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2013 में 1,820 वोट से हारे, अब BJP के राष्ट्रीय महामंत्री; पढ़िए गजेंद्र पटेल की सियासी कहानी

18 अग, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
2013 में 1,820 वोट से हारे, अब BJP के राष्ट्रीय महामंत्री; पढ़िए गजेंद्र पटेल की सियासी कहानी
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। 2013 में भगवानपुरा विधानसभा चुनाव में 1,820 वोट से हार, 2019 में 2 लाख से ज्यादा वोटों की लोकसभा जीत, 2024 में लगातार दूसरी बार संसद पहुंचना और अब भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में महामंत्री की जिम्मेदारी। गजेंद्र सिंह पटेल का राजनीतिक सफर सिर्फ चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं है। यह उस संगठनात्मक यात्रा की कहानी भी है, जिसमें निमाड़ के एक नेता ने पहले आदिवासी राजनीति में अपनी जगह बनाई और फिर राष्ट्रीय संगठन की मुख्यधारा तक पहुंचे। सवाल यही है कि भाजपा ने उन पर इतना बड़ा भरोसा क्यों जताया और इस नियुक्ति के पीछे मध्यप्रदेश से लेकर आदिवासी राजनीति तक क्या संदेश छिपा है?


राष्ट्रीय टीम में जगह से बढ़ा गजेंद्र पटेल का कद

17 अगस्त 2026 को भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम का ऐलान किया। इस टीम में आठ राष्ट्रीय महामंत्री बनाए गए हैं और गजेंद्र सिंह पटेल भी उनमें शामिल हैं। उनके साथ विनोद तावड़े, सुनील बंसल, बिप्लब कुमार देब, स्मृति ईरानी, सतीश पूनिया, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया को भी राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी मिली है। वहीं बीएल संतोष राष्ट्रीय महामंत्री संगठन के पद पर बने हुए हैं।


इस नियुक्ति की अहमियत समझने के लिए यह अंतर समझना जरूरी है कि गजेंद्र पटेल को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है, न कि राष्ट्रीय महामंत्री संगठन। भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में दोनों पद अलग हैं। इसलिए पटेल की नई जिम्मेदारी को पार्टी के व्यापक राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका के तौर पर देखा जाना चाहिए।


आखिर गजेंद्र पटेल ही क्यों?

भाजपा ने उनकी नियुक्ति की कोई विस्तृत आधिकारिक वजह सार्वजनिक नहीं की है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि उन्हें किसी एक खास सामाजिक या चुनावी समीकरण के कारण राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है। लेकिन उनके राजनीतिक सफर को सामने रखकर देखें तो तीन बातें साफ दिखाई देती हैं—संगठनात्मक अनुभव, आदिवासी क्षेत्र से मजबूत राजनीतिक जुड़ाव और लगातार दो लोकसभा चुनाव जीतने की क्षमता।


गजेंद्र पटेल खरगोन-बड़वानी की एसटी आरक्षित लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सीट सिर्फ एक संसदीय क्षेत्र नहीं, बल्कि पश्चिमी मध्यप्रदेश के महत्वपूर्ण आदिवासी राजनीतिक भूगोल का हिस्सा है। खरगोन लोकसभा क्षेत्र में आठ विधानसभा सीटें आती हैं—महेश्वर, कसरावद, खरगोन, भगवानपुरा, सेंधवा, राजपुर, पानसेमल और बड़वानी। बड़वानी जिले की चारों विधानसभा सीटें इसी लोकसभा क्षेत्र में आती हैं और सभी एसटी आरक्षित हैं। यानी पटेल का राजनीतिक आधार उस इलाके में है जहां आदिवासी राजनीति का असर चुनावी नतीजों पर सीधे दिखाई देता है।


2013 की हार से शुरू होती है कहानी

गजेंद्र सिंह पटेल की राजनीति को समझने के लिए 2019 की लोकसभा जीत से शुरुआत करना अधूरा होगा। उनकी कहानी में एक महत्वपूर्ण पड़ाव इससे छह साल पहले आता है। 2013 में उन्होंने भगवानपुरा विधानसभा सीट से भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। उन्हें 65,431 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के विजय सिंह को 67,251 वोट मिले। अंतर सिर्फ 1,820 वोट का था।


यह हार बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन इसके बाद उनका राजनीतिक सफर सीधे चुनावी मैदान तक सीमित नहीं रहा। संगठन में उनकी भूमिका आगे बढ़ती गई। वे जिला स्तर से लेकर युवा मोर्चा, अनुसूचित जनजाति मोर्चा और प्रदेश संगठन तक अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते रहे। बाद में वे भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री बने।


