
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के जेपी अस्पताल में 31 और 33 वर्षीय दो युवकों के दिमाग में विचार ऐसे फूट रहे थे जैसे माइक्रोवेव में पॉपकॉर्न… रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे! बेचैनी, घबराहट, नींद गायब और एकाग्रता शून्य। डॉक्टरों ने बताया—यह कोई साधारण तनाव नहीं, बल्कि मोबाइल की तेज स्क्रॉलिंग और डिजिटल ओवरलोड से पैदा हुई पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम नाम की नई मानसिक बीमारी है।
क्या है Popcorn Brain Syndrome?
जेपी अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. राहुल शर्मा बताते हैं, "मोबाइल पर लगातार बदलती जानकारी और तेज रफ्तार कंटेंट से दिमाग एक जगह टिक नहीं पाता और विचार पॉपकॉर्न की तरह फूटने लगते हैं, इससे मानसिक थकान और एकाग्रता की कमी होती है। इसे ही पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम कहते हैं। स्थिति गंभीर होने पर व्यक्ति ब्रेन फॉग का शिकार हो सकता है।"
केस-1: 5-7 Apps, 6 घंटे मोबाइल और ‘फूटता’ दिमाग!
कोलार का 31 वर्षीय युवक बेचैनी और लगातार बदलते विचारों से परेशान होकर अस्पताल पहुंचा।
काउंसिलिंग में पता चला—
➡️ रोजाना 5 से 6 घंटे मोबाइल
➡️ एक ही विषय के 5 से 7 अलग-अलग Apps
➡️ ध्यान एक जगह टिकता ही नहीं
केस-2: रात भर जागना, घबराहट और दिमाग में विचारों का तूफान
बरखेड़ा निवासी 33 वर्षीय युवक को नींद नहीं आती थी।
➡️ दिमाग में एक साथ कई विचार
➡️ लगातार घबराहट
➡️ पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम की पुष्टि
सिर्फ युवा नहीं, 45+ उम्र वालों में भी तेजी से बढ़ रहा खतरा
डॉ. राहुल शर्मा ने बताया, "यह परेशानी युवाओं के साथ-साथ 45 वर्ष के आयु वर्ग में भी तेजी से बढ़ रही है। यह वह आयु वर्ग है जो अपने काम और सोशल मीडिया दोनों के लिए मोबाइल पर अत्यधिक निर्भर है। लगातार आने वाले नोटिफिकेशन और बदलते कंटेंट से मानसिक थकान बढ़ती है।"
डिजिटल डिटॉक्स ही है इलाज!
➡️ मोबाइल उपयोग को सीमित करें
➡️ योग, ध्यान और मेडिटेशन करें
➡️ पैरेंट्स बच्चों के साथ समय बिताएं
➡️ भूलने या एकाग्रता की कमी की स्थिति में तुरंत मनोचिकित्सक से संपर्क करें
चिकित्सकों के अनुसार यह समस्या पूरी तरह डिजिटल आदतों पर निर्भर है। जितना ज्यादा स्क्रीन टाइम, उतना ज्यादा ब्रेन स्ट्रेन!
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