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गोवर्धन पूजा : गौ-सेवा, प्रकृति संरक्षण और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकल्प: राजेंद्र शुक्ल

06 नव, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
गोवर्धन पूजा : गौ-सेवा, प्रकृति संरक्षण और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकल्प: राजेंद्र शुक्ल
Hitesh Kumar Singh
डेस्क रिपोर्टर
Hitesh Kumar Singh

गोवर्धन पूजा भारतीय सनातन संस्कृति का ऐसा पावन पर्व है, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, गौ-माता के प्रति श्रद्धा और समस्त जीव-जगत के संरक्षण का संदेश देता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला हमें यह सिखाती है कि प्रकृति, पर्वत, जल, वनस्पति और गौवंश का संरक्षण मानव जीवन के अस्तित्व एवं समृद्धि के लिए अनिवार्य है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था और अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व तथा समाज के सामूहिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है।


भारतीय संस्कृति में गौ-माता का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। हमारी कृषि व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण, पर्यावरण और सामाजिक जीवन में गौवंश का योगदान सदियों से रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ जोड़कर आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री जी का स्पष्ट विजन है कि गांव आत्मनिर्भर बनें, किसान समृद्ध हों, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो और अपशिष्ट को भी आर्थिक संपदा में परिवर्तित किया जाए। गौ-संवर्धन, प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और गोबर से स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन इसी दूरदर्शी सोच के महत्वपूर्ण आयाम हैं।


प्राकृतिक खेती और गोबर-धन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा

प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने की प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की पहल तथा गोबर-धन जैसी योजनाएं आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। गोबर एवं अन्य जैविक अपशिष्ट से बायोगैस और कम्प्रेस्ड बायोगैस उत्पादन को बढ़ावा देने से स्वच्छ ऊर्जा के साथ जैविक खाद का उत्पादन, ग्रामीण रोजगार और किसानों की आय बढ़ाने के नए अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। वेस्ट-टू-वेल्थ अर्थात अपशिष्ट से संपदा का सिद्धांत आज ग्रामीण विकास की एक प्रभावी अवधारणा बन रहा है। गोबर और कृषि अपशिष्ट का वैज्ञानिक उपयोग न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि इससे गांवों में स्थानीय उद्यमिता को भी बढ़ावा मिल सकता है। जैविक संसाधनों का बेहतर उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ किसानों को अतिरिक्त आय का माध्यम प्रदान करता है।


मध्यप्रदेश में गौ-संरक्षण और संवर्धन के व्यापक प्रयास

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार गौ-संरक्षण एवं संवर्धन को जनभागीदारी और आर्थिक स्वावलंबन से जोड़कर आगे बढ़ा रही है। प्रदेश में वर्ष 2024-25 को गौवंश संरक्षण एवं संवर्धन वर्ष के रूप में मनाया गया। गौशालाओं को मिलने वाली सहायता राशि 20 रुपये से बढ़ाकर 40 रुपये प्रति गौवंश प्रतिदिन की गई है। गौवंश के भरण-पोषण के लिए बजट में भी उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। पंजीकृत एवं संचालित गौशालाओं को डीबीटी के माध्यम से सीधे अनुदान राशि उपलब्ध कराई जा रही है। इससे गौवंश के लिए चारा, आहार, देखभाल और आवश्यक व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने में सहायता मिल रही है।


आर्थिक सशक्तीकरण का बन सकता है प्रभावी माध्यम

राज्य सरकार का उद्देश्य गौशालाओं को केवल निराश्रित गौवंश के आश्रय स्थल तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता और ग्रामीण रोजगार के केंद्र के रूप में विकसित करना है। गोबर से जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट, गो-काष्ठ, उपले तथा अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार कर गौशालाओं की आय बढ़ाई जा सकती है। गोबर और गोमूत्र आधारित प्राकृतिक खेती से कृषि लागत में कमी लाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने तथा पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के अवसर उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार गौ-संवर्धन किसान, पशुपालक, महिला स्व-सहायता समूह और ग्रामीण उद्यमियों के आर्थिक सशक्तीकरण का प्रभावी माध्यम बन सकता है।


बसामन मामा गोवंश वन्य विहार : गौ-सेवा और प्राकृतिक खेती का प्रेरक मॉडल

विंध्य की धरती पर गौ-संरक्षण और प्राकृतिक खेती के समन्वित दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण रीवा स्थित बसामन मामा गोवंश वन्य विहार है। यह केवल गौवंश के आश्रय का केंद्र नहीं, बल्कि गौ-सेवा, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और प्राकृतिक खेती का विकसित होता मॉडल है। लगभग एक हजार एकड़ वन क्षेत्र से घिरे इस परिसर में निराश्रित गौवंश के संरक्षण के साथ प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग की दिशा में कार्य किए जा रहे हैं। गोबर और गोमूत्र से जैविक खाद तथा अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं को विकसित किया जा रहा है। गौवंश आधारित प्राकृतिक खेती का यह प्रयोग छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है। 25 दिसंबर 2025 को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का रीवा स्थित बसामन मामा गोवंश वन्य विहार में आगमन हमारे लिए विशेष गौरव का विषय रहा। उन्होंने गौवंश वन्य विहार का अवलोकन किया और गौ-संरक्षण एवं प्राकृतिक खेती के प्रयासों की जानकारी प्राप्त की।


