
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में आने वाले महीनों में न्यायिक व्यवस्था पर दबाव और बढ़ सकता है। अगले 14 महीनों में 5 न्यायाधीशों के सेवानिवृत्त होने के बाद पहले से लंबित लाखों मामलों के निपटारे की रफ्तार प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
4.90 लाख मामले लंबित, 1.40 लाख केस 10 साल से ज्यादा पुराने
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जबलपुर मुख्य पीठ और इंदौर-ग्वालियर खंडपीठों में वर्तमान में करीब 4.90 लाख मामले लंबित हैं। इनमें लगभग 1.40 लाख मामले ऐसे हैं, जिनका अंतिम फैसला 10 वर्ष से अधिक समय से नहीं हो पाया है।यानी बड़ी संख्या में लोग वर्षों से न्याय मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
53 पद स्वीकृत, लेकिन रिटायरमेंट के बाद रह जाएंगे सिर्फ 35 जज
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 53 पद स्वीकृत हैं। हालांकि इस वर्ष और अगले वर्ष होने वाली सेवानिवृत्तियों के बाद न्यायाधीशों की संख्या घटकर 35 रह जाएगी। ऐसी स्थिति में प्रत्येक जज के हिस्से औसतन 14 हजार से अधिक मामलों का भार आने का अनुमान है।
बार एसोसिएशन ने जताई चिंता
वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि हाईकोर्ट की स्थापना के बाद से अब तक शायद ही कभी सभी स्वीकृत पद पूरी तरह भरे गए हों। उनका मानना है कि जजों की लगातार कमी ही लंबित मामलों के बढ़ने की सबसे बड़ी वजहों में से एक है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है, जो वर्षों से अदालतों में न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
हर साल जितने केस आते हैं, उससे कम का होता है निपटारा
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जबलपुर के पूर्व अध्यक्ष संजय वर्मा के अनुसार, हाईकोर्ट में हर साल औसतन 1,36,190 नए मामले दर्ज होते हैं, जबकि करीब 1,15,644 मामलों का ही निपटारा हो पाता है। यानी हर वर्ष लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
पेंडेंसी खत्म करने के लिए चाहिए 70 जज
बार एसोसिएशन के अनुसार वर्तमान में एक जज औसतन 275 मामलों का निपटारा कर रहे हैं। यदि अगले 5 वर्षों में मौजूदा लंबित मामलों को समाप्त करना है तो हर महीने करीब 19,083 मामलों का निपटारा करना होगा। इसके लिए कम से कम 70 न्यायाधीशों की आवश्यकता बताई गई है।
अगले 14 महीनों में ये जज होंगे रिटायर
वर्ष 2026
- 27 जून – जस्टिस विजय कुमार शुक्ला
- 17 सितंबर – जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह
- 8 नवंबर – जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल
वर्ष 2027
- 14 अगस्त – जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता
- 17 अगस्त – जस्टिस आर.के. वाणी
न्याय मिलने में हो सकती है और देरी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते रिक्त पदों पर नियुक्तियां नहीं हुईं तो लंबित मामलों का बोझ और बढ़ सकता है। इसका असर सीधे आम लोगों पर पड़ेगा, जिन्हें न्याय पाने के लिए पहले से अधिक इंतजार करना पड़ सकता है।
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