
भोपाल। मध्य प्रदेश में इस साल गेहूं की जबरदस्त पैदावार ने सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। लेकिन राहत की बात ये है कि सरकार ने साफ कहा है—किसानों का एक भी दाना बिना खरीदे नहीं छोड़ा जाएगा।
बंपर उत्पादन ने बढ़ाई सरकार की चुनौती
इस साल प्रदेश में गेहूं का उत्पादन पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुना बताया जा रहा है। यही वजह है कि मौजूदा 78 लाख मीट्रिक टन का खरीद लक्ष्य कम पड़ता नजर आ रहा है। सरकार अब केंद्र से लगातार संपर्क में है ताकि कोटा बढ़ाया जा सके और किसानों को पूरा लाभ मिले। लेकिन क्या केंद्र से मंजूरी मिलेगी? यही आगे की दिशा तय करेगा।
वैश्विक हालात का सीधा असर
दुनियाभर की परिस्थितियां भी इस बार बड़ी भूमिका निभा रही हैं। गेहूं का निर्यात लगभग ठप है, जिससे घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ गया है। वहीं, पश्चिम एशिया में तनाव के चलते जूट की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। ऐसे में सरकार ने पॉली बैग्स (PP बैग) का विकल्प अपनाया है ताकि खरीदी प्रक्रिया रुके नहीं। अब सवाल ये है कि क्या ये व्यवस्था लंबे समय तक टिकेगी?
छोटे किसानों को पहली प्राथमिकता
खरीदी को लेकर इस बार रणनीति भी बदली गई है। किसान संगठनों से चर्चा के बाद तय हुआ है कि सबसे पहले छोटे किसानों की फसल खरीदी जाएगी। इसके बाद मध्यम और फिर बड़े किसानों की बारी आएगी। सरकार का दावा है कि इससे छोटे किसानों को तुरंत राहत मिलेगी। लेकिन बड़े किसानों की प्रतिक्रिया क्या होगी, इस पर नजर बनी हुई है।
MSP और बोनस से किसानों को राहत
इस साल गेहूं का समर्थन मूल्य ₹2585 प्रति क्विंटल तय किया गया है। इसके साथ ₹40 बोनस जोड़कर कुल कीमत ₹2625 प्रति क्विंटल दी जा रही है। सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले 3 वर्षों में ₹2700 प्रति क्विंटल का वादा पूरा किया जाएगा। क्या यह वादा समय पर पूरा होगा, यह किसानों के लिए अहम रहेगा।
गोदाम भरे, फिर भी खरीदी जारी
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पिछले साल का गेहूं अभी भी गोदामों में बड़ी मात्रा में मौजूद है। भंडारण की स्थिति पहले से ही दबाव में है। इसके बावजूद सरकार ने भरोसा दिलाया है कि खरीदी प्रक्रिया पर इसका असर नहीं पड़ेगा। लेकिन सवाल यही है—क्या सिस्टम इतना दबाव झेल पाएगा?
आगे क्या? किसानों की नजर फैसलों पर
राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि हर किसान की उपज खरीदी जाएगी। लेकिन असली परीक्षा अब सिस्टम की है—भंडारण, परिवहन और भुगतान, तीनों मोर्चों पर। अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्र से कोटा बढ़ता है या नहीं और सरकार अपने वादों पर कितनी तेजी से अमल करती है।
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