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जनजातीय गौरव से विकास तक, मध्यप्रदेश में आदिवासी समाज के लिए बदल रही विकास की तस्वीर

05 अक्टू, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
जनजातीय गौरव से विकास तक, मध्यप्रदेश में आदिवासी समाज के लिए बदल रही विकास की तस्वीर
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

मध्यप्रदेश की पहचान उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता से बनती है और इस विविधता में जनजातीय समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। नर्मदा के अंचलों से लेकर सतपुड़ा, विंध्य और प्रदेश के वनांचलों तक जनजातीय समुदायों ने प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की ऐसी जीवन-पद्धति विकसित की है, जिसमें लोकज्ञान, लोककला, संगीत, नृत्य, वेशभूषा, भाषा और सामुदायिक परंपराओं की समृद्ध विरासत दिखाई देती है। प्रकृति के प्रति सम्मान और सामूहिक जीवन की भावना इस विरासत की मूल विशेषताएं हैं। इसलिए जनजातीय विकास का सवाल केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। यह उनकी अस्मिता, संस्कृति, अधिकारों और परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधुनिक अवसरों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने का भी प्रश्न है।


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार ने जनजातीय कल्याण को इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की आबादी 153.16 लाख थी, जो राज्य की कुल आबादी का 21.10 प्रतिशत है। प्रदेश में 88 अनुसूचित जनजाति विकासखंड हैं। जनजातीय विकास के लिए 26 वृहत आदिवासी विकास परियोजनाएं, 5 मध्यम परियोजनाएं, 30 MADA पॉकेट और 6 लघु अंचल भी संचालित हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि जनजातीय समाज का विकास मध्यप्रदेश की समावेशी विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण आधार है।


गौरव और विकास को साथ लेकर चलने की पहल

डॉ. मोहन यादव सरकार की जनजातीय नीति का एक महत्वपूर्ण आयाम गौरव और विकास को साथ लेकर चलना है। जनजातीय नायकों की स्मृति को केवल आयोजनों और जयंतियों तक सीमित रखने के बजाय उसे शिक्षा, संस्थानों और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण से जोड़ने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। क्रांतिसूर्य टंट्या मामा के नाम पर खरगौन में विश्वविद्यालय की शुरुआत इसी सोच का उदाहरण है। जनजातीय नायक की स्मृति को उच्च शिक्षा के संस्थान से जोड़ना आने वाली पीढ़ियों को इतिहास और विरासत से जोड़ने का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है।


जनजातीय इतिहास और विरासत का संरक्षण

जनजातीय इतिहास के संरक्षण की इसी कड़ी में मंडला के ऐतिहासिक स्थलों का विकास भी महत्वपूर्ण है। राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह और राजा हृदय शाह से जुड़े प्राचीन किले के जीर्णोद्धार के लिए 15 करोड़ रुपये की घोषणा की गई है। यह केवल किसी पुराने भवन के संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक स्मृतियों को सहेजने का प्रयास है, जो जनजातीय समाज के संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान की गाथा कहती हैं। रानी दुर्गावती की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े क्षेत्र में मंत्रि-परिषद की बैठक आयोजित करना भी जनजातीय इतिहास और गौरव को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रतीकात्मक प्रयास रहा है।


संस्कृति संरक्षण से आजीविका तक

जनजातीय संस्कृति का संरक्षण केवल स्मारकों के निर्माण या स्मृति दिवसों के आयोजन से नहीं हो सकता। संस्कृति तब जीवित रहती है, जब वह समाज की रोजमर्रा की जिंदगी, नई पीढ़ी की शिक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी रहे। इसी दृष्टि से जनजातीय कला और शिल्प को बाजार उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है। मई 2025 में आयोजित राज्य स्तरीय आदि शिल्पग्राम महोत्सव में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जनजातीय शिल्प, चित्रकला और कलाकारों को प्रदर्शन तथा बाजार उपलब्ध कराने के लिए मंच देने की बात कही। गोंड चित्रकला के GI टैग का उल्लेख करते हुए उन्होंने जनजातीय कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।


संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में खंडवा जिले के खालवा में जनजातीय कला, संस्कृति, बोली, रहन-सहन, वेशभूषा और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के प्रशिक्षण से जुड़े ट्राइबल हॉस्टल की घोषणा भी उल्लेखनीय है। ऐसी पहलें संस्कृति को केवल अतीत की स्मृति बनाकर रखने के बजाय उसे सीखने, समझने और आगे बढ़ाने की जीवंत प्रक्रिया से जोड़ती हैं।


शिक्षा : जनजातीय सशक्तिकरण की आधारशिला

जनजातीय कल्याण का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है—शिक्षा। जनजातीय कार्य विभाग की योजनाओं के तहत आदिवासी विकासखंडों में प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शैक्षणिक संस्थाएं संचालित हैं। आवासीय शैक्षणिक संस्थाओं के माध्यम से ऐसे विद्यार्थियों को भी शिक्षा का बेहतर वातावरण देने का प्रयास किया जा रहा है, जिनके लिए दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों से नियमित आवागमन कठिन है। छात्रवृत्ति, आर्थिक सहायता और अन्य शैक्षणिक प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराने पर भी जोर है।


प्रतियोगी परीक्षाओं से नए अवसरों तक

शिक्षा को केवल विद्यालय और कॉलेज तक सीमित न रखते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा की तैयारियों से जोड़ना भी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। MP Info के अनुसार जनजातीय वर्ग के युवाओं और विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के लिए बजट में 25 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। आकांक्षा योजना के माध्यम से सरकारी भर्ती परीक्षाओं और प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश की तैयारी के लिए ऑफलाइन तथा ऑनलाइन कोचिंग की व्यवस्था को विस्तार दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य जनजातीय युवाओं को प्रतिस्पर्धी अवसरों के लिए समान मंच उपलब्ध कराना है।


विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों पर फोकस

जनजातीय कल्याण की दृष्टि से विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों पर ध्यान देना भी आवश्यक है। मध्यप्रदेश में बैगा, भारिया और सहरिया को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में शामिल किया गया है। इनके लिए संचालित आहार अनुदान योजना का उद्देश्य पोषण संबंधी सहायता उपलब्ध कराना है। राज्य के योजना पोर्टल के अनुसार इस योजना के पात्र लाभार्थियों में मध्यप्रदेश के मूल निवासी बैगा, भारिया और सहरिया समुदाय शामिल हैं।


इसी क्रम में प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान—PM JANMAN विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की बस्तियों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य ऐसे समुदायों में आवास, सड़क, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका जैसी बुनियादी जरूरतों से जुड़े अंतर को कम करना है। प्रदेश में इस अभियान को जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास से जोड़कर आगे बढ़ाया जा रहा है।


मंत्रि-परिषद के फैसलों में जनजातीय क्षेत्रों को प्राथमिकता

मंत्रि-परिषद के निर्णयों में भी जनजातीय क्षेत्रों की विशिष्ट जरूरतों को महत्व मिला है। PM-JANMAN के अंतर्गत विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों वाले 23 जिलों में 194 नए आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना और संचालन को मंजूरी दी गई है। इनके संचालन के लिए 15.70 करोड़ रुपये के व्यय भार को स्वीकृति दी गई। जनजातीय परिवेश को ध्यान में रखते हुए इन केंद्रों के भवनों के निर्माण का प्रावधान भी किया गया है। यह पहल बच्चों और माताओं तक पोषण तथा प्रारंभिक बाल विकास सेवाओं की पहुंच मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।


अधिकार, ग्रामसभा और स्थानीय भागीदारी

जनजातीय विकास का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—अधिकार और स्थानीय भागीदारी। ग्रामसभा को सशक्त किए बिना जनजातीय क्षेत्रों का टिकाऊ विकास संभव नहीं है। इसी कारण PESA कानून और वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन पर सरकार का जोर महत्वपूर्ण है। जनवरी 2025 की MP Info रिपोर्ट में पात्र हितग्राहियों को धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान की योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ दिलाने तथा PESA से जुड़े दावों के समयबद्ध निराकरण पर जोर दिया गया।


