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‘ऐसे सिस्टम में काम करना संभव नहीं’ — फिर भी कुर्सी से क्यों चिपके हैं इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव?

02 जन, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
‘ऐसे सिस्टम में काम करना संभव नहीं’ — फिर भी कुर्सी से क्यों चिपके हैं इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव?

‘ऐसे सिस्टम में काम करना संभव नहीं’ — फिर भी कुर्सी से क्यों चिपके हैं इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव?

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। इंदौर का भागीरथपुरा दूषित पानी कांड अब केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि राजनीतिक पाखंड का चेहरा बन चुका है। खुद महापौर पुष्यमित्र भार्गव सार्वजनिक मंच से कह रहे हैं कि “ऐसे सिस्टम में काम करना संभव नहीं”, अधिकारी फाइलें नहीं ले रहे, संवाद से भाग रहे हैं, कलेक्टर तक उनकी बात नहीं सुन रहा — फिर भी वही महापौर पूरे आत्मविश्वास से अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं। यह सवाल अब शहर के हर नागरिक के मन में है- “जब सिस्टम इतना ही सड़ा हुआ है, तो पुष्यमित्र भार्गव अब तक इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे?”


मैसेज भेजा, कोई नहीं सुना… फिर महापौर की क्या हैसियत?

भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर गुरुवार को रेसीडेंसी कोठी में हुई बैठक में इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने दावा किया कि उन्होंने दो दिन पहले ही कलेक्टर को मैसेज भेज दिया था कि भागीरथपुरा में उल्टी-दस्त फैल रहे हैं। लेकिन प्रशासन ने कुछ नहीं किया। सोचिए — अगर शहर का पहला नागरिक मैसेज भेजे और उसे अनदेखा कर दिया जाए, तो यह सीधे-सीधे महापौर पद की बेइज्जती नहीं तो क्या है? फिर सवाल उठता है, “क्या महापौर सिर्फ फोटो खिंचवाने और बयानबाज़ी के लिए हैं?”


“मैं राजनीति में इसलिए नहीं आया…” – तो फिर किस लिए आए थे?

बैठक में भावुक होकर कहना कि, “मैं ऐसी राजनीति के लिए नहीं आया हूं।” यह लाइनें सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है क, न अधिकारी सुधर रहे हैं, न सिस्टम बदला, न जनता को राहत मिली और न ही महापौर ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ा। तो फिर यह आक्रोश किसलिए है? मीडिया हेडलाइन के लिए? या मुख्यमंत्री तक “संदेश भिजवाने” की औपचारिकता निभाने के लिए?


अगर सुनवाई नहीं होती, तो इस्तीफा क्यों नहीं?

महापौर खुद कह रहे हैं क, अधिकारी ईमानदारी से काम नहीं कर रहे, संवाद नहीं कर रहे, निगम में हजारों शिकायतें पेंडिंग हैं और दूषित पानी पूरे शहर की बस्तियों में फैल चुका है। इतनी बड़ी विफलता के बाद भी यदि कोई व्यक्ति पद पर बना रहता है, तो इसे क्या कहा जाए? जनसेवा या पद-लालच?


भागीरथपुरा में लोग बीमार, महापौर मंच पर नाराज़

एक तरफ बच्चे, बुजुर्ग उल्टी-दस्त से जूझ रहे हैं, अस्पतालों में भीड़ है, और दूसरी तरफ शहर का महापौर बैठक कक्ष में अधिकारियों पर “भड़क” रहे हैं। लेकिन भड़कने से सिस्टम नहीं सुधरता, इस्तीफे से संदेश जाता है। लेकिन पुष्यमित्र भार्गव ने वह साहस आज तक नहीं दिखाया।


आक्रोश नहीं, जवाबदेही चाहिए

अगर सच में “ऐसे सिस्टम में काम करना संभव नहीं” है, तो सबसे पहले पद छोड़िए। जनता को दिखाइए कि आप कुर्सी से बड़े हैं। वरना इतिहास यही लिखेगा कि — इंदौर का महापौर सिस्टम को कोसता रहा, लेकिन उसी सिस्टम की कुर्सी से चिपका भी रहा।


यह सिर्फ हादसा नहीं, यह पाप है : उमा भारती

इंदौर में गंदा पानी पीकर लोगों की मौतें अब कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं रहीं। यह सत्ता, सिस्टम और संवेदनहीन शासन की ऐसी गंदी तस्वीर बन चुकी हैं, जिसे खुद भाजपा की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने “पाप” करार दे दिया है। अपने X पोस्ट में उमा भारती ने लिखा कि — “2025 के अंत में इंदौर में गंदे पानी से हुई मौतें हमारा प्रदेश, हमारी सरकार और हमारी पूरी व्यवस्था को शर्मिंदा और कलंकित कर गईं।” जिस शहर को देश भर में “सबसे स्वच्छ” का तमगा पहनाया जाता रहा, उसी शहर में जहर मिला पानी पीकर लोग मर रहे हैं। उमा भारती ने इस दोहरे चेहरे को बेनकाब करते हुए कहा कि — “इतनी बदसूरती, गंदगी और ज़हर मिला पानी कितनी जिंदगियों को निगल गया और अभी भी मौत का आंकड़ा बढ़ रहा है।”


दो लाख की ‘राहत’ या इंसान की कीमत?

उमा भारती ने सरकार की संवेदनहीनता पर सबसे तीखा वार करते हुए कहा — “जिंदगी की कीमत दो लाख रुपए नहीं होती।” यह मुआवजा नहीं, यह पीड़ित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कना है। जिन घरों के चिराग बुझ गए, वे जीवन भर के लिए अंधेरे में डूब गए हैं। और फिर उन्होंने वह पंक्ति लिखी, जिसने पूरी भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया —  “इस पाप का घोर प्रायश्चित करना होगा, पीड़ितों से माफी मांगनी होगी और नीचे से ऊपर तक जो भी अपराधी हैं, उन्हें अधिकतम दंड देना होगा।”


यह मोहन यादव की परीक्षा है — और इंदौर नगर निगम का असली चेहरा

उमा भारती ने साफ कहा — “यह मोहन यादव जी की परीक्षा की घड़ी है।” मतलब साफ है — यह सिर्फ इंदौर नगर निगम नहीं, पूरी भाजपा सरकार की विश्वसनीयता का इम्तिहान है।


जब भाजपा की अपनी पूर्व मुख्यमंत्री इस पूरे सिस्टम को ‘पाप’ बता रही हैं, तो क्या अब भी कोई शक बचता है? यह बयान सीधे यह साबित करता है कि इंदौर नगर निगम पूरी तरह फेल हो चुका है। शहर का “स्वच्छता अवार्ड” आज लाशों और गंदे पानी के बीच एक क्रूर मज़ाक बन गया है।

अब सवाल जनता पूछ रही है — क्या सरकार अब भी इस पाप का प्रायश्चित करेगी या फिर अगली मौत का इंतजार करेगी?

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