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₹10 के आरोप में गई रेलवे की नौकरी, 21 साल बाद हाईकोर्ट ने दिलाया इंसाफ—रेलवे कर्मचारी की लंबी लड़ाई रंग लाई

13 अप्रैल, 20260 व्यूज4 मिनट पढ़ाई
₹10 के आरोप में गई रेलवे की नौकरी, 21 साल बाद हाईकोर्ट ने दिलाया इंसाफ—रेलवे कर्मचारी की लंबी लड़ाई रंग लाई
Sanju Suryawanshi
डेस्क रिपोर्टर
Sanju Suryawanshi

जबलपुर। सिर्फ ₹10 के आरोप में नौकरी गंवाने वाले एक रेलवे कर्मचारी को आखिरकार 21 साल बाद इंसाफ मिला है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इस फैसले ने न सिर्फ एक व्यक्ति की जिंदगी बदली, बल्कि सिस्टम पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।


2002 से शुरू हुआ संघर्ष

यह मामला 4 जनवरी 2002 का है, जब श्रीधाम रेलवे स्टेशन पर टिकट क्लर्क नारायण नायर ड्यूटी पर थे। भीड़भाड़ के बीच विजिलेंस टीम ने आरोप लगाया कि उन्होंने एक यात्री को ₹31 की जगह ₹21 लौटाए, यानी ₹10 कम दिए। नायर लगातार कहते रहे कि भीड़ में गलती हो सकती है—लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई।


बिना सुनवाई के चली गई नौकरी

आरोप लगते ही नायर को अपनी सफाई देने का पूरा मौका तक नहीं मिला। बिना उचित सुनवाई के उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। वर्षों की सेवा एक झटके में खत्म हो गई—और यहीं से उनकी लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई।


निजी पैसे को भी बना दिया सबूत

विजिलेंस टीम ने उनके पास ₹450 अतिरिक्त होने का दावा किया। नायर ने बताया कि यह उनकी निजी रकम थी, जो बीमार पत्नी की दवा के लिए रखी थी। इसके बावजूद इसे उनके खिलाफ इस्तेमाल किया गया—जिससे मामला और उलझ गया।


जांच में ही बदलते रहे आंकड़े

शुरुआत में कहा गया कि उनके पास ₹778 अतिरिक्त मिले, लेकिन बाद में जांच में यह रकम घटकर सिर्फ ₹7 रह गई। इससे साफ हुआ कि जांच में ही गंभीर खामियां थीं—लेकिन तब तक नायर अपनी नौकरी और प्रतिष्ठा दोनों खो चुके थे।


हाईकोर्ट ने खोली जांच की खामियां

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2026 में इस मामले की सुनवाई करते हुए कई अहम बातें सामने रखीं। कोर्ट ने पाया कि ₹10 के आरोप के समर्थन में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था। सिर्फ डिकॉय यात्री का बयान था, जो खुद जांच टीम का हिस्सा था—यानी निष्पक्षता पर सवाल उठे।


जांच अधिकारी ही बना अभियोजन पक्ष

सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि जांच अधिकारी ही अभियोजन की भूमिका निभा रहा था। कोर्ट ने कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। नियमों की अनदेखी और प्रक्रिया की खामियों के चलते पूरा मामला कमजोर साबित हुआ।


कोर्ट ने कहा- सजा थी ‘कठोर और असंगत’

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि अगर कोई छोटी गलती भी थी, तो उसके लिए नौकरी से निकालना “अत्यधिक कठोर सजा” थी। ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए रेलवे की याचिका खारिज कर दी गई—और नायर को राहत मिल गई।


21 साल बाद मिला इंसाफ, लेकिन सवाल बाकी

नारायण नायर के लिए यह जीत ऐतिहासिक जरूर है, लेकिन बहुत देर से आई है। 21 साल तक अपनी ईमानदारी साबित करने की लड़ाई लड़ना—अपने आप में एक बड़ी कहानी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एक मामूली आरोप किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है—और अगर हां, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

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