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MP में 11 जिले सूखे की चपेट में, आलीराजपुर में 52% कम बारिश; इंदौर-उज्जैन समेत 9 जिले संकट में

06 अक्टू, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
MP में 11 जिले सूखे की चपेट में, आलीराजपुर में 52% कम बारिश; इंदौर-उज्जैन समेत 9 जिले संकट में
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

भोपाल। मध्य प्रदेश में इस मानसून सीजन बारिश की कमी अब खेती और जल उपलब्धता के लिए चिंता बढ़ा रही है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 11 जिले सूखे की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं, जिनमें इंदौर और उज्जैन भी शामिल हैं।


सबसे गंभीर स्थिति आलीराजपुर में है, जहां सामान्य से 52% कम बारिश दर्ज हुई है। कम पानी का असर खरीफ फसलों के साथ आने वाले रबी सीजन की सिंचाई और पेयजल व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।


9 जिले सूखाग्रस्त पैमाने के दायरे में

मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक के अनुसार सामान्य से 26% कम बारिश होने पर जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की स्थिति बन सकती है। वर्तमान आंकड़ों में नौ जिले इस पैमाने के दायरे में बताए जा रहे हैं।


इनमें शामिल हैं:

- इंदौर

- उज्जैन

- बैतूल

- हरदा

- नर्मदापुरम

- रतलाम

- झाबुआ

- धार

- आलीराजपुर


शाजापुर और पांढुर्णा की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली है। दोनों जिलों के बीच बारिश की कमी का अंतर केवल 3% है।


पांढुर्णा में किसानों ने CM का काफिला रोका

पांढुर्णा में 4 अक्टूबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दौरे के दौरान किसानों ने उनका काफिला रोक दिया था। किसानों के हाथों में सूखी और मुरझाई फसलें थीं। किसानों ने जिले को तत्काल सूखाग्रस्त घोषित करने के साथ कृषि कर्ज माफ करने की मांग रखी। मुख्यमंत्री वाहन से नीचे उतरे और किसानों से उनकी समस्याएं सुनीं।


सोयाबीन, मूंग और मक्का पर असर

कम बारिश का असर कई खरीफ फसलों पर दिखाई दे रहा है। सोयाबीन, मूंग और मक्का समेत दूसरी फसलों को नुकसान की जानकारी सामने आई है। बारिश की कमी केवल मौजूदा फसल तक सीमित नहीं है। आने वाले रबी सीजन में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है।


मालवा-निमाड़ के साथ नर्मदापुरम में भी कमी

शैलेंद्र कुमार नायक के मुताबिक इस बार कम बारिश का असर मालवा-निमाड़ तक सीमित नहीं है। नर्मदापुरम संभाग में भी बारिश सामान्य से कम रही है।


उनका सुझाव है कि कम बारिश वाले क्षेत्रों में सरकार को स्थानीय स्तर पर तैयारी शुरू करनी चाहिए। पानी की उपलब्धता और संभावित प्रतिबंधों पर अभी से निगरानी रखने की जरूरत है, क्योंकि ठंड के बाद तापमान बढ़ने पर जल संकट अधिक गंभीर हो सकता है।


10 साल में तीसरी बार ऐसे हालात

प्रदेश में वर्ष 2015 के बाद 2026 में एक बार फिर सूखे जैसी स्थिति सामने आई है। बारिश के आंकड़ों में अलग-अलग वर्षों में बड़ा अंतर देखा गया है।

- 2017: 29.9 इंच

- 2018: 34.3 इंच

- 2019: 53 इंच

- 2022: 46 इंच

- 2025: 45.2 इंच


इस साल बारिश का वितरण भी समान नहीं रहा और प्रदेश में सामान्य से करीब 4% कम बारिश दर्ज हुई है।


गिरदावरी के बाद स्पष्ट होगी वास्तविक तस्वीर

सूखे की स्थिति तय करने के लिए जिलों की गिरदावरी रिपोर्ट अहम होगी। फसल खराबी और अकाल जैसी परिस्थितियों का आकलन कलेक्टरों के माध्यम से राजस्व विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग तक पहुंचाया जाएगा।


अभी सर्वे की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। सिंचाई और पेयजल की स्थिति को देखते हुए जल्द ही मैदानी स्तर पर टीमें भेजे जाने की संभावना बताई गई है। इसके बाद सरकार सूखा प्रभावित जिलों की वास्तविक संख्या सामने रखेगी।


पिछले साल 51 जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश

2025 में प्रदेश में मानसून करीब 3 महीने 28 दिन सक्रिय रहा था। उस साल 51 जिलों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज हुई थी और भोपाल व ग्वालियर समेत 30 जिले बहुत ज्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में रहे थे।


गुना में पूरे मानसून सीजन में 65.7 इंच बारिश दर्ज हुई थी। श्योपुर में सामान्य के मुकाबले 216.3% बारिश हुई, जबकि शाजापुर में 28.9 इंच यानी 81.1% बारिश दर्ज की गई थी।


इस साल तस्वीर बदल गई है। अब तक केवल 25 जिलों में सामान्य से ज्यादा पानी गिरा है, जबकि 30 जिलों में बारिश का आंकड़ा सामान्य से नीचे है। कम बारिश वाले जिलों में शाजापुर 11वें स्थान पर है।


मौसम विभाग का अनुमान रहा सही

मौसम विभाग ने इस मानसून सीजन में प्रदेश में सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया था। विभाग ने करीब 90 से 95% बारिश होने की संभावना जताई थी। सीजन के आंकड़ों में भी बारिश सामान्य से नीचे रही, जिससे पहले जताए गए अनुमान की पुष्टि हुई है।


सूखा घोषित करने के लिए केवल बारिश का आंकड़ा काफी नहीं

किसी जिले में सामान्य से कम बारिश होना अपने आप में सूखा घोषित करने का आधार नहीं है। प्रशासन को कई मानकों की जांच करनी होती है।


इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

- बोवनी का क्षेत्रफल

- फसलों की वास्तविक स्थिति

- मिट्टी में नमी

- भूजल स्तर

- जलाशयों में पानी की उपलब्धता

- प्रभावित क्षेत्र का फील्ड सर्वे

- ग्राउंड वेरिफिकेशन


जिला प्रशासन इन सभी आंकड़ों को मिलाकर रिपोर्ट शासन को भेजता है। शासन स्तर पर रिपोर्ट और संबंधित संकेतकों की समीक्षा के बाद सूखा घोषित करने का निर्णय लिया जाता है। इसके बाद प्रभावित जिले, तहसील या क्षेत्र के लिए अधिसूचना जारी की जाती है।


खरीफ सूखे की घोषणा के लिए 31 अक्टूबर तक का प्रावधान है।

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