
भोपाल। मध्यप्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में कपास की खेती पर कीटों का दबाव बढ़ने से किसानों की लागत बढ़ रही है। करीब 4 लाख हेक्टेयर में हो रही कपास की खेती में गुलाबी इल्ली समेत कई कीटों के प्रकोप की जानकारी सामने आई है।
शोधकर्ता आसिफ सिद्दीकी की शोध के मुताबिक कपास उत्पादन में करीब 30% की गिरावट दर्ज हुई है। कई खेतों में फसल बचाने के लिए 6 से 8 बार कीटनाशक का छिड़काव करना पड़ रहा है, जिससे खेती का खर्च बढ़ रहा है।
चार जिलों में कपास का बड़ा रकबा
कृषि कल्याण विभाग के अनुसार निमाड़ के चार जिलों में कपास की खेती का रकबा करीब 4 लाख हेक्टेयर है। मौसम के अनुसार इसमें कमी-बढ़ोतरी होती रहती है।
- खरगोन: 2.25 लाख हेक्टेयर
- बड़वानी: 80 हजार हेक्टेयर
- खंडवा: 60 हजार हेक्टेयर
- बुरहानपुर: 40 हजार हेक्टेयर
- औसत उत्पादन: 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
इन इलाकों में गुलाबी इल्ली के साथ महुआ और तेलेया जैसे कीट भी फसल को प्रभावित कर रहे हैं।
बीटी कॉटन में बढ़ा कीटनाशक का इस्तेमाल
शोधकर्ता आसिफ सिद्दीकी के अनुसार बीटी कॉटन में पहले जिन दवाओं से कीटों को नियंत्रित किया जाता था, उनका असर अब पहले जैसा नहीं रहा। इसका परिणाम यह है कि किसानों को एक ही फसल में कई बार कीटनाशक डालना पड़ रहा है। एक फसल पर 6-8 स्प्रे तक की जरूरत पड़ने से उत्पादन लागत बढ़ रही है।
वैज्ञानिक ने प्रबंधन तकनीक की जांच पर दिया जोर
भगवंतराव कृषि कॉलेज, खंडवा के पूर्व कपास वैज्ञानिक सतीश परसाई का कहना है कि बीटी कॉटन को मूल रूप से इल्लियों के नियंत्रण के उद्देश्य से विकसित किया गया था।
उनके मुताबिक यदि किसान को आठ बार तक कीटनाशक का इस्तेमाल करना पड़ रहा है तो केवल कीटों की स्थिति ही नहीं, बल्कि खेती में अपनाई जा रही अनुशंसित तकनीक और प्रबंधन व्यवस्था की भी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने बीटी कपास की खेती के दौरान निर्धारित सावधानियों और प्रबंधन उपायों का पालन करने की जरूरत बताई।
2003 से निमाड़ में शुरू हुई थी बीटी कॉटन की खेती
कृषि वैज्ञानिकों ने 2002 में कॉटन बीज को परिष्कृत करके बीटी कॉटन बीज विकसित किया था। इसके अगले साल यानी 2003 से निमाड़ में बीटी कॉटन का उत्पादन शुरू हुआ।
इसके बाद खरगोन, बड़वानी, खंडवा और बुरहानपुर में किसानों ने इसे अपनाया। क्षेत्र में हाइब्रिड कॉटन का स्थान बीटी कॉटन ने ले लिया।
करीब 12 साल बाद मित्र कीटों में कमी
भीकनगांव तहसील के बिलखेड़ी खुर्द के किसान शेरसिंह राजपूत ने बताया कि उन्होंने 2003 से बीटी कॉटन की खेती शुरू की थी। उनके अनुसार समय के साथ खेतों में बिच्छू, लाल वाणिया और केंचुए दिखाई देना कम हो गए। किसानों के मुताबिक बढ़ते कीटनाशक इस्तेमाल का असर खेतों के आसपास मौजूद पक्षियों पर भी पड़ा है।
खेतों में बगुलों की संख्या भी घटी
किसान विजय पाटीदार शुभम के अनुसार पहले जुताई के दौरान मिट्टी से निकलने वाले कीटों को खाने के लिए बड़ी संख्या में बगुले खेतों में पहुंचते थे। अब उनकी संख्या पहले की तुलना में काफी कम दिखाई देती है।
बीटी कॉटन की खेती शुरू होने के करीब 12 साल बाद खेतों से मित्र कीटों के दूर होने और कीट प्रकोप बढ़ने की बात किसानों के अनुभव में सामने आई है। मौजूदा समय में गुलाबी इल्ली कपास किसानों के लिए प्रमुख परेशानी बनी हुई है।
कपास उत्पादन में 30% गिरावट का दावा
शोधकर्ता आसिफ सिद्दीकी की शोध में कपास उत्पादन में करीब 30% कमी का उल्लेख किया गया है। कीटों के बढ़ते प्रभाव और बार-बार कीटनाशक छिड़काव से उत्पादन लागत पर दबाव बढ़ने की बात भी सामने आई है। कपास को मध्यप्रदेश का सफेद सोना कहा जाता है, लेकिन निमाड़ में कीट प्रकोप, बढ़ते स्प्रे और खेतों में मित्र कीटों की कमी ने इसकी खेती से जुड़े कई सवाल खड़े किए हैं।
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