
भोपाल। मध्य प्रदेश के 11 जिलों में कम बारिश का असर अब जलस्रोतों और खेती पर दिखाई देने लगा है। इंदौर में पेयजल प्रबंधन के लिए 50 करोड़ रुपये की मांग की गई है, जबकि उज्जैन में उपलब्ध पानी से केवल 70 दिन तक आपूर्ति हो पाने का अनुमान है।
धार में गिरते भूजल स्तर और सूखते तालाबों ने आने वाले महीनों की चिंता बढ़ा दी है। कम पानी के कारण किसान फसलों का रकबा घटाने और कम सिंचाई वाली फसलें बोने की तैयारी कर रहे हैं।
इंदौर में 18 साल बाद बड़े जलसंकट की आशंका
इंदौर में इस बार करीब 23 इंच बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत लगभग 37 इंच है। शहर में रोजाना करीब 800 एमएलडी पानी की जरूरत होती है। बारिश की कमी के कारण जलस्रोतों में पर्याप्त पानी नहीं बचा है।
जल प्रबंधन की तैयारियों के तहत महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से 50 करोड़ रुपये का पैकेज मांगा है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और तुलसी सिलावट भी इस विषय पर बैठकें कर चुके हैं।
शहर के कई तालाबों में पानी तेजी से घटा है। जलस्तर की स्थिति इस प्रकार है:
छोला बिलावली और लिंबोदी तालाब: एक फीट से भी कम पानी।
पिपलियापाला तालाब: 22 फीट की क्षमता के मुकाबले 7.6 फीट पानी।
यशवंत सागर, बड़ा बिलावली, बड़ा सिरपुर और छोटा सिरपुर: पानी की कमी।
इन हालात के चलते इंदौर में करीब 18 साल बाद गंभीर जलसंकट की आशंका जताई जा रही है।
उज्जैन में 22 दिसंबर तक के पानी का अनुमान
उज्जैन की पेयजल व्यवस्था गंभीर डैम पर निर्भर है, लेकिन कम बारिश के कारण इस बार जलाशय पूरी क्षमता तक नहीं भर सका। शहर में औसतन 35 इंच बारिश के मुकाबले इस वर्ष करीब 27 इंच यानी 682 मिमी पानी गिरा।
गंभीर डैम की कुल क्षमता 2,250 एमसीएफटी है, जबकि इस बार इसका जलस्तर केवल 636 एमसीएफटी तक पहुंचा। इसमें से 100 एमसीएफटी डेड स्टोरेज घटाने के बाद उपलब्ध पानी से करीब 70 दिन तक आपूर्ति का अनुमान है।
इस हिसाब से जलापूर्ति के लिए उपलब्ध पानी 22 दिसंबर तक चलने की संभावना है। उज्जैन नगर निगम के अपर आयुक्त पवन कुमार सिंह के अनुसार, जून में भी गंभीर डैम में पानी कम होने पर नर्मदा पाइपलाइन से पानी लेकर रोजाना सप्लाई की गई थी।
उज्जैन में भूजल 200 फीट तक पहुंचा
शहर में भूजल स्तर गिरकर करीब 200 फीट तक पहुंच गया है। इससे घरेलू पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ रही है।
पेयजल की चुनौती का असर उज्जैन में होने वाली सिंहस्थ की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। पानी की कमी को देखते हुए नर्मदा से अतिरिक्त पानी लेने की कवायद महत्वपूर्ण हो गई है।
धार में 49.45% कम बारिश, बोरिंग से भी घटा पानी
धार जिले में इस बार 25.84 इंच बारिश हुई, जबकि वर्ष 2025 में 51.13 इंच पानी दर्ज किया गया था। सामान्य से करीब 10 इंच कम बारिश के कारण खेतों और पेयजल स्रोतों पर दबाव बढ़ा है।
कई बोरिंग बंद हो चुके हैं और कुछ में रुक-रुककर पानी निकल रहा है। इससे सिंचाई प्रभावित हो रही है और फसल उत्पादन घटने की आशंका है। किसान जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
धार शहर की करीब डेढ़ लाख आबादी की पेयजल जरूरतें पूरी करने वाले तालाबों की स्थिति भी चिंताजनक है।
दिलावरा, नटनागरा, नयापुरा और सीतापाट तालाब: लगभग 25–30% पानी शेष।
मुंज तालाब: करीब 40% भरा हुआ।
आने वाले महीनों में तालाबों और बोरिंग का जलस्तर और गिरने पर टैंकरों से पानी मंगाने की जरूरत पड़ सकती है, जिससे लोगों का खर्च बढ़ने की आशंका है।
कम पानी के कारण फसलों की बुवाई में बदलाव
बारिश की कमी का असर मालवा क्षेत्र की खेती पर भी पड़ने लगा है। भारतीय किसान संघ से जुड़े किसानों के अनुसार, इस बार गेहूं का रकबा 75% तक घट सकता है। मालवा में लहसुन और प्याज की खेती का क्षेत्र भी 70% तक कम होने की आशंका है।
किसानों का मानना है कि उत्पादन में गिरावट से खाद्यान्न की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है और महंगाई बढ़ सकती है।
पर्याप्त पानी मिलने पर किसान गेहूं, लहसुन, प्याज और मटर जैसी फसलें उगाते हैं। इस बार पानी की कमी को देखते हुए कई किसान कम सिंचाई में तैयार होने वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
इनमें चना, तिवड़ा, तुकमरी यानी तुकमारिया और रायड़ा जैसी फसलें शामिल हैं।
मध्य प्रदेश में बारिश का रिकॉर्ड क्या कहता है?
राज्य में वर्षा के पिछले आंकड़े इस बार की स्थिति को समझने में मदद करते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2015 के बाद वर्ष 2026 में फिर सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है।
2017: 29.9 इंच
2018: 34.3 इंच
2019: 53 इंच
2022: 46 इंच
2025: 45.2 इंच
इस बार बारिश का वितरण असमान रहा और कुल बारिश सामान्य से 4% कम दर्ज की गई। इसका असर नदियों, बांधों, तालाबों और भूजल स्रोतों पर पड़ रहा है।
प्रभावित जिलों के सामने आगे की चुनौती
कम बारिश वाले 11 जिलों में जलस्रोतों की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ी है। प्रभावित जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग भी उठ रही है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार जलसंकट से निपटने के लिए अब तक कोई ठोस योजना तैयार नहीं हुई है।
इंदौर में अतिरिक्त बजट की मांग, उज्जैन में नर्मदा से पानी लेने की जरूरत और धार में खेती के बदलते पैटर्न से साफ है कि कम बारिश का असर सिर्फ पेयजल तक सीमित नहीं है। आने वाले महीनों में कृषि उत्पादन और घरेलू जलापूर्ति दोनों बड़ी चुनौतियां बन सकते हैं।
पाठकों की राय (0)
इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

