिलाध्यक्ष से लेकर मंडल तक पूरी टीम हटाई; अब पार्षदों पर कार्रवाई की तैयारी
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। दतिया विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने संगठन स्तर पर बड़ा कदम उठाया है। पार्टी ने अनुशासन और जवाबदेही का संदेश देते हुए दतिया जिले की पूरी संगठनात्मक इकाई को भंग कर दिया है। इस कार्रवाई के दायरे में जिलाध्यक्ष के साथ जिला कार्यकारिणी, मोर्चे, प्रकोष्ठ, मंडल और विभागों की जिला टीमें भी शामिल हैं।


शहरी क्षेत्रों के प्रदर्शन पर उठे सवाल

पार्टी के प्रदेश नेतृत्व तक पहुंची शिकायतों में दावा किया गया है कि शहरी इलाकों में कई भाजपा पार्षद चुनाव प्रचार में सक्रिय नहीं रहे। आरोप यह भी है कि पार्टी के पारंपरिक समर्थकों को मतदान केंद्र तक लाने के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं किए गए। संगठन का मानना है कि इसका असर चुनाव परिणाम पर पड़ा और कांग्रेस को बढ़त मिली।


कुछ शिकायतों में यह भी कहा गया है कि कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने पार्टी के पक्ष में काम कर रहे कार्यकर्ताओं की गतिविधियों में भी बाधा डाली। वहीं, शहरी क्षेत्रों में महिला मतदाताओं की अपेक्षाकृत कम भागीदारी के कारण लाड़ली बहना जैसी योजनाओं का राजनीतिक लाभ भी भाजपा को नहीं मिल सका।


जांच के बाद तय होगी अगली कार्रवाई

भाजपा ने पूरे मामले की जांच के लिए दो वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी है। सागर संभाग के प्रभारी गौरव रणदिवे और पूर्व संगठन मंत्री अंबाराम कराड़ा जांच समिति में शामिल किए गए हैं। दोनों नेताओं की रिपोर्ट मिलने के बाद कथित भीतरघात और संगठनात्मक लापरवाही के मामलों में आगे की कार्रवाई की जाएगी।


नए जिलाध्यक्ष की तलाश शुरू

दतिया भाजपा के नए जिलाध्यक्ष को लेकर भी संगठन में मंथन जारी है। संभावित नामों में भांडेर के पूर्व विधायक घनश्याम पिरोनिया और हाल ही में विधानसभा चुनाव लड़ चुके आशुतोष तिवारी प्रमुख दावेदार बताए जा रहे हैं।


घनश्याम पिरोनिया को दलित समाज में उनकी पकड़ के कारण मजबूत विकल्प माना जा रहा है। माना जा रहा है कि पार्टी दतिया में दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति के तहत उनके नाम पर विचार कर सकती है। वहीं, आशुतोष तिवारी के नाम पर भी चर्चा इसलिए है कि उन्हें संगठन की कमान देकर स्थानीय नेतृत्व को नया संदेश दिया जा सके।


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