सीमांत किसानों को समृद्ध बनाने का सफल प्रयोग बताया 

अमित शाह ने बसामन मामा गोवंश वन्य विहार को प्राकृतिक खेती के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को समृद्ध बनाने का सफल प्रयोग बताया। उन्होंने प्राकृतिक खेती से किसानों की आय बढ़ने, जल संरक्षण को प्रोत्साहन मिलने और लोगों को अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाने में सहायता मिलने की बात कही। साथ ही पारंपरिक कृषि पद्धतियों को अपनाने और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का आह्वान किया। यह मार्गदर्शन हमारे लिए प्रेरणास्रोत है। बसामन मामा में विकसित हो रहा मॉडल इस बात का प्रमाण है कि गौवंश का संरक्षण और किसानों की आर्थिक समृद्धि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। इस क्षेत्र को प्राकृतिक एवं जैविक खेती के ऐसे मॉडल के रूप में विकसित करने का प्रयास है, जहां गौशाला से प्राप्त संसाधनों का उपयोग कृषि, उद्यानिकी, जैविक खाद और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने में किया जा सके।


हिनौती गौधाम : गौ-संरक्षण के साथ स्वरोजगार और ऊर्जा का केंद्र

रीवा में हिनौती गौधाम वन्य विहार को आदर्श गौ-अभयारण्य के रूप में विकसित करने की योजना भी इसी व्यापक सोच का विस्तार है। यहां 15 हजार से अधिक गौवंश को आश्रय देने की परिकल्पना की गई है। प्रारंभिक चरण में तीन हजार गौवंश के लिए व्यवस्थाएं विकसित करने तथा आगे चलकर गौधाम को कौशल प्रशिक्षण, जल संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा और स्वरोजगार से जोड़ने की योजना है। गोबर गैस संयंत्र और धान के पैरे से ऊर्जा उत्पादन जैसे प्रकल्प इस पहल को पर्यावरण संरक्षण एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ते हैं। हिनौती गौधाम भविष्य में गौ-संरक्षण, स्थानीय रोजगार और ग्रामीण स्वावलंबन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।


लक्ष्मणबाग गौशाला : सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सहभागिता

रीवा की ऐतिहासिक लक्ष्मणबाग गौशाला गौ-सेवा और संरक्षण की हमारी परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां गौवंश के संरक्षण, भरण-पोषण और गौशाला की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। लक्ष्मणबाग जैसी संस्थाओं का संरक्षण एवं विकास हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के साथ सामाजिक सहभागिता को भी मजबूत करता है। मेरा मानना है कि शासन के प्रयासों के साथ समाज, धार्मिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से गौ-संरक्षण का अभियान व्यापक जनआंदोलन बन सकता है।


आत्मनिर्भर गांवों से विकसित भारत का मार्ग

मध्यप्रदेश सरकार का संकल्प है कि प्रदेश में गौवंश को निराश्रित छोड़ने की समस्या का स्थायी समाधान किया जाए। इसके लिए गौशालाओं की क्षमता बढ़ाने, चारे की उपलब्धता, पशु चिकित्सा सुविधाओं, बेहतर प्रबंधन और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। गौपालन को किसानों की अतिरिक्त आय का माध्यम बनाने, नस्ल सुधार, दुग्ध उत्पादन और पशुपालन आधारित स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। गोवर्धन पूजा हमें यह स्मरण कराती है कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता भी है। गौ-माता की सेवा, गौवंश का संरक्षण, प्राकृतिक खेती और जैविक संसाधनों का सदुपयोग हमारे भविष्य को सुरक्षित बनाने के महत्वपूर्ण आधार हैं।


गौ-संरक्षण को केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रखें

आज आवश्यकता है कि हम गौ-संरक्षण को केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रखें, बल्कि इसे पर्यावरण संरक्षण, कृषि सुधार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सशक्तीकरण से जोड़ें। गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाना, किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए प्रोत्साहित करना और जैविक संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग करना समय की मांग है। आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी गौ-सेवा, गौ-संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और प्राकृतिक खेती को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का संकल्प लें। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत एवं विकसित भारत के विजन और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश को गौ-संवर्धन, प्राकृतिक खेती और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का अग्रणी केंद्र बनाने के लिए मिलकर कार्य करें। गौ-सेवा में संस्कृति का संरक्षण है, प्रकृति के सम्मान में मानवता का कल्याण है और आत्मनिर्भर गांवों में विकसित भारत का भविष्य है। सभी प्रदेशवासियों को गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं।


  • लेखक मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। 

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