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केजी सुरेश पर शोध: अंकित पांडेय को राज्यपाल से मिली पीएचडी उपाधि, 30 साल के मीडिया योगदान पर की खास स्टडी

05 मई, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
केजी सुरेश पर शोध: अंकित पांडेय को राज्यपाल से मिली पीएचडी उपाधि, 30 साल के मीडिया योगदान पर की खास स्टडी
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी शैक्षणिक उपलब्धि सामने आई है। केजी सुरेश शोध पर आधारित अध्ययन के लिए डॉ. अंकित पांडेय को पीएचडी (विद्या वाचस्पति) की उपाधि प्रदान की गई। यह उपाधि मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल द्वारा एक गरिमामय समारोह में दी गई—जिसने इस उपलब्धि को और खास बना दिया।



तीन दशकों के योगदान पर गहन अध्ययन

डॉ. अंकित पांडेय का शोध प्रतिष्ठित मीडिया शिक्षाविद् प्रो. (डॉ.) केजी सुरेश के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित है। इसमें उनके 30+ वर्षों के अनुभव को विस्तार से विश्लेषित किया गया है—जिसमें पत्रकारिता, मीडिया शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय संवाद जैसे कई आयाम शामिल हैं।


अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता से संस्थागत नेतृत्व तक

शोध में बताया गया है कि प्रो. सुरेश ने भारत के अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल और चीन जैसे देशों में संवाददाता के रूप में काम किया। उनकी रिपोर्टिंग केवल खबर तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने सामाजिक और वैश्विक मुद्दों को समझने का व्यापक दृष्टिकोण भी दिया।


मीडिया शिक्षा में अहम योगदान

प्रो. सुरेश ने दूरदर्शन में सलाहकार संपादक के रूप में प्रसारण पत्रकारिता को मजबूत किया। साथ ही भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक रहते हुए संस्थान को ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ बनाने की दिशा में पहल की और भाषाई पत्रकारिता को बढ़ावा दिया।


विश्वविद्यालयों में नई पहल और NEP का लागू करना

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु के रूप में उन्होंने भोपाल और रीवा में नए परिसरों की स्थापना कराई। साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को प्रभावी ढंग से लागू कर नई पीढ़ी को मूल्य-आधारित पत्रकारिता की दिशा में प्रेरित किया।


समारोह में कई दिग्गज रहे मौजूद

इस अवसर पर अभिनेता और सांसद रवि किशन और राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। इनकी उपस्थिति ने इस उपलब्धि को और भी प्रतिष्ठित बना दिया—जो इसकी अहमियत को दर्शाता है।


गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत उदाहरण

डॉ. अंकित पांडेय ने अपने शोध को सिर्फ अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए अपने गुरु के प्रति सम्मान और समर्पण की अभिव्यक्ति है—और यही इस उपलब्धि की सबसे खास बात है।

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