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MP की नदियां संकट में: नर्मदा समेत 200 से ज्यादा नदियां अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं, नर्मदा दुनिया की उन 6 नदियों में शामिल जिनका भविष्य खतरे में

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MP की नदियां संकट में: नर्मदा समेत 200 से ज्यादा नदियां अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं, नर्मदा दुनिया की उन 6 नदियों में शामिल जिनका भविष्य खतरे में

MP की नदियां संकट में: नर्मदा समेत 200 से ज्यादा नदियां अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं, नर्मदा दुनिया की उन 6 नदियों में शामिल जिनका भविष्य खतरे में

Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। कभी कल-कल बहने वाली नर्मदा और मध्य प्रदेश की सैकड़ों नदियां आज मदद की गुहार लगा रही हैं। रेत माफिया, सीधा सीवेज और अतिक्रमण ने प्रदेश की “नदियों का मायका” वाली पहचान को हिला दिया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि दुनिया की प्रतिष्ठित संस्थाओं ने भी खतरे की घंटी बजा दी है।


दुनिया ने भी जताई चिंता

अमेरिका के वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट ने नर्मदा को दुनिया की उन 6 नदियों में शामिल किया है, जिनका भविष्य खतरे में बताया गया है। यह चेतावनी सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बड़ा अलार्म मानी जा रही है।


200 से ज्यादा नदियां, फिर भी बदहाल

मध्य प्रदेश में देश की करीब 450 नदियों में से 200 से ज्यादा बहती हैं। इसके बावजूद हालात चिंताजनक हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक अधिकतर नदियां या तो सूख रही हैं या प्रदूषण से दम तोड़ रही हैं। यहां तक कि बारहमासी मानी जाने वाली नर्मदा भी अब सुरक्षित नहीं रही।


नर्मदा में पानी की गुणवत्ता तेजी से गिर रही

वरिष्ठ पर्यावरणविद डॉ. सुभाष पांडे के अनुसार फिलहाल नर्मदा ही एकमात्र बारहमासी नदी बची है, लेकिन उसमें भी नालों और सहायक नदियों का गंदा पानी मिल रहा है। इससे पानी की गुणवत्ता तेजी से गिर रही है। अवैध रेत खनन ने नदी के इकोसिस्टम को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।


अवैध खनन से खत्म होती बायोडायवर्सिटी

विशेषज्ञ बताते हैं कि रेत के भीतर जलीय जीवों की ब्रीडिंग होती है। जब रेत निकाली जाती है तो मछलियां, कछुए और कई जलीय प्रजातियां खत्म हो जाती हैं। यही जीव नदियों को स्वाभाविक रूप से साफ रखने में मदद करते हैं। इनके बिना नदी खुद को दोबारा जिंदा नहीं कर पाती।


50 साल में सिर्फ ‘पॉइंट्स’ बन जाएगी नर्मदा

डॉ. सुभाष पांडे की चेतावनी है कि अगर यही हाल रहा तो 50 साल बाद नर्मदा एक बहती नदी नहीं, बल्कि जगह-जगह पानी के छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में दिखेगी। अतिक्रमण, जलस्तर में गिरावट और प्रदूषण इसकी बड़ी वजह बनेंगे।


सीवेज भी बड़ा खतरा

नदियों में गिरता सीधा सीवेज दूसरा बड़ा संकट है। कांग्रेस के अनुसार नर्मदा को साफ करने के लिए 28 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट प्रस्तावित थे, लेकिन सिर्फ नेमावर का एक प्लांट आंशिक रूप से चल रहा है। कांग्रेस नेता भूपेंद्र गुप्ता का आरोप है कि सरकार संरक्षण से ज्यादा रेत की कमाई पर ध्यान दे रही है।


तालाबों की हालत भी खराब

भोपाल का बड़ा तालाब, जो शहर की पहचान है, अब सी कैटेगरी के पानी में पहुंच चुका है। डॉ. सुभाष पांडे के मुताबिक भोपाल का कोई भी तालाब पीने योग्य नहीं बचा है, जबकि करीब 12 लाख लोग इसी पानी पर निर्भर हैं।


सरकार का दावा – कार्रवाई जारी

भाजपा प्रवक्ता अजय सिंह यादव का कहना है कि सरकार अवैध खनन पर सख्त है। रेत माफियाओं पर कार्रवाई की जा रही है और नदियों के संरक्षण के लिए निगरानी और बढ़ाई जाएगी।


MP की असली पहचान खतरे में

विशेषज्ञ मानते हैं कि जल, जंगल और नदियां ही मध्य प्रदेश की असली पहचान हैं। अगर इन्हें नहीं बचाया गया तो इसका असर आदिवासी जीवन, खेती, उद्योग और पूरे इकोसिस्टम पर पड़ेगा।

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