
ग्वालियर। जब किसी इंसान की आँखें बंद हो जाएं, तो क्या उसके अधिकार भी दफन हो जाते हैं? ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस सवाल का जवाब बड़े साफ शब्दों में दिया है — नहीं। 22 साल की कानूनी लड़ाई के बाद एक दिवंगत कृषि अधिकारी के परिवार को वह सब मिला, जो जिंदगी में नहीं मिल सका।
विभाग ने जूनियर को दे दिया प्रमोशन, सीनियर रह गए पीछे
वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी डॉ. राधाकृष्ण शर्मा अपनी वरिष्ठता के आधार पर वर्ष 2002 में पदोन्नति के पूरी तरह हकदार थे। लेकिन जब प्रमोशन की बारी आई, तो विभाग ने उन्हें नजरअंदाज कर उनके जूनियर अधिकारियों को आगे बढ़ा दिया। विभाग का तर्क था — डॉ. शर्मा के खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित है और उनकी गोपनीय रिपोर्ट (ACR) भी साफ नहीं है। लेकिन असल तस्वीर इससे बिल्कुल अलग निकली।
बरी हो गए, फिर भी नहीं मिला इंसाफ
समय के साथ डॉ. शर्मा उस आपराधिक मामले से पूरी तरह बरी हो गए। आरोप झूठे साबित हुए, जिंदगी उनके पक्ष में बोली। लेकिन विभाग ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पदोन्नति पर पुनर्विचार का कोई प्रयास नहीं हुआ। यही लापरवाही एक लंबी कानूनी लड़ाई की नींव बनी — और 2008 में डॉ. शर्मा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
यह क्यों बना इतिहास? समझिए पूरा कॉन्टेक्स्ट
भारत में सरकारी सेवा के मामलों में अक्सर यह देखा जाता है कि ACR और विभागीय रिपोर्ट कर्मचारियों के भविष्य को तय करती हैं — भले ही वे रिपोर्टें कभी उन्हें दिखाई ही न गई हों। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट पहले भी कह चुके हैं कि बिना बताई गई ACR पदोन्नति रोकने का आधार नहीं बन सकती। यह संविधान के अनुच्छेद 14 — यानी समानता के अधिकार — का उल्लंघन है। इस मामले ने उस सिद्धांत को एक बार फिर मजबूती से स्थापित किया।
बेटे ने उठाई मशाल, पिता के नाम पर आया फैसला
करीब 18 साल तक मामला अदालत में विचाराधीन रहा। इस बीच डॉ. राधाकृष्ण शर्मा का निधन हो गया। उनका सपना अधूरा रह गया — लेकिन उनके पुत्र रमन शर्मा ने हार नहीं मानी। रमन ने पिता की लड़ाई को अपनी लड़ाई बनाया और अदालत के सामने पूरे तथ्य रखे। अंत में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने वह फैसला सुनाया, जो पूरे परिवार के लिए राहत की सांस बनकर आया।
कोर्ट ने साफ कहा — गलती कर्मचारी की नहीं, विभाग की थी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि "नो वर्क-नो पे" का सिद्धांत तब लागू नहीं होता, जब गलती कर्मचारी की न होकर विभाग की हो। अदालत ने माना कि डॉ. शर्मा को पदोन्नति न मिलना विभागीय लापरवाही का नतीजा था — न कि उनकी किसी कमजोरी का। कोर्ट का यह भी मानना था कि जो ACR पदोन्नति रोकने का आधार बनाई गई, वह कभी डॉ. शर्मा को दिखाई ही नहीं गई — यह सीधे तौर पर असंवैधानिक था।
परिवार को मिलेगा 2002 से पूरा बकाया
अदालत ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि डॉ. राधाकृष्ण शर्मा को 28 अक्टूबर 2002 से पदोन्नत माना जाए। उसी तारीख से उनका वेतन, एरियर, वरिष्ठता और सभी सेवा लाभ जोड़कर पूरी राशि परिवार को दी जाए। यह वह तारीख है जब प्रमोशन होना चाहिए था — और अदालत ने तय किया कि न्याय भी उसी तारीख से शुरू होगा।
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