2019 में राजनीतिक तस्वीर बदली

2013 की विधानसभा हार के छह साल बाद गजेंद्र पटेल को भाजपा ने खरगोन लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। 2019 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के डॉ. गोविंद सुबान मुजाल्दा को 2,02,510 वोटों से हराया। पटेल को 7,73,550 वोट मिले, जो कुल मतों का 54.19 प्रतिशत था। कांग्रेस उम्मीदवार को 5,71,040 वोट मिले और उनका वोट शेयर 40 प्रतिशत रहा। यह सिर्फ जीत नहीं थी; यह वह चुनाव था जिसने पटेल को मध्यप्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर पहुंचा दिया। दिलचस्प बात यह है कि 2013 में जिस राजनीतिक क्षेत्र में वे मामूली अंतर से चुनाव हारे थे, उसी व्यापक इलाके से कुछ वर्षों बाद वे लोकसभा सांसद बनकर सामने आए। यहीं से उनके राजनीतिक सफर में एक पैटर्न दिखाई देता है—संगठन में काम, चुनावी मैदान में वापसी और फिर बड़े स्तर की जिम्मेदारी।


2024 की जीत ने भरोसा और मजबूत किया

2019 की जीत को केवल मोदी लहर का परिणाम मानकर छोड़ देना भी पटेल की राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह नहीं समझाता। 2024 में उन्होंने खरगोन सीट से लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। इस बार पटेल को 8,19,863 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के पोरलाल बाथा खरते को 6,84,845 वोट मिले। जीत का अंतर 1,35,018 वोट रहा। पटेल का वोट शेयर करीब 52.60 प्रतिशत रहा। 2019 में भाजपा को 7.73 लाख वोट मिले थे और जीत का अंतर 2.02 लाख था। 2024 में वोट बढ़कर 8.19 लाख हो गए, लेकिन जीत का अंतर घटकर 1.35 लाख रह गया। यानी पटेल ने वोटों की संख्या बढ़ाई, लेकिन मुकाबला पिछले चुनाव की तुलना में कुछ ज्यादा प्रतिस्पर्धी हुआ।


निमाड़ का समीकरण क्या कहता है?

गजेंद्र पटेल की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान निमाड़ और आदिवासी क्षेत्र से जुड़ी है। खरगोन लोकसभा सीट एसटी के लिए आरक्षित है और इसमें बड़वानी जिले की चारों विधानसभा सीटें शामिल हैं। लेकिन इस इलाके की राजनीति को केवल “भाजपा का मजबूत क्षेत्र” कहना सही तस्वीर नहीं देगा। 2023 के विधानसभा चुनाव में खरगोन लोकसभा क्षेत्र की आठ विधानसभा सीटों में भाजपा ने तीन सीटें जीतीं—महेश्वर, खरगोन और पानसेमल। कांग्रेस ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की—कसरावद, भगवानपुरा, सेंधवा, राजपुर और बड़वानी। यानी एक तरफ लोकसभा में भाजपा के गजेंद्र पटेल को लगातार दो बार स्पष्ट जीत मिलती है, दूसरी तरफ उसी संसदीय क्षेत्र के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रभाव बना हुआ है। लोकसभा का चुनावी समीकरण और विधानसभा का समीकरण एक जैसा नहीं है।


राष्ट्रीय संगठन में पटेल की भूमिका के लिहाज से यह अनुभव उपयोगी हो सकता है। वे ऐसे क्षेत्र से आते हैं जहां भाजपा को लोकसभा में सफलता मिलती है, लेकिन विधानसभा स्तर पर उसे लगातार राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ता है।


आदिवासी राजनीति से राष्ट्रीय संगठन तक

गजेंद्र पटेल के राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा बदलाव यहीं दिखाई देता है। पहले उनकी पहचान क्षेत्रीय नेता और फिर अनुसूचित जनजाति मोर्चे के राष्ट्रीय पदाधिकारी के रूप में बनी। अब वे भाजपा के मुख्य राष्ट्रीय संगठन में राष्ट्रीय महामंत्री हैं। यह बदलाव सिर्फ पद बदलने का मामला नहीं है। यह उनके राजनीतिक कार्यक्षेत्र के विस्तार का संकेत है।


भाजपा की रणनीति में मध्यप्रदेश का बढ़ता वजन

गजेंद्र पटेल अकेले मध्यप्रदेश से राष्ट्रीय टीम में शामिल नहीं हुए हैं। नई टीम में मध्यप्रदेश से कई नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां मिली हैं। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि राष्ट्रीय संगठन में राज्य के नेताओं को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। लेकिन पटेल का मामला बाकी नेताओं से कुछ अलग है। उनके पास एक साथ तीन राजनीतिक पहचान हैं: निमाड़ का नेता, आदिवासी क्षेत्र का सांसद और राष्ट्रीय संगठन का अनुभवी पदाधिकारी।


अब आगे की चुनौती क्या होगी?

राष्ट्रीय महामंत्री बनना गजेंद्र पटेल के राजनीतिक सफर का बड़ा पड़ाव जरूर है, लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी परीक्षा की शुरुआत भी हो सकती है। अब सवाल यह नहीं रहेगा कि वे अपने संसदीय क्षेत्र में चुनाव जीत सकते हैं या नहीं। सवाल यह होगा कि वे दूसरे राज्यों में संगठन को कितना समझते हैं, अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच पार्टी का संदेश कितनी प्रभावी तरीके से पहुंचा सकते हैं और संगठन के भीतर अलग-अलग स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ कितना प्रभावी तालमेल बना सकते हैं।

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