
भोपाल। 29 सितंबर 2026 के पंचायत और नगरीय निकाय उपचुनाव में राज्य निर्वाचन आयोग ने कई डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल किया। IEMS, सर्वे एप, प्रेक्षा एप और EVM रेंडमाइजेशन सॉफ्टवेयर के जरिए चुनावी प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों को सिस्टम से जोड़ने की कोशिश की गई।
इस प्रयोग का दायरा सिर्फ मतदान तक सीमित नहीं रहा। मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन, चुनाव प्रक्रिया शुरू करने, मतदान केंद्रों की सुविधाओं की जांच, प्रेक्षकों की रिपोर्ट और EVM प्रबंधन तक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया गया।
29 सितंबर को इतने पदों पर होना था उपचुनाव
मध्य प्रदेश में 29 सितंबर 2026 को पंचायत और नगरीय निकाय उपचुनाव निर्धारित थे। इनमें अलग-अलग स्तरों के कुल हजारों पद शामिल थे।
3 नगरीय निकाय अध्यक्ष
26 पार्षद
7 जिला पंचायत सदस्य
28 जनपद पंचायत सदस्य
110 सरपंच
4090 पंच
इसी चुनाव प्रक्रिया में आयोग के नए और अपग्रेड किए गए तकनीकी सिस्टम का मैदानी स्तर पर इस्तेमाल किया गया।
IEMS में अब अगले चरण को सिस्टम से जोड़ने की तैयारी
मध्य प्रदेश में Integrated Election Management System यानी IEMS का इस्तेमाल पहले से होता रहा है। आयोग के रिकॉर्ड में इसका उपयोग 2016 से मिलता है। वर्ष 2018 में नगरीय निकाय चुनावों की मतगणना और परिणाम संबंधी प्रक्रिया के लिए भी IEMS के इस्तेमाल के निर्देश जारी किए गए थे।
इसके बाद 2020-22 के दौरान नामांकन, चुनाव संबंधी सूचना, मतगणना और परिणाम जैसे चरणों को इससे जोड़ा गया। अब इसका एडवांस वर्जन तैयार किया गया है।
नए सिस्टम में मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन और चुनाव की अधिसूचना के बाद आगे की प्रक्रिया को स्वचालित तरीके से आगे बढ़ाने की दिशा में काम किया गया है। इसका उद्देश्य जिला स्तर से बार-बार डेटा भेजने और मैनुअल मॉनिटरिंग की जरूरत कम करना है।
बूथ की सुविधाओं का मोबाइल से होगा सत्यापन
पोलिंग स्टेशन सर्वे एप के जरिए मतदान केंद्रों की जमीनी स्थिति की जानकारी जुटाई गई। इसमें मतदाताओं के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं को निर्धारित मानकों पर जांचा जाता है।
सर्वे में इन बिंदुओं को शामिल किया गया—
रैंप की उपलब्धता
दिव्यांग मतदाताओं के लिए पहुंच
शौचालय
पेयजल
भवन की स्थिति
मतदान केंद्र तक पहुंचने वाला रास्ता
किसी सुविधा में कमी सामने आने पर उसी आधार पर सुधार की कार्रवाई और उसकी निगरानी की जा सकती है। इस तरह बूथ संबंधी जानकारी मोबाइल सर्वे के रूप में सिस्टम में दर्ज होती है।
प्रेक्षकों की रिपोर्ट सीधे IEMS बैकएंड तक
राज्य निर्वाचन आयोग ने 'प्रेक्षा' एप भी तैयार किया है। यह Election Observer और Roll Observer के लिए बनाया गया है और दोनों के लिए अलग-अलग मॉड्यूल उपलब्ध हैं।
एप में चुनाव संबंधी रिपोर्ट, रोल ऑब्जर्वर रिपोर्ट, प्रशिक्षण सामग्री, दस्तावेज, उपस्थिति तथा अन्य रिपोर्टिंग से जुड़ी सुविधाएं शामिल हैं। रिपोर्ट को सीधे IEMS बैकएंड में जमा करने की व्यवस्था की गई है।
इस एप का पहला संस्करण 2 सितंबर 2026 को अपडेट हुआ था। इससे मैदानी स्तर पर तैयार रिपोर्ट को चुनाव प्रबंधन सिस्टम तक पहुंचाने की प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम मिला है।
