
भोपाल। मध्यप्रदेश के चार प्रमुख शहरों में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों का मामला गंभीर रूप ले चुका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन जमीनों की कुल कीमत 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक है और भोपाल में सबसे ज्यादा अतिक्रमण होने की बात सामने आई है।
धार्मिक ढांचों के नाम पर जमीनों का इस्तेमाल, पक्के निर्माण और विशेष आयोजनों के दौरान किराया वसूलने जैसे मामले सामने आए हैं। भोपाल में मुख्य सड़कों के किनारे बने कुछ ढांचों के कारण यातायात प्रभावित होने की भी शिकायत है।
चार बड़े शहरों में सरकारी जमीनों पर सवाल
भोपाल के अलावा इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में भी सरकारी जमीनों पर कब्जों की समस्या बताई गई है। जिला मुख्यालयों और दूसरे शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी बेशकीमती सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण होने का दावा किया गया है।
विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि कुछ स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से जमीनों पर कब्जे कायम हैं। उनके मुताबिक, इन जमीनों से अलग-अलग तरीकों से आर्थिक लाभ उठाया जा रहा है।
धार्मिक ढांचों के नाम पर निर्माण और कमाई
कुछ स्थानों पर धार्मिक ढांचों के आसपास पक्के भवन बनाए जाने की जानकारी दी गई है। इनका संरक्षण करने वाले कुछ लोगों ने ट्रस्ट और समितियां भी गठित कर ली हैं।
आरोपों के मुताबिक, कुछ जगहों पर चंदे के जरिए धन जुटाया जाता है, जबकि कुछ भवनों को विशेष अवसरों पर किराये पर देकर कमाई की जाती है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित जमीनों के रिकॉर्ड और निर्माण की वैधानिक स्थिति की जांच जरूरी है।
भोपाल में सड़क किनारे अतिक्रमण से यातायात प्रभावित
राजधानी भोपाल में बागसेवनिया थाने से अमलतास चौराहे और आगे 11 मिल बायपास तक मुख्य सड़कों के आसपास कई ऐसे स्थानों का जिक्र किया गया है, जहां सरकारी जमीन पर ढांचे बने हुए हैं।
विशेष अवसरों पर कुछ जगह टेंट और तंबू लगाए जाने से सड़क पर यातायात बाधित होने की शिकायत है। स्थिति बिगड़ने पर पुलिस की तैनाती करनी पड़ती है, लेकिन इसके बावजूद सड़क किनारे बने ढांचों को हटाने की कार्रवाई नहीं होने का दावा किया गया है।
अधिकारी कार्रवाई से क्यों बचते हैं?
सेवानिवृत्त सहायक भू-अभिलेख अधिकारी ओपी भट्ट के अनुसार, जमीनों से जुड़े विवादों में स्थानीय अधिकारी टकराव से बचने की कोशिश करते हैं। उन्होंने शासन स्तर पर व्यापक अभियान नहीं चलाए जाने की ओर भी ध्यान दिलाया।
वन एवं राजस्व मामलों के जानकार अनिल गर्ग का कहना है कि जिला मुख्यालयों से लेकर पंचायत स्तर तक सरकारी जमीनों की सुरक्षा को लेकर उदासीनता दिखाई देती है। उनके मुताबिक, बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हो जाने के बाद जमीनों को खाली कराना कठिन हो गया है और इसके लिए शासन स्तर पर विशेष अभियान जरूरी है।
जमीनों को खाली कराने की मांग
सेवानिवृत्त आईएफएस एके बरोनिया, कर्मचारी नेता अनिल बाजपेयी, सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर शशिकांत यादव और विशेषज्ञ राजकुमार सिन्हा व नितिन सक्सेना ने सरकारी जमीनों से कब्जे हटाने की जरूरत पर जोर दिया है।
इनका मानना है कि भविष्य में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए हरियाली और जमीन के सुरक्षित भंडार यानी लैंडबैंक का संरक्षण जरूरी है। सरकारी जमीनों को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए विशेष मुहिम चलाने की मांग भी की गई है।
अवैध ढांचों पर संगठनों के बोर्ड लगाने का मामला
जानकारी के अनुसार, शहर के कुछ स्थानों पर कथित अवैध कब्जों को संरक्षण देने के लिए बड़े संगठनों के बोर्ड लगाए गए हैं। कुछ मामलों में इस संबंध में उच्च स्तर पर शिकायतें भी पहुंची हैं।
ऐसे मामलों को लेकर हाल में दिल्ली में संबंधित संगठनों के पदाधिकारियों को जवाबदेही तय करने की चेतावनी दिए जाने का उल्लेख है। स्पष्ट संदेश दिया गया कि किसी अवैध ढांचे पर संगठन का बोर्ड मिलने पर क्षेत्रीय पदाधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
सरकारी जमीनों की सुरक्षा बड़ी चुनौती
सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण का मुद्दा केवल संपत्ति तक सीमित नहीं है। इससे शहरी यातायात, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर भी सवाल उठते हैं। विशेषज्ञों की मांग है कि सरकारी जमीनों का रिकॉर्ड जांचा जाए, अवैध निर्माणों की पहचान हो और नियमानुसार कार्रवाई के लिए शासन स्तर पर व्यापक अभियान चलाया जाए।
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