
भोपाल। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते जल संकट के दौर में भोपाल के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में आने वाले जल संकट की पहले से चेतावनी दे सकेगी। भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल के शोधकर्ताओं ने AI और सैटेलाइट डेटा आधारित एक अर्ली वार्निंग मॉडल तैयार किया है। यह मॉडल बाढ़, सूखा और भूजल में कमी जैसे खतरों के शुरुआती संकेत पहचानकर समय रहते अलर्ट देने में मदद करेगा।
AI और सैटेलाइट मिलकर करेंगे भविष्यवाणी
IISER भोपाल के वैज्ञानिक डॉ. सोमिल स्वर्णकार के अनुसार, सैटेलाइट से बारिश, नदियों के जलस्तर, झीलों की स्थिति और भूजल भंडार से जुड़ा डेटा जुटाया जा रहा है। इसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इन आंकड़ों का विश्लेषण कर संभावित जल संकट और मौसम संबंधी जोखिमों का पूर्वानुमान तैयार करता है। इससे प्रशासन और आम लोगों को समय रहते तैयारी का मौका मिल सकता है।
क्यों खास है यह तकनीक?
अभी तक अधिकांश चेतावनियां संकट आने के बाद या उसके बेहद करीब मिलने लगती थीं। नया मॉडल जोखिम के शुरुआती संकेतों को पहचानने की क्षमता रखता है। इससे बाढ़ प्रबंधन, जल संरक्षण और आपदा नियंत्रण से जुड़ी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
बदल रहा है नदियों का प्राकृतिक स्वरूप
वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह भी सामने आया है कि देश की कई नदियां तेजी से अपना प्राकृतिक स्वरूप खो रही हैं। बड़े बांधों, जल प्रवाह नियंत्रण और अनियोजित विकास के कारण नदियों का संतुलन प्रभावित हो रहा है। कई स्थानों पर मानसून के दौरान अचानक बाढ़ आती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में जलस्तर लगातार घट रहा है।
बाढ़ और कटाव का बढ़ रहा खतरा
जल प्रवाह में बदलाव का असर केवल नदी तक सीमित नहीं है। इससे मिट्टी का कटाव, नदी तंत्र और आसपास के पर्यावरण पर भी असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन बदलावों की निगरानी नहीं की गई तो भविष्य में बाढ़ के पैटर्न और अधिक अनिश्चित हो सकते हैं।
झीलें और वेटलैंड भी सिमट रहे
सैटेलाइट आधारित अध्ययन में यह भी पाया गया कि कई शहरों की झीलें और वेटलैंड तेजी से सिकुड़ रहे हैं। शहरीकरण और अतिक्रमण के कारण प्राकृतिक जल स्रोतों का क्षेत्रफल लगातार कम हो रहा है। इससे भूजल रिचार्ज की क्षमता प्रभावित हो रही है और शहरों का तापमान भी बढ़ रहा है।
भूजल और पेयजल पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, झीलों और वेटलैंड के घटने का सीधा असर पेयजल उपलब्धता पर पड़ रहा है। यदि प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में कई शहरी क्षेत्रों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
भविष्य की चुनौतियों से निपटने का नया हथियार
IISER भोपाल का यह AI आधारित मॉडल केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और आपदा नियंत्रण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पाठकों की राय (0)
इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

