
मध्यप्रदेश में कार्बन डाई ऑक्साइड के बाद मीथेन वायु प्रदूषण की बड़ी वजह बनकर सामने आई है। सैटेलाइट विश्लेषण में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में प्रदूषण के चार प्रमुख क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, उत्सर्जन के स्रोत क्षेत्र के हिसाब से बदलते हैं। औद्योगिक और परिवहन गतिविधियां बड़े शहरों में प्रमुख हैं, जबकि सिंगरौली में कोयला खनन और कई जिलों में पशुधन मीथेन उत्सर्जन के बड़े स्रोत हैं।
चार तरह के प्रदूषण क्षेत्र सामने आए
सैटेलाइट आधारित आकलन में मध्यप्रदेश के प्रदूषण क्षेत्रों की तस्वीर अलग-अलग स्रोतों के आधार पर सामने आई है।
- इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर: उद्योग और परिवहन प्रमुख स्रोत।
- सिंगरौली: कोयला खनन से मीथेन उत्सर्जन अधिक।
- सागर, मुरैना, रीवा, खरगोन और छिंदवाड़ा सहित अन्य जिले: पशुधन से मीथेन उत्सर्जन ज्यादा।
- ग्रामीण क्षेत्र: बायोमास जलाने से ब्लैक कार्बन का उत्सर्जन।
तापमान बढ़ने का भी अनुमान
गैर-कार्बन डाई ऑक्साइड प्रदूषकों का असर आने वाले दशकों में तापमान पर भी पड़ सकता है। आकलन के मुताबिक 2030 के दशक तक औसत अधिकतम तापमान 1.8 से 2.0 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 2.0 से 2.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की संभावना है।
राज्य का पूर्वी हिस्सा अपेक्षाकृत तेजी से गर्म हो रहा है। डिंडोरी, भिंड और सीधी जैसे जिले कम अनुकूलन क्षमता के कारण ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में बताए गए हैं।
विशेषज्ञों ने तैयार की बहु-क्षेत्रीय रिपोर्ट
पर्यावरण विभाग की ओर से जारी बहु-क्षेत्रीय आकलन रिपोर्ट में गैर-सीओटू प्रदूषकों से निपटने के उपाय बताए गए हैं। इसे जलवायु परिवर्तन केंद्र, एप्को, इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट और द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) के विशेषज्ञों ने तैयार किया है।
रिपोर्ट का जोर शॉर्ट लिव्ड क्लाइमेट पॉल्यूटेंट्स (SLCPs) को कम करने पर है। स्थानीय जरूरतों के अनुरूप उपाय लागू करने को प्रभावी रणनीति का हिस्सा माना गया है।
2047 तक इन प्रदूषकों में बड़ी कमी का लक्ष्य
रिपोर्ट के आकलन के अनुसार सामान्य स्थिति की तुलना में 2047 तक कई प्रदूषकों के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
प्रदूषक संभावित कमी
सल्फर डाई ऑक्साइड: 80%
नाइट्रोजन ऑक्साइड: 78%
नॉन-मीथेन वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड: 61%
ब्लैक कार्बन: 56%
ऊर्जा, उद्योग और परिवहन में बदलाव पर जोर
गैर-सीओटू प्रदूषकों को नियंत्रित करने के लिए रिपोर्ट में कई तात्कालिक कदम सुझाए गए हैं। इनमें रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार, बिजली क्षेत्र में गैस का इस्तेमाल और उद्योगों में स्वच्छ ईंधन अपनाना शामिल है।
परिवहन क्षेत्र के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने और पुरानी गाड़ियों को हटाने की सिफारिश की गई है।
खेती और पशुपालन से उत्सर्जन घटाने के उपाय
धान की खेती में प्राकृतिक तरीकों को अपनाकर मीथेन उत्सर्जन 65% तक कम किया जा सकता है। पशुपालन में चारे के बेहतर प्रबंधन से मीथेन उत्सर्जन में 10 से 15% तक कमी तेजी से और कम लागत में हासिल करने की संभावना बताई गई है।
कम्युनिटी स्तर पर बायोगैस को बढ़ावा देने और एंटरिक फर्मेंटेशन को रोकने वाले उपाय अपनाने की जरूरत भी रिपोर्ट में रखी गई है।
कोयला खदानों की मीथेन पर भी निगाह
सिंगरौली जैसे कोयला खनन वाले क्षेत्रों में खदानों से निकलने वाली मीथेन को नियंत्रित करने के लिए उसे पकड़ने और जलाने की तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने का सुझाव दिया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक बायोगैस, पशुपालन और कोयला खनन से जुड़े इन उपायों को व्यापक स्तर पर लागू करने से 2030 के बाद उत्सर्जन में ज्यादा और लंबे समय तक कमी लाने में मदद मिल सकती है।
विभागों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत
भविष्य की रणनीति में अलग-अलग सेक्टर की SLCP योजनाओं को राज्य के जलवायु लक्ष्यों से जोड़ने की बात कही गई है। इसके लिए विभागों और संबंधित क्षेत्रों के बीच समन्वय की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
खनन, परिवहन और उद्योगों के लिए अलग-अलग सेक्टर-स्पेसिफिक रोडमैप बनाने तथा उत्सर्जन घटाने के लिए समय-सीमा वाले लक्ष्य निर्धारित करने की सिफारिश की गई है।
पशुपालन, खेती और खनन को प्राथमिकता
रिपोर्ट में पशुपालन, कृषि और कोयला खनन को ऐसे क्षेत्र माना गया है जहां गैर-सीओटू उत्सर्जन घटाने की काफी गुंजाइश है। इन क्षेत्रों में लक्षित रणनीतियों को लागू करने की जरूरत बताई गई है, क्योंकि अब तक इन पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है।
ग्रीन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए राष्ट्रीय मिशनों और केंद्रीय योजनाओं का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। कम-कार्बन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए क्लाइमेट फाइनेंस और CSR फंड जुटाने का सुझाव भी दिया गया है।
रियल-टाइम मॉनिटरिंग पर जोर
उत्सर्जन घटाने के उपायों की निगरानी के लिए मजबूत मॉनिटरिंग और मूल्यांकन प्रणाली विकसित करने की जरूरत बताई गई है।
इस व्यवस्था में रियल-टाइम उत्सर्जन ट्रैकिंग और रिमोट सेंसिंग को शामिल करने का सुझाव है, ताकि नियमों के पालन और बदलती परिस्थितियों के मुताबिक प्रबंधन किया जा सके।
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