
भोपाल। निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल्स के लिए सरकारी अस्पतालों की तुलना में कई गुना अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। एक पड़ताल में IV कैन्यूला की सरकारी सप्लाई दर 4.18 रुपये होने के मुकाबले निजी अस्पतालों में इसकी कीमत 160 से 180 रुपये तक सामने आई है।
दवाओं की कीमतों पर नियामकीय नियंत्रण के बीच सिरिंज, कैथेटर, IV सेट और IV कैन्यूला जैसे जरूरी चिकित्सा उत्पादों की एमआरपी और मरीजों से वसूली जाने वाली रकम पर सवाल उठ रहे हैं। जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने कीमतों की स्वतंत्र जांच और मार्जिन पर सीमा तय करने की मांग की है।
4 रुपये का मेडिकल सामान 180 रुपये तक में क्यों?
सरकारी अस्पतालों के लिए मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन द्वारा तय खरीद दरों को आधार बनाकर की गई पड़ताल में कीमतों का बड़ा अंतर सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियां सरकारी अस्पतालों को IV कैन्यूला 4.18 रुपये में उपलब्ध कराती हैं।
निजी अस्पतालों में इसी उत्पाद के लिए मरीजों से 160 से 180 रुपये तक लिए जा रहे हैं। इस अंतर ने मेडिकल कंज्यूमेबल्स की वास्तविक लागत, कंपनियों के मुनाफे और अस्पतालों में तय बिक्री कीमतों को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
अस्पताल में भर्ती होते ही शुरू हो जाता है अतिरिक्त खर्च
मरीज को भर्ती किए जाने के बाद इलाज के लिए कई तरह के डिस्पोजेबल मेडिकल उत्पादों की जरूरत पड़ती है। इनमें IV सेट, IV कैन्यूला, डिस्पोजेबल सिरिंज, कैथेटर और सैनिटाइजर शामिल हैं।
इन उत्पादों की एमआरपी पर मरीजों को सामान दिया जाता है या करीब 5 से 10 प्रतिशत की छूट मिलती है। नतीजतन, मरीज को कई बार इनकी खरीद पर वास्तविक खरीद दर से काफी ज्यादा भुगतान करना पड़ता है।
कंपनी से डिस्ट्रीब्यूटर तक कैसे बढ़ती है कीमत?
मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों में अंतर के पीछे वितरण व्यवस्था की भूमिका भी बताई गई है। कंपनियां उत्पादों पर एमआरपी अंकित करती हैं और डिस्ट्रीब्यूटर को सामान उपलब्ध कराते समय अपना मुनाफा जोड़ती हैं।
डिस्ट्रीब्यूटर भी सामान बेचते समय करीब 40 से 50 प्रतिशत तक मार्जिन रख सकता है। इसके बाद अस्पताल में मरीज को वही उत्पाद एमआरपी पर या मामूली छूट के साथ मिलता है, जिससे उसकी जेब पर बोझ बढ़ता है।
ब्रांड बदलने पर 50 से 100 प्रतिशत तक अंतर
पड़ताल में मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों में कंपनी के अनुसार भी बड़ा अंतर होने की बात सामने आई। एक ही तरह के उत्पाद के दाम अलग-अलग कंपनियों के बीच 50 से 100 प्रतिशत तक बदल सकते हैं।
थोक में खरीदे जाने वाले सामान और मरीज के इस्तेमाल के लिए अलग से खरीदे जाने वाले उत्पादों की कीमतों में भी कई गुना अंतर बताया गया है। इससे खरीद प्रक्रिया और बिक्री मूल्य की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।
सरकारी खरीद में भी कंपनियों का मुनाफा शामिल
जानकारों के अनुसार, मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन फार्मा कंपनियों से न्यूनतम दरों पर अनुबंध करता है। इसके बावजूद इन दरों में कंपनियों का मुनाफा शामिल रहता है।
इस संदर्भ में सवाल उठता है कि जब कंपनियां सरकारी अस्पतालों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर सामान उपलब्ध करा सकती हैं, तो निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए उसी तरह के उत्पाद इतने महंगे क्यों पड़ते हैं।
NPPA से मार्जिन और एमआरपी की समीक्षा की मांग
जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया के अमूल्य निधि ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) से मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर मार्जिन की सीमा तय करने और उनकी एमआरपी कम करने की मांग की है।
उन्होंने कीमतों की स्वतंत्र जांच कराने की जरूरत भी बताई, ताकि उत्पादों की वास्तविक लागत और मरीजों से वसूली जाने वाली रकम के बीच अंतर का आकलन किया जा सके।
कीमतों पर नियंत्रण राज्य सरकार के अधिकार में नहीं: FDA
मध्य प्रदेश FDA के कंट्रोलर मनोज पुष्प ने कहा कि दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतें तय करने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं है। उनके मुताबिक, इस तरह की शिकायतें नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को भेजी जाती हैं।
उनके बयान के अनुसार, कीमतों से जुड़ी शिकायतों के निस्तारण के लिए संबंधित केंद्रीय प्राधिकरण को जानकारी भेजने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
पाठकों की राय (0)
इस खबर पर अभी कोई कमेंट नहीं है। पहले आप लिखें!