बुनियादी सुविधाओं से मजबूत होती जनजातीय बस्तियां

बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के लिए भी जनजातीय बहुल बस्तियों को विशेष रूप से योजनाओं से जोड़ा गया है। मध्यप्रदेश शासन की अनुसूचित जनजाति बस्ती विकास एवं विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत सड़क, नाली, पुलिया, विद्युतीकरण, पेयजल, सामुदायिक भवन तथा शैक्षणिक और आवासीय संस्थाओं जैसी सुविधाओं के विस्तार का प्रावधान है। विकास की यह बुनियादी संरचना जनजातीय परिवारों के जीवन स्तर में सुधार और उन्हें व्यापक आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए जरूरी है।


श्री अन्न से आजीविका और पोषण तक

जनजातीय कल्याण को आजीविका से जोड़ने के लिए कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी ध्यान दिया गया है। जनजातीय बहुल क्षेत्रों में रानी दुर्गावती श्री अन्न प्रोत्साहन योजना के माध्यम से मोटे अनाज यानी श्री अन्न की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके साथ मृदा स्वास्थ्य, फसल बीमा, सिंचाई, कृषि यंत्रीकरण और किसानों को बेहतर बाजार एवं मूल्य उपलब्ध कराने से जुड़ी पहलों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इस तरह कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि जनजातीय परिवारों की आय और पोषण सुरक्षा से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।


वनोपज और पारंपरिक ज्ञान को आर्थिक ताकत बनाना

जनजातीय अर्थव्यवस्था में वन और वनोपज की भूमिका को देखते हुए पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों को आजीविका के अवसरों में बदलने की दिशा भी महत्वपूर्ण है। जनजातीय चित्रकला, हस्तशिल्प, पारंपरिक उत्पाद और वनोपज को बाजार से जोड़ने की कोशिश एक साथ दो उद्देश्यों को साध सकती है—सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और स्थानीय परिवारों की आय में वृद्धि। तेंदूपत्ता जैसे वन उत्पादों के बेहतर स्थानीय उपयोग और जनजातीय समुदायों को अधिक लाभ दिलाने के लिए रणनीति बनाने पर भी मुख्यमंत्री ने जोर दिया है।


गौरव, संरक्षण और कल्याण—तीन स्तंभ

इस पूरी दिशा को देखें तो डॉ. मोहन यादव सरकार की जनजातीय नीति के तीन प्रमुख आयाम उभरकर सामने आते हैं—गौरव, संरक्षण और कल्याण। गौरव का अर्थ है जनजातीय नायकों, इतिहास और बलिदान को सम्मान देना। संरक्षण का अर्थ है भाषा, कला, संस्कृति, परंपराओं और पारंपरिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना। वहीं कल्याण का अर्थ है शिक्षा, छात्रवृत्ति, पोषण, स्वास्थ्य, आवास, सड़क, बिजली, आजीविका और अधिकारों के माध्यम से जनजातीय परिवारों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराना।


अपनी जड़ों पर गर्व, भविष्य के लिए नए अवसर

जनजातीय समाज का वास्तविक सशक्तिकरण तभी संभव है, जब विकास उसकी पहचान और परंपराओं के सम्मान के साथ आगे बढ़े। मध्यप्रदेश में वर्तमान प्रयासों की दिशा इसी व्यापक सोच की ओर संकेत करती है—जहां टंट्या मामा जैसे नायकों की स्मृति को विश्वविद्यालय से जोड़ा जा रहा है, ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण किया जा रहा है, जनजातीय विद्यार्थियों के लिए शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के अवसर बढ़ाए जा रहे हैं, PVTG समुदायों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं और स्थानीय कला एवं वनोपज को आजीविका से जोड़ने की कोशिश हो रही है।


यही समन्वय जनजातीय गौरव को जनकल्याण से जोड़ने वाली विकास दृष्टि को आकार देता है। जब इतिहास का सम्मान वर्तमान की जरूरतों से जुड़ता है और संस्कृति का संरक्षण भविष्य के अवसरों का आधार बनता है, तभी विकास अधिक समावेशी और टिकाऊ बनता है। मध्यप्रदेश के जनजातीय समाज के लिए यही संतुलन—अपनी जड़ों पर गर्व और भविष्य के लिए नए अवसर—सशक्तिकरण की सबसे महत्वपूर्ण दिशा बन सकता है।

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