EVM दूसरे राज्यों तक पहुंचीं तो बढ़ी डेटा मैनेजमेंट की जरूरत
मध्य प्रदेश की EVM Sharing Policy के तहत राज्य में उपलब्ध अतिरिक्त EVM दूसरे राज्य निर्वाचन आयोगों को स्थानीय निकाय चुनावों के लिए किराए पर देने की व्यवस्था बनाई गई। इससे मशीनों के अंतरराज्यीय इस्तेमाल के साथ उनके डेटा प्रबंधन की जरूरत भी बढ़ी।
एक राज्य की EVM दूसरे राज्य में पहुंचने पर मशीन की पहचान, उपलब्धता, वापसी और फिर से रेंडमाइजेशन से जुड़ी जानकारी को अलग-अलग डेटाबेस के बीच व्यवस्थित रखना जरूरी हो जाता है।
इसी जरूरत के लिए मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग के IT सिस्टम में EVM Randomization Software तैयार किया गया है। इसका इस्तेमाल मशीनों की पहचान और उपलब्धता के डेटा के आधार पर रेंडमाइजेशन की प्रक्रिया को सिस्टम आधारित और ट्रेस करने योग्य बनाने के लिए किया गया है।
रेंडमाइजेशन के लिए पहले से जारी हैं निर्देश
मध्य प्रदेश में EVM के रेंडमाइजेशन और कमीशनिंग को लेकर पहले से दिशा-निर्देश मौजूद हैं। वर्ष 2020 में आगामी पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों के लिए EVM रेंडमाइजेशन तथा कमीशनिंग से संबंधित अलग निर्देश जारी किए गए थे।
नए सॉफ्टवेयर की जरूरत उस व्यवस्था में अंतरराज्यीय स्तर पर EVM के इस्तेमाल के बाद बढ़ी, क्योंकि मशीनों की आवाजाही और उपलब्धता का डेटा भी साथ में संभालना पड़ता है।
2025 में सामने आई EVM Sharing Policy
मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी अतिरिक्त EVM को दूसरे राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए उपलब्ध कराने की नीति तैयार की। 30 जुलाई 2025 को राज्य निर्वाचन आयुक्तों की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में MP ने यह EVM Sharing Policy प्रस्तुत की थी।
इसके तहत—
छत्तीसगढ़ के चुनावों के लिए 3,000 EVM किराए पर दी गईं।
जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के साथ EVM किराये के लिए MOU हुए।
उत्तराखंड और गुजरात के साथ भी MOU किया गया।
सिक्किम की ओर से EVM के लिए आग्रह किया गया।
स्टैंडिंग कमेटी ने MP की EVM Sharing Policy को मान्यता दी और सभी राज्यों में इसे लागू करने पर सहमति बनी। राज्यों से उपलब्ध EVM और मतपेटियों की जानकारी तथा संभावित स्थानीय निकाय चुनावों की तारीखें साझा करने का निर्णय भी लिया गया, ताकि जरूरत के मुताबिक राज्यों के बीच EVM उपलब्ध कराई जा सके।
महाराष्ट्र से राजस्थान और सिक्किम तक पहुंचा मॉडल
EVM Sharing Policy के तहत मध्य प्रदेश ने अन्य राज्यों के स्थानीय निकाय चुनावों के लिए मशीनें उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। 2025 में महाराष्ट्र के लिए बड़ी संख्या में EVM उपलब्ध कराने का समझौता हुआ।
इसके बाद राजस्थान के स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों के लिए भी मध्य प्रदेश से EVM उपलब्ध कराने का समझौता हुआ। सिक्किम के साथ भी EVM उपलब्ध कराने का समझौता किया गया।
इस व्यवस्था के कारण मध्य प्रदेश की EVM राज्य की सीमा से बाहर भी स्थानीय निकाय चुनावों में इस्तेमाल होने लगीं। इसी अंतरराज्यीय इस्तेमाल के साथ मशीनों के रिकॉर्ड, उपलब्धता और दोबारा रेंडमाइजेशन को संभालने के लिए तकनीकी सिस्टम की जरूरत बढ़ी।
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