
मध्य प्रदेश में गिद्धों की आबादी में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। वन विभाग के हालिया सर्वे के अनुसार प्रदेश में गिद्धों की संख्या 14 हजार से अधिक हो गई है। तीन दिनों तक चले इस सर्वे के बाद यह आंकड़ा सामने आया है, हालांकि अंतिम रिपोर्ट आने के बाद संख्या और बढ़ सकती है। पिछली गणना में प्रदेश में 12,981 गिद्ध दर्ज किए गए थे। नए आंकड़ों के मुताबिक इस बार इनकी संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
सर्वे में 7 प्रजातियों के गिद्ध मिले
20 से 22 फरवरी के बीच किए गए सर्वे में प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में गिद्धों की करीब 7 प्रजातियां पाई गईं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
भारतीय गिद्ध
सिनेरियस गिद्ध
मिस्र गिद्ध (व्हाइट स्कैवेंजेर)
हिमालयन ग्रिफॉन
लाल सिर वाले गिद्ध
सफेद पीठ वाले गिद्ध
पन्ना क्षेत्र में लाल सिर वाले गिद्ध देखे गए, जबकि भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में सफेद पीठ वाले गिद्धों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है।
पिछले 10 साल में दोगुनी हुई आबादी
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में गिद्धों की आबादी पिछले एक दशक में लगभग दोगुनी हो गई है।
गणना के अनुसार:
2019: 8,397 गिद्ध
2021: 9,446 गिद्ध
2024: 10,845 गिद्ध
2025: 12,981 गिद्ध
2026 (अनुमान): 14,000 से अधिक
इस तरह प्रदेश में गिद्ध संरक्षण के प्रयासों का सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है।
इंदौर और भोपाल में भी बढ़ी संख्या
इंदौर वन मंडल में भी गिद्धों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
पिछली गणना: 86 गिद्ध
इस बार: 156 गिद्ध
भोपाल के वन विहार स्थित गिद्ध संरक्षण केंद्र में भी सफेद पीठ वाले गिद्धों की संख्या बढ़ी है, जिससे संरक्षण कार्यक्रमों की सफलता का संकेत मिलता है।
हलाली डैम क्षेत्र में छोड़े गए GPS ट्रैकर वाले गिद्ध
हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रायसेन जिले के हलाली डैम क्षेत्र में लुप्तप्राय प्रजाति के 5 गिद्धों को प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा। इन गिद्धों पर आधुनिक GPS ट्रैकर लगाए गए हैं ताकि वन विभाग उनकी गतिविधियों और मूवमेंट की निगरानी कर सके।
कभी विलुप्त होने की कगार पर थे गिद्ध
एक समय ऐसा भी था जब गिद्धों की संख्या तेजी से घट रही थी और ये पक्षी विलुप्त होने के खतरे तक पहुंच गए थे। विशेषज्ञों के अनुसार गिद्ध स्वभाव से संवेदनशील पक्षी होते हैं और जल्दी अपना साथी नहीं चुनते। इसलिए इनकी आबादी तेजी से बढ़ना आसान नहीं होता।
डायक्लोफेनाक दवा बनी थी बड़ी वजह
गिद्धों की संख्या घटने की सबसे बड़ी वजह पशुओं में इस्तेमाल होने वाली डायक्लोफेनाक दवा मानी गई थी। जब दवा खाए पशुओं की मौत होती थी और गिद्ध उनका मांस खाते थे, तो दवा के प्रभाव से उनकी भी मौत हो जाती थी। इसके बाद इस दवा पर प्रतिबंध लगाया गया, जिससे गिद्धों की आबादी धीरे-धीरे फिर बढ़ने लगी।
गिद्धों का प्रजनन भी धीमा
गिद्ध साल में केवल एक बार अंडा देते हैं। अंडे का आकार मुर्गी के अंडे से लगभग तीन गुना बड़ा होता है, 55 दिन में अंडे से बच्चा निकलता है लगभग 4 महीने तक बच्चा घोंसले में रहता है, अंडों से बच्चे निकलने का सफलता दर करीब 50% माना जाता है, इसी वजह से इनकी आबादी बढ़ने में लंबा समय लगता है